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अशोक राजपथ, पटना की वो दुकान जहां से बाबू राजेंद्र प्रसाद भी किताबें खरीदा करते थे

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उदीप्त निधि

पटना शहर का अशोक राजपथ रोड अपने आप में गुज़रे हुए ज़माने की बहुत सी यादें ख़ुद में समेट कर आज भी जिंदा रखा है। पटना यूनिवर्सिटी और इसके अंतर्गत आने वाले पटना कॉलेज, बी एन कॉलेज, और साईंस कॉलेज से तो सभी पटनावासी भलीभांति परिचित हैं। उसी पटना यूनिवर्सिटी में कानून की पढ़ाई करने के लिए अंग्रेजो ने 1909 में पटना लॉ कॉलेज की स्थापना की थी। पटना लॉ कॉलेज का इतिहास खुद में बहुत गौरवशाली रहा है।

देश दुनिया को अनेको जज, जस्टिस और वकील देने का काम पटना लॉ कॉलेज दशकों से करते आ रहा है। पर क्या आपने कभी सोचा कि जब यह कॉलेज आज़ादी के पहले से चल रहा है तो इस कॉलेज में पढ़ रहे विद्यार्थियों के लिए कानून की पुस्तक उस समय कहां से मिलती थी? आज हम आपको उसी पुस्तक की दुकान से परिचय कराते हैं। यह दुकान पटना कॉलेज के गेट से पचास मीटर पश्चिम स्तिथ है।

सन् 1929 में यह दुकान जब खुली तब इसका नाम ‘बंगाल लॉ हाउस’ था जो कि आज तक उसी नाम से जाना जाता है। इस दुकान का नाम बंगाल लॉ हाउस होने के पीछे भी बहुत दिलचस्प कहानी है। जिस समय यह दुकान खुली थी उस समय बिहार, बंगाल और ओडिशा एक ही प्रेसीडेंसी के तहत आते थे, और इस दुकान की सभी किताबें कलकत्ता से ही आया करती थी।

इस दुकान को खोलने वाले ओमर दराज खां तो अब जीवित नहीं रहे। उन्होंने इस दुकान को 1942 तक चलाया जिसके बाद उनके पुत्र डीएन मोखतार ने इसे 1955 तक चलाया। उसके बाद से अभी तक इसको उनके पुत्र सलाउद्दीन खां चला रहे है। सलाउद्दीन खां खुद पटना हाई कोर्ट के एक अधिवक्ता है और उनके बड़े भाई अभी इस दुकान के देख रेख करते है। जिस समय यह दुकान खुली थी उस समय पूरे पटना जिला में इसकी प्रतिद्वंद्व बस ही दुकान से थी।

वह दुकान जेएनपी अग्रवाल ने 1930 में पटना सिटी में खोली थी। पर 1960 आते आते वह बंद हो गयी। सलाउद्दीन खां ने हमें बताया कि जब यह दुकान उनके दादाजी ने खोली थी तब पटना कुछ और हुआ करती थी। इस दुकान को खोलने के पीछे कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि पटना लॉ कॉलेज का नजदीक होना और गवर्नमेंट उर्दू लाइब्रेरी का सामने होना ही मुख्य कारण था।

सलाउद्दीन खां ने यह भी बताया कि जब राजेंद्र प्रसाद जी अपने राष्ट्रपति आसिफ के कार्यकाल को पूरा करके रिटायर होने के बाद पटना के सदाकत आश्रम में रहने लगे थे तब वो इस दुकान पर अक्सर आया करते थे किताब खरीदने। सलाउद्दीन साहब ने आगे यह भी बताया कि जब बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव जी यही ला कॉलेज के छात्र हुआ करते थे तो अक्सर वो हमारे यहां किताब उधार मांग कर ले जाते थे।

मुख्यमंत्री बनने के बाद भी वो यहा एक बार आए थे। इस दुकान से किताब खरीद कर पढ़ने वाले आज कुछ तो रिटायर हो गए और कुछ अब इस दुनिया में नहीं रहे। एक कहानी तो यह भी है कि इस किताब के दुकान से किताब की बिक्री सबसे जादा 1971 से 85 तक रही। उसके पीछे की कहानी यह है कि उसके समय पटना ला कॉलेज के प्रिंसिपल थे डीएन श्रीवास्तव, और उनके कार्यकाल को आप पटना ला कॉलेज का स्वर्ण काल भी कह सकते है।

उनका छात्रों के साथ ऐसा म्यूचुअल रिलेशन था कि बिना किसी दबाव के छात्रों की कॉलेज में उपस्थित नब्बे फीसदी तक हुआ करती थी। छात्र हर सेमेस्टर की सभी पुस्तकें खरीदा करते थे।पर आज इस दुकान की हालत बहुत दैनिय है। दुकान के स्टाफ से जब हमने बात की तब पता चला कि आज शायद ही कोई छात्र वहा किताब खरीदता है।

जब हमने इसके लिए ला कॉलेज के छात्रो से बात की तो उनका कहना था कि जादातर नोट्स इंटरनेट पर उपलब्ध है और जो बच जाता है वो गेस से पढकर पास कर जाते है। सलाउद्दीन खां का कहना है कि अब शिक्षा का स्तर खत्म हो चुका है पटना यूनिवर्सिटी में। बच्चे बस रात भर पढ़ कर सुबह पास हो जाना चाहते है।

किताबों का महत्व ही उन्हे नहीं पता तो वो खरीदेंगे क्यू। किताब कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसका वास्ता बस एक्जाम और पास करने से होता है। और खास कर के ला की किताबे तो ऐसी होती है जिनसे आपको जीवन भर काम करना होता है।

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