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जनसंख्या नियंत्रण पर सुप्रीमकोर्ट में फिरोज की याचिका, यूपी में कानून का मसौदा तैयार

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-यूएन की रिपोर्ट, जनसंख्या में 2027 तक विश्व में भारत टॉप पर होगा, चीन पीछे होगा
-नौकरी, मतदान, चुनाव, सब्सिडी व अन्य सरकारी आर्थिक सहायता वालों पर नकेल हो
-पचास प्रतिशत समस्याओं की जड़ है जनसंख्या विस्फोट, दो बच्चों की नीति लागू हो

सेंट्रल डेस्क: किसी मुस्लिम की तरफ से यदि जनसंख्या नियंत्रण को लेकर सुप्रीमकोर्ट में याचिका दायर की गयी हो तो वह राष्ट्रीय खबर बनती है। यूं तो कुछेक ने याचिका लगायी है पर हाल में ऐसे लोगों में से एक हैं फिरोज बख्त अहमद। ये स्वंतत्र भारत के पहले शिक्षामंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद के प्रपौत्र हैं। दूसरी याचिका अश्विनी उपाध्याय ने दायर की है।

फिरोज की याचिका में कहा गया है कि जनगणना के मुताबिक देश की आबादी जो बतायी जाती है, वास्तव में वह कहीं अधिक है। देश में 50 प्रतिशत समस्याओं की वजह बढ़ती जनसंख्या है। इस पर लगाम जरूरी हो गया है। सरकारी नौकरी, वोट डालने, चुनाव लड़ने, सरकारी सहायता लेने समेत तमाम मामलों में दो बच्चों की नीति अनिवार्य है। यूनाइटेड नेशन की 2019 की रिपोर्ट के हवाले से कहा जाता है कि आगामी सालों में चीन में आबादी में कमी आएगी और 2027 तक भारत सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन सकता है।

यहां पर यह चर्चा करना लाजिमी होगा कि यूपी में विधानसभा चुनाव 2022 से पहले जनसंख्या नियंत्रण को कानून चर्चा में आ गया है। पता चला है कि यूपी राज्य विधि आयोग जनसंख्या नियंत्रण कानून का मसौदा तैयार कर रहा है। हालांकि यह भी कहा गया है कि कानून का मसौदा तैयार करने में कम से कम दो माह से ज्यादा समय लग सकता है। पर बतौर विधि आयोग इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि विधानसभा के आगामी सत्र में यह मसौदा सदन में रखा जा सकता है। यूपी मसौदा पर चर्चा को एक धर्म विशेष से जोड़कर देखा जा रहा है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार राज्य विधि आयोग के अध्यक्ष जस्टिस आदित्य मित्तल का कहना है कि जनसंख्या नियंत्रण कानून की जरूरत सिर्फ यूपी को नहीं पूरे देश को है। जनसंख्या एक विस्फोटक चरण के करीब है। बढ़ती हुई जनसंख्या के चलते अन्य मुद्दे भी पैदा हो रहे हैं। अस्पताल, खाद्यान्न, घर या रोजगार से संबंधित समस्याओं का सामना यूपी के लोगों को करना पड़ रहा है। इस कानून का जरिए समाज में एक जागरूकता आएगी। अगर जनसंख्या नियंत्रण होता है। उसका फायदा पूरे राज्य और देश को मिलेगा। जस्टिस आदित्यनाथ मित्तल ने बताया कि आप खुद सोच सकते हैं कि अगर एक परिवार में 10 से ज्यादा सदस्य हैं तो फिर उस परिवार में व्यवस्था कैसे बेहतर हो सकती है? हमें जनसंख्या को नियंत्रण करने की जरूरत है। हमारा मसौदा इस बात को लेकर है कि जो भी सरकारी सुविधाएं हैं जैसे कि बिजली, गैस, पानी, राशन इन सब सरकारी योजनाओं को उन्हीं व्यक्तियों को लाभ दिया जाए, जो सरकार के साथ चलकर अपने परिवार को नियंत्रित करते हैं और परिवार नियोजन को अपनाते हैं।

परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण में है अंतर:

राज्य विधि आयोग का कहना है कि जनसंख्या नियंत्रण कानून को जबरन लागू नहीं कराया जाएगा। लोग अपने आप जनसंख्या को नियंत्रित करेंगे। परिवार नियोजन के लिए देश में नसबंदी को जबरन लागू कराया गया। हम लोग घटनाओं से सबक लेते हैं। इमरजेंसी के दौरान जो जबरन नसबंदी करवाई गई थी, उसका परिणाम सबने देखा है। जनसंख्या नियंत्रण में किसी को बाध्य नहीं किया जाएगा, जो लोग जनसंख्या नियंत्रण नहीं करेंगे। उन्हें सरकार कि तरफ से मिलने वाली सुविधाओं से वंचित किया जाएगा।

जनसंख्या नियंत्रण किसी धर्म के खिलाफ नहीं:

बढ़ती जनसंख्या पूरे देश की समस्या है। जस्टिस आदित्यनाथ मित्तल कहते हैं कि यह कानून किसी धर्म विशेष या मानवाधिकारों के खिलाफ नहीं हैं। इस कानून के तहत दो से अधिक बच्चों के अभिभावकों को सरकारी सुविधाओं के लाभ से वंचित किए जाने को लेकर विभिन्न बिंदुओं पर अध्ययन होगा। खासकर सरकारी योजनाओं के तहत मिलने वाली सुविधाओं में कितनी कटौती की जाए? इस पर मंथन होगा। फिलहाल राशन और अन्य सब्सिडी में कटौती के विभिन्न पहलुओं पर विचार शुरू कर दिया गया है।

दूसरे राज्यों के कानूनों का अध्ययन कर तैयार होगा कानून का मसौदा:

आयोग, फिलहाल राजस्थान और मध्य प्रदेश समेत कुछ अन्य राज्यों में लागू कानूनों के साथ सामाजिक परिस्थितियों और अन्य बिंदुओं पर अध्ययन कर रहा है। राज्य विधि आयोग का कहना है जल्द वह अपना प्रतिवेदन तैयार कर राज्य सरकार को सौंपेगा।

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