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कैबिनेट विस्तार ने साबित किया है कि नरेंद्र मोदी को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की कोई परवाह नहीं!

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*तो लोजपा का चिराग बुझाने की पटकथा नरेंद्र मोदी की सहमति से लिखी गयी है! एनडीए में बिन बुलाये मेहमान हो गये हैं चिराग पासवान!

*सुशील कुमार मोदी की हैसियत भी कमजोर हुई है। बिहार से बेदखल किये गये छोटे मोदी को उम्मीद थी कि उन्हें केंद्र सरकार में जगह मिलेगी। लेकिन उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया

हेमंत कुमार/पटना : कैबिनेट विस्तार ने दो बातें साफ कर दी है। पहली बात यह कि ऐसा लग रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की परवाह नहीं करते हैं। और दूसरी बात यह कि लोजपा का चिराग बुझाने की पटकथा बीजेपी की सहमति से लिखी गयी है।

लोगों को याद होगा 2019 में नीतीश कुमार केंद्र सरकार में समानुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर अपनी पार्टी के लिए कम से कम पांच मंत्री पद मांग रहे थे। नीतीश अंत तक अपनी जिद पर अड़े रहे। उनकी इस जिद के कारण तब मंत्री बनने जा रहे आरसीपी सिंह को बीच रास्ते से उल्टे पांव वापस होना पड़ा था। नीतीश शपथ ग्रहण समारोह से मुंह लटका कर पटना लौट गये थे। लेकिन इस बार नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू बिना शर्त नरेंद्र मोदी सरकार का हिस्सा बन गयी। जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष आरसीपी सिंह कैबिनेट मंत्री बन गये हैं।


इस बार नीतीश कुमार यह कहने की स्थिति में भी नहीं रहे कि उनकी पार्टी से कौन और कितने लोग मंत्री बनेंगे। नीतीश बस इतना कह पाये कि फैसला राष्ट्रीय अध्यक्ष आरसीपी सिंह को लेना है। फैसले का वक्त आया तो आरसीपी ने खुद का नाम आगे बढाया। मंत्री पद के मजबूत दावेदार राजीव रंजन सिंह यानी ललन सिंह को मंत्री नहीं बनाये जाने पर आरसीपी ने कहा, मुझमें और ललन सिंह में कोई अंतर नहीं है।’

कैबिनेट विस्तार से सबसे बड़ा झटका तो नरेंद्र मोदी के ‘हनुमान’ चिराग पासवान को लगा है। चिराग के पिता रामविलास पासवान की मृत्यु के बाद खाली मंत्री पद उनके बागी चाचा पशुपति कुमार पारस के हवाले हो गया है। इससे पहले मोदी के ‘हनुमान’ को पहला बड़ा झटका पारस को लोजपा संसदीय दल के नेता के रूप में मान्यता दिये जाने से लगा था। लेकिन चिराग को उम्मीद थी कि मोदी जी उनके चाचा पारस को मंत्री पद नहीं बनायेंगे। पर, हुआ उल्टा! मोदी से चिराग की मुलाकात काम नहीं आयी। पारस को सीधे कैबिनेट मंत्री बना दिया गया।

पारस के मंत्री बनने से साफ हो गया है कि एनडीए में चिराग की हैसियत बिन बुलाये मेहमान जैसी हो गयी है। चिराग का राजनीतिक भविष्य अब विपक्षी खेमे में ही सुरक्षित दिख रहा है। वे अकेले नीतीश सरकार से लडे़गे या महागठबंधन का हिस्सा होंगे, तय करना होगा।

मोदी कैबिनेट के विस्तार से छोटे मोदी यानी सुशील कुमार मोदी की हैसियत भी कमजोर हुई है। बिहार से बेदखल किये गये छोटे मोदी को उम्मीद थी कि उन्हें केंद्र सरकार में जगह मिलेगी। लेकिन उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया। इतना ही नहीं उनके हमदर्द और पुराने साथी रविशंकर प्रसाद की भी विदाई हो गयी। रविशंकर को कैबिनेट से बाहर किये जाने का फैसला राजनीतिक गलियारे में किसी जलजले की तरह महसूस किया गया। रविशंकर की हैसियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनकी कही गयी हर बात सरकार की बात समझी जाती थी।

हां, नरेंद्र मोदी ने राजकुमार सिंह को कैबिनेट मंत्री के तौर पर प्रमोशन देकर भाजपा के एक बड़े खेमे को खुश होने का भी मौका दिया है। राजपूत बिरादरी से आने वाले राजकुमार सिंह आरा से सांसद हैं। मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री गिरिराज सिंह और राज्यमंत्री अश्विनी चौबे की कुर्सी सुरक्षित रह गयी है। गिरिराज भूमिहार और अश्विनी ब्राह्मण हैं। नित्यानंद राय का ओहदा भी बरकरार रह गया है। मोदी 2019 जब दूसरी बार प्रधानमंत्री बने तो उनकी सरकार में बीजेपी कोटू से रविशंकर प्रसाद और गिरिराज से कैबिनेट मंत्री बनाये गये थे। राजकुमार सिंह को स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्री का दर्जा मिला था। जबकि अश्विनी चौबे और नित्यानंद राय राज्यमंत्री बनाये गये थे। इसके अलावा लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान को कैबिनेट मंत्री बनाया गया था।

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