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“ढेर सारे “दादाओं” पर भारी पड़ीं ‘दीदी’, दीदी ओ दीदी कहना पड़ा महंगा

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जब यह लेख आप तक पहुंचेगा तब तक हो सकता है कि पांच राज्यों में चुनावी नतीजों की तस्वीर लगभग साफ हो चुकी होगी। चूंकि इस चुनाव को मुझे पश्चिम बंगाल जाकर थोड़ा करीब से देखने का अवसर मिला था। इसलिए यह बात मैं कह सकता हूं कि लोगों में भले ही टीएमसी सुप्रीमों मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रति नाराजगी रही हो पर बंगाल की बेटी पर भाजपा के स्टार प्रचारक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बार-बार यह कटाक्ष ‘दीदी ओ दीदी’ कम से कम बंगालियों को नहीं सुहाया। इस कटाक्ष ने भी अन्य कारणों के साथ ही पश्चिम बंगाल में संभवतः भाजपा के बढ़ते कदम थामने में महती भूमिका निभायी।

एक बार तो लग रहा था कि पश्चिम बंगाल भाजपा चमत्कार कर सकती है। पर ऐसा नहीं हुआ। मोदी की 20 चुनावी रैलियां और अमित शाह की 50 से ज्यादा रैलियां रोड शो के बाद भी वह असर नहीं दिखा जिसकी उम्मीद की जा रही थी। ममता पर किया गया ‘दीदी ओ दीदी’ कटाक्ष का करारा जवाब वहां की जनता ने भाजपा को दिया। 2015 में सिंगल डिजिट में सीट हासिल करने वाली भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव में 18 सीटें जीतकर 128 विधानसभा सीटों पर बढ़त बनायी थी जिसका हैंगओवर इस चुनाव यानी 2021 के विधानसभा चुनाव के नतीजे आने तक रहा अब लगभग उतर चुका है। करीब 62 दिनों तक चली चुनाव प्रक्रिया के दौरान मॊदी और शाह की जोड़ी ने पश्चिम बंगाल में पूरा फोकस रखा। उनके निशाने पर टीएमसी सुप्रीमों ममता बनर्जी थी।

पार्टी यह भी सोच रही होगी ममता जीतीं तो 2024 में विपक्ष का चेहरा बनकर एक बड़ी चुनौती बन सकती हैं। राज्य में भाजपा का सघन प्रचार अभियान और 2016 के विस चुनाव के मुकाबले 2021 के चुनाव में 1.5 प्रतिशत कम वोटिंग से टीएमसी के भी दिग्गज यही सोच रहे थे कि करीब 50 सीटों पर पार्टी को नुकसान हो सकता है। यहां पर टीएमसी सुपीमों ममता ने बंगाली अस्मिता और बंगाली बनाम बाहरी पर फोकस किया था। ऐसे में ‘दीदी ओ दीदी’ का कटाक्ष बंगालियों को बिलकुल भी नहीं सुहाया। वह इसे राज्य के अपमान के रूप में देख रहे थे। मोदी के इस कटाक्ष का बदला लिया गया और यह बदला यहां तक पहुंचा कि भाजपा के बड़े-बड़े दिग्गज और टीएमसी से भाजपा में शामिल होकर मैदान में कूदे नेताओं के हाथों तोते उड़ चुके हैं।

कद्दावर नेता बनकर उभरी ममता:
इस चुनाव में अनुमान है कि टीएमसी को करीब 50 प्रतिशत वोट मिला है। 2011 में टीएमसी को 39.79 प्रतिशत, 2016 में 44.91 प्रतिशत वोट मिला था। जबकि 2019 में लोकसभा चुनाव में टीएमसी ने 43.6 प्रतिशत वोट हासिल किया और भाजपा 18 सीटें जीतकर 40.60 प्रतिशत वोट हासिल किया था। इस चुनाव से पश्चिम बंगाल देश में विपक्ष की राजनीति की धुरी बन चुका है।

ममता बनर्जी के बिना विपक्ष की मजबूत राजनीति की परिकल्पना भी संभव नहीं होगी। दीदी के सियासी सफर में यह चुनाव एक दिलचस्प मोड़ पर है। जब लोग दीदी में देश का पीएम बनने का कंटेंट देख रहे हैं। वह 2024 के संसदीय चुनाव में विपक्ष की ओर से पीएम कंडीडेट के रूप में देखी जाने लगी हैं। मोदी-शाह की कोशिशों को झटका देकर वह विपक्ष की सिरमौर भी बन सकती हैं। आगामी लोकसभा चुनाव में उनकी महती भूमिका हो सकती है। इस बड़ी जीत ने भाजपा को यह तक अवसर नहीं दिया कि वह मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार गिराने का राजनीतिक तियापांचा कर सके।

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