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जन्मदिन पर विशेष-डुमरांव की महारानी उषा रानी नारी सशक्तिकरण व स्वावलंबन की प्रतीक थी

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बक्सर, 8 सितम्बर(विक्रांत) : महारानी उषा रानी ने डुमरांव में नारी शिक्षा के दीप को जलाया था। आज उनका नाम इतिहास के पन्ने में अकिंत है। देश के प्रथम सांसद रह चुके दिवंगत डुमरांव महाराजा कमल सिंह की धर्मपत्नी महारानी उषा रानी नारी स्वावलंबन व नारी सशक्तिकरण की मिशाल थी। उन्होने पुराने शाहाबाद जिला(अब बक्सर) के डुमरांव नगर में सबसे पहले महिलाओ के बीच शिक्षा की अलख जगाने का काम किया था।

नारी शिक्षा के लिए अलख जलाने के लिए महारानी उषा रानी ने 9 सितम्बर 1955 को सबसे पहले प्राथमिक विद्यालय की नींव रखने का काम किया था। इसका जागता उदाहरण राज गढ़ के प्रांगण में मौजूद डुमरांव स्थित महारानी उषा रानी प्राथमिक माध्यमिक एवं $2 बालिका उच्च विद्यालय है।इस विद्यालय से शिक्षा ग्रहण करने के बाद वर्तमान में कई महिलाएं विभिन्न सरकारी प्रतिष्ठानां में उच्च पद पर काबिज है। हॉला कि महारानी उषा रानी नें डुमरांव नगर को संवारनें की दिशा में कई तालाब का भी निर्माण करवाया है। तालाब का निर्माण करवाने में महारानी खुद ही दिलचस्पी लेती थी।

महारानी उषा रानी का का जीवन वृत-


डुमरांव की महारानी उषा रानी का जन्म 9 सितम्बर 1928 को उतर प्रदेश के रायबरैली जिला के तिलोई इस्टे परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम राजा बहादुर विश्वनाथ प्रसाद सिंह था। तिलोई इस्टेट के राजा विश्वनाथ प्रसाद सिंह की पुत्री उषा रानी की शादी 9 मई 1946 में डुमरांव के राजा रणबिजय प्रताप सिंह के पुत्र महाराजा कमल सिंह के साथ हुआ था। सुखद संयोग कहा जाए कि महारानी के जन्म दिन एवं शादी की तारीख एक 9 थी। अपने स्वभाव से नारियल की तरह अंदर से कोमल और बाहर से काफी कठोर दिखने वाली महारानी उषा रानी के अंदर नारी स्वावलंबन एवं सशक्तिकरण के प्रति काफी संवेदनशील महिला थी।

यही कारण था कि अधिकांश जरूरतमंद महिलाएं फरियाद लेकर महारानी के पास भोजपुर कोठी पंहुचने से नहीं हिचकती थी। डुमरांव के महाराजा एवं महारानी के जोड़ी की चर्चा राजघराने में काम करने वाले लोग आज भी काफी शान से करते है। डुमरांव राजपरिवार में काम कर चुकी महिला शैलेश देवी कहती है कि महारानी साहिबा स्वभाव से दयालु महिला थी।उनके अंदर गरीबो के प्रति हमदर्दी थी। उनके पास पंहुचने वाली महिला कभी निराश होकर नहीं लौटती थी। महारानी उषा रानी भले इस दुनिया में नहीं रही। पर उनका हरा भरा राज परिवार मौजूद है।माता के जन्म दिन की याद आते ही युवराज द्वय चंद्रबिजय सिंह एवं मानबिजय सिंह की आंखे नम हो उठी। नम आंखो से युवराज चंद्रबिजय सिंह ने बताया कि उनकी माता का निधन 1 अप्रैल,1985 को बिमारी से ग्रसित होने के बाद नई दिल्ली के एम्स में ईलाज के दरम्यान हो गई थी।

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