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लंदन में भारतीयता को जीवित रख रही है चंदा झा

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बिफोरप्रिंट /प्रशांत सौरभ- आज प्रवासी भारतीय दिवस है। एक ऐसा दिन जब विदेशों में रहने वाले भारतीय लोग अपनी मातृभूमि को विशेष रूप से याद करते हैं। अपने काम के सिलसिले में भले ही लोग बाहर चले जाते हैं लेकिन यहां की यादों से दूर नहीं रह पाते। भारतीय संस्कृति है ही इतनी पावन, इतनी सरस।‌ कई ऐसे भी लोग हैं जो भले ही विदेश रह रहे हों लेकिन विदेशों में भी उन्होंने भारतीयता को जीवित रखा है और जहां हैं वहीं एक नया भारत खड़ा किया है। 1915 में गांधी दक्षिण अफ्रीका से आज ही के दिन लौट कर आए थे जिसकी याद में प्रवासी भारतीय दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर चंपारण के ऐसे लोगों की कहानी हम प्रस्तुत कर रहे हैं जो कहने को भले ही विदेशों में रहते हैं लेकिन उनका हृदय बस भारत के लिए धड़कता है। हमारी कहानी के पहले सूत्रधार हैं श्री मृत्युंजय।

कहते हैं कि व्यक्ति चाहे कहीं चला जाए लेकिन अपनी मिट्टी की गमक से दूर नहीं हो पाता। अपने बचपन के साथी, अपनी पहली पाठशाला को वह पूरी जिंदगी भूल नहीं पाता। कुछ ऐसी ही कहानी है जिले के प्रवासी भारतीय मृत्युंजय‌‌ झा की। कहने को तो ये अफ्रीका में रहते हैं लेकिन दिल सिर्फ बिहार के लिए धड़कता है। मृत्युंजय की कहानी सबके लिए प्रेरणादायी हो सकती है। एयरफोर्स में एयरमैन की नौकरी करते थे लेकिन झुकाव पार्यावरण के प्रति अधिक था, लिहाजा नौकरी छोड़ दी और जेएनयू चले गये। स्नातक में बिहार विश्वविद्यालय के टॉपर रहे मृत्युंजय ने बांग्लादेश की खाद्य समस्याओं पर पीएचडी की और वहीं से अफ्रीका का रास्ता तय हुआ। फिलहाल मृत्युंजय ह्यूमन रिसोर्स डेवलपमेंट और नेचुरल रिसोर्स डेवलपमेंट के विभिन्न प्रोजेक्ट को बनाते हैं और उनके प्रोजेक्ट को विभिन्न संस्थाएं हाथों हाथ लेती है।

इनसे जुड़े इंटरनेशनल एनजीओ के लिए मृत्युंजय पूरे अफ्रीका में काम करते हैं। चाहे युगांडा हो या घाना, सूडान हो या ट्युनिशिया चंपारण के लाल मृत्युंजय हर देश का दौरा करते हैं। शायद इसीलिए उनके बारे में लोग कहते हैं कि अफ्रीका को अफ्रीकियों से ज्यादा वे जानते हैं। फिलहाल मिथुन चाहिए बताते हैं कि अपने कार्यों से अफ्रीकी देशों को अवश्य प्रभावित किया है लेकिन उनके हार्दिक इच्छा है कि वह वापस भारत है और बिहार में है काम करें ताकि उनकी योग्यता से अपने क्षेत्र को लाभ हो बता दे के अफ्रीकी देशों में बसे भारतीयों के बीच भी मृत्युंजय खासे लोकप्रिय हैं और वहां के कई भारतीय परंपरा से जुड़े हुए त्योहारों पर एक साथ मिलकर लोग अपनी धरती को याद करते हैं।

आज की कहानी की दूसरी सूत्रधार हैं चंदा झा‌ । विदेश में रहकर अपनी संस्कृति को कैसे जीवित रख सकते हैं इसकी जीती जागती मिसाल है चंपारण की बेटी चंदा। 2007 से लंदन में रहती है और अब वहां की नागरिक भी हैं। ओसीआई कार्ड धारक हैं। इन सब के बावजूद उन्होंने न बिहार को छोड़ा है ना अपने बिहारीपने को। सुनने में थोड़ा अटपटा जरूर लगे लेकिन चंदा बताती हैं कि भोजपुरी तो बोल लेती थी, लेकिन मैथिली संस्कृति से होने के बाद भी मैथिली बोलना नहीं आता था, लंदन में जाकर मैथिली बोलना सीखा‌। लंदन में वे विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के बीच रहकर उन्हें पढ़ाया करते थे लेकिन पिछले साल से अपनी संस्कृति को वहां विकसित करने के उद्देश्य से बीएचएफ रेडियो के लिए रेडियो जॉकी का काम करती हैं।

बता दें कि वहां बोल्टन हिंदू फोरम(बीएचएफ) नाम से एक ऑनलाइन रेडियो का संचालन होता है जिसके लिए चंदा मैथिली मधुर गीत माला का कार्यक्रम प्रस्तुत करती हैं और इस कार्यक्रम में वे बिहार के उभरते हुए मैथिली गायकों को प्रमोट करती हैं। इतना ही नहीं चंदा वहां एक सफल व्यवसाई भी है और व्यवसाय में भी उन्होंने अपने बिहारीपने को ही ध्यान में रखा है। बिहार से टसर सिल्क, घिच्चा सिल्क, मलबरी सिल्क जैसी वस्तुओं का आयात करती हैं। भागलपुर में इन चीजों की मैन्युफैक्चरिंग होती है और लंदन में वे खुद इन कपड़ों को पहनकर इन्हें प्रमोट करती है, साथ ही वहां के बिहारी लोगों को यह चीजें उपलब्ध कराती हैं।

लंदन में मिथिला कल्चरल सोसायटी और बिहारी कनेक्ट नामक दो संस्थाओं से जुड़कर बिहार के लिए भी कई काम करवाती हैं। चंदा बताती है कि संस्था के कई सदस्य अपने परिवार जनों के जन्मदिन वैवाहिक वर्षगांठ के अवसर पर बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में कुछ ना कुछ सामाजिक गतिविधियां अवश्य करवाते हैं। पिछले 14 सालों में चंदा भले लंदन की नागरिक हो गई हों, लेकिन उनके भीतर बिहार न सिर्फ जीवित है बल्कि जागृत भी है, जिसके कारण बिहार से इतनी दूर होने के बावजूद लंदन में वे बिहारियों के बीच अपनी संस्कृति का परचम लहरा रही हैं।

विदेशों में रह रहे कुछ ऐसे ही प्रवासी भारतीयों ने एक नया वातावरण गढ़ा है। भारत से दूर होकर भी आपसी प्रेम और भाईचारे को जीवित रखा है। रामधारी सिंह दिनकर के शब्दों में कहें तो जहां कहीं एकता अखण्डित जहां प्रेम का स्वर है, देश-देश में खड़ा वहां भारत जीवित, भास्वर है। प्रवासी भारतीय दिवस पर ये पंक्तियां ऐसे ही हैं लोगों के लिए समर्पित हैं जिन्होंने विदेशों में रहने के बावजूद अपनी संस्कृति से पूरा जुड़ाव रखा है, और दूसरों को भी भारतीयता के निकट लाने का प्रयास कर रहे हैं।

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