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‘सीधी सुंदर सरस आत्मा राष्ट्र की, हिन्दी भाषा हमारी नमन कीजिए’: डॉ जगमोहन

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‘अपने भारत विशाल का अदना किसान हूँ, सियासत के जूते से सना पिसान हूँ’ : भूपेंद्र शेष

अवधेश कुमार शर्मा/बेतिया: ‘साहित्य की उर्वर भूमि चंपारण में साहित्यिक गतिविधियों में कमी आ गयी है। संविधान की उपेक्षा कर विशेष रुप से अपनी सरकार ने मातृभाषा हिंदी को अपने घर में पराया बनाकर रखा है। ऐसे में 14 सितंबर को हिंदी दिवस, हिंदी सप्ताह, और राजभाषा विभाग ‘हिंदी पखवाड़ा’ मनाकर कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेता है।

इसी क्रम में साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाद्वय ‘अनुराग’ एवं ‘चम्पारण साहित्य संस्थान’ के संयुक्त तत्वावधान में हिंदी दिवस पर प्रथम सत्र में रामलखन सिंह यादव महाविद्यालय के सभागार में सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। चम्पारण साहित्य संस्थान के संयोजक दिवाकर राय एवं संस्थाद्वय के प्रवक्ता डॉ जगमोहन कुमार ने बताया कि कॉलेज के सहायक व्याख्याता डॉ. रवीन्द्र कुमार ‘शाहबादी’ का भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समिति के तीन गैर-सरकारी सदस्यों में नामित होना महाविधयालय व पूरे राज्य का सम्मान है।

उपर्युक्त सम्मान समारोह की अध्यक्षता प्राचार्य प्रो. राजेश्वर प्रसाद यादव ने की। उन्होंने कहा कि डॉ. शाहाबादी का चयन हिंदी जगत के लिए गर्व की बात है। इस क्रम में अनुराग के वरीय सदस्य अरुण गोपाल, चंद्रिका राम, प्रशांत सौरभ, महाविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. अभय कुमार सिंह, डॉ. संजय यादव, महाविद्यालय के शिक्षक एवं शिक्षकेत्तर कर्मियों सहित छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहीं।

हिंदी दिवस पर आयोजित सम्मान समारोह उपरांत द्वितीय सत्र में महाराजा पुस्तकालय में संस्थाद्वय के सदस्यों की कवि गोष्ठी सम्पन्न हुई। जिसकी अध्यक्षता पं. चतुर्भुज मिश्र ने किया। अपनी कविता प्रस्तुति में उन्होंने कहा कि चिंता चिंतन चातुरी, मंथन मंगल मोद। मोहक मधुमय मधुरतम, काव्य प्रिया की गोद। कवि सम्मेलन का संचालन संस्थाद्वय के प्रवक्ता डॉ. जगमोहन कुमार ने किया।

उनकी कविता ‘राजभाषा बढ़े, हर यतन कीजिए, जो जतन कीजिए प्राणपन कीजिए। सीधी सुंदर सरस आत्मा राष्ट्र की, हिन्दी भाषा हमारी नमन कीजिए ने खूब तालियां बटोरी। अरुण गोपाल की कविता ‘जहाँ में नफरतें ही बाँटता है, जो बोना ही नहीं था काटता है। अमन के पोस्टरों को फाड़ डाला, कोई आ जाए भी साटता है, ने वर्तमान राजनीति पर सीधा प्रहार किया। दिवाकर राय की प्रस्तुति ओजस्वी रही ‘मन में हिम्मत तन में बल हो, मानस पर्वत सा अविचल हो। बुद्धि तेज शिवाजी जैसी, कर्मों पर अपना संबल हो’। भूपेन्द्र शेष की कविता किसान आंदोलन को रेखांकित करती हुई नजर आईं, किसी ने मुझसे पूछा आप कौन हैं? मैं अपने विशाल भारत का अदना किसान हूँ। सियासत के जूते से सना पिसान हूँ।

आभास झा ‘युवा’ ने हिन्दी की बिन्दी चमक रही भारत माता के भाल पर, पूरी दुनिया झूम रही हिन्दी गीतों के ताल पर प्रस्तुत कर भाषा का श्रृंगार किया। चन्द्रिका राम की कविता पंचतत्वों की भाँति शाश्वत है, सृष्टि की ताकत है। तब अब और तब का हलफनामा है, प्रशांत सौरभ की हम सब हिंदी के प्रेमी, एक यही अभिलाषा। हम सब का है गौरव ये, अब बने राष्ट्र की भाषा। प्रीति प्रकाश की दिनभर काम करके वो चाय पर मिलती हैं। शाम के धुंधलके में लड़कियाँ ख्वाबों पर बात करती काफी प्रशंसनीय रहीं। धन्यवाद ज्ञापन आलोक कुमार वर्णवाल ने किया।

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