पत्रकारिता में हाशिए के हस्तक्षेप के पक्षधर थे सुकांत नागार्जुन!

हेमंत कुमार/पटना : जाने-माने पत्रकार सुकांत नागार्जुन गुजर गये। वे पिछले दस दिनों से कोरोना संक्रमित थे। किसी अस्पताल में जगह नहीं मिलने के कारण घर पर ही उनका इलाज चल रहा था। शुक्रवार, 30 अप्रैल को उनकी सांस थम गयी! सहज,सरल और अपने पेशे के प्रति बेहद ईमानदार थे सुकांत नागार्जुन। जनकवि बाबा नागार्जुन के मंझले पुत्र सुकांत का जाना बिहार की पत्रकारिता की अपूरणीय क्षति है। वे पत्रकारिता में हाशिए के हस्तक्षेप के पक्षधर थे। यही वजह थी कि वे अपने प्रशंसकों और आलोचकों के बीच समान रूप से आदर और सम्मान पाते रहे। उनसे असहमत लोग भी उनकी प्रशंसा करते थे।


दरभंगा के तरौनी गांव में जन्मे सुकांत ने राजस्थान पत्रिका, नवभारत टाइम्स और हिन्दुस्तान अखबार को अपनी सेवाएं दीं। हिन्दुस्तान, मुजफ्फरपुर में दस साल तक स्थानीय संपादक रहे सुकांत रिटायरमेंट के बाद स्वतंत्र लेखन कर रहे थे। उनके छोटे पुत्र सत्यव्रत मिश्र एक अंग्रेजी अखबार में कार्यरत हैं।

सुकांत नागार्जुन उन गिने-चुने पत्रकारों में शुमार किये जाते थे, जो सत्ता की आंख में अंगुली डालने की ताकत रखते थे। उन्होंने बिहार की हिंदी पत्रकारिता में बिहारियत स्थापित की। बिहारी प्रतिभाओं को निखरने का भरपूर अवसर दिया। बिहार का कोई कस्बा और शहर नहीं होगा जिसमें सुकांत नागार्जुन का शागिर्द एक पत्रकार नहीं होगा। वे लिखने के लिए खुद फिल्ड में निकलते थे, इसी वजह से टेबल रिपोर्टिंग को नापसंद करते थे। उनके हाथों तराशे गये कई पत्रकार देश के बड़े मीडिया घरानों में अहम पदों पर विराजमान हैं!