अगले 120 घंटे बेहद डरावने, इसी पर निर्भर करेगा लॉकडाउन

-दो सप्ताह का लॉकडाउन सही, नाइट कर्फ्यू या वीकेंड लॉकडाउन का खास लाभ नहीं : डा. गुलेरिया
-वैज्ञानिक समूह के हेड विद्यासागर ने कहा-अगले सप्ताह तक कोरोना पीक पर पहुंच जाएगा
-कोरोना वायरस हवा में आ चुका है, इसलिए संक्रमितो की संख्या का अनुमान लगाना मुश्किल
-बहुत लोगों को पता नहीं कि वे कोरोना की चपेट में आ चुके हैं


नई दिल्ली : देश में कोरोना संक्रमण के मामले एक दिन में चार लाख के पार हो गए हैं। जिससे केंद्र और राज्यों की नींद उड़ गई है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ से कहा गया है कि घर के अंदर मास्क लगाने का समय आ चुका है। इस बयान का बहुत गहरा मतलब निकलता है। कोरोना को लेकर अगले ‘120 घंटे’ बहुत डरावने हैं। चार-पांच दिन में कोरोना संक्रमण के केसों पर हल्का ब्रेक नहीं लगा तो हालात बेहद खराब हो सकते हैं।

देश में लंबी अवधि वाले लॉकडाउन का फैसला भी इसी पर टिका है। विशेषज्ञों के अनुसार अगर ऐसा होता है तो स्वास्थ्य विभाग की आधारिक संरचना को अपडेट करने का मौका नहीं मिलेगा। मौजूदा स्थिति में स्वास्थ्य विभाग पर इलाज और संसाधनों को लेकर इतना दबाव है कि वह कोरोना के मामलों में आई तेजी से किसी भी वक्त चरमरा सकता है। इसे लेकर केंद्र व राज्य सरकारें बेहद चिंतित हैं। देश में कोरोना संक्रमण अपने उच्चतम स्तर के निकट पहुंचता जा रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि कोरोना संक्रमण के वायरस को लेकर अगले 120 घंटे अहम हैं। ऐसा संभावित है कि 4-5 मई के आसपास कोरोना का पीक आ सकता है।

हालांकि यह भी कहा जा रहा है कि ये ‘पीक’ कोरोना की मौजूदा रफ्तार को देखते हुए बदल भी सकता है। क्योंकि अभी ही एक ही दिन में चार लाख से ज्यादा मामले सामने आ रहे है। इस तेजी ने सरकार के तमाम रणनीतिकारों को हैरत में डाल दिया है।चूंकि अब कोरोना का वायरस हवा में आ चुका है, इसलिए संक्रमित होने वाले लोगों की संख्या का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। देश में स्वास्थ्य सेवा जहां पर खड़ी है, वहां से उसे चरमराने में जरा सी देर नहीं लगेगी। इसी वजह से अब ऑक्सीजन, रेमडेसिविर इंजेक्शन और अन्य दवाएं विदेश से मंगाई जा रही हैं। सरकार द्वारा बनाए गए वैज्ञानिक समूह के हेड एम विद्यासागर ने मीडिया को दी जानकारी में कहा है कि अगले सप्ताह तक देशभर में रोजाना आने वाले कोरोना संक्रमण के नए केस अपने पीक पर पहुंच जाएंगे।

एम्स के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया कहते हैं कि कोरोना की दूसरी लहर में केस बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं। स्वास्थ्य सेवाओं पर जो दबाव पड़ रहा है, वह उसी का नतीजा है। अगर केसों की संख्या दो-तीन सप्ताह के अंतराल पर बढ़ती तो उसे मैनेज किया जा सकता था। कोरोना की पहली लहर में यही तो हुआ था। केस धीरे-धीरे बढ़ रहे तो उन्हें मैनेज करने में ज्यादा मुश्किल नहीं आई। यदि कोरोना की रफ्तार यूं ही तेजी दिखाती रही तो दो सप्ताह में बेड की कमी हो सकती है। दरअसल, कोरोना की पहली लहर के बाद जब बीच में कुछ विराम लगा, तो लोगों और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े संगठनों ने सोच लिया कि अब कोरोना विदा हो गया है। अस्पतालों में दोबारा से सामान्य ओपीडी शुरू हो गई।

जो कोविड केयर सेंटर बनाए गए थे, वे धीरे-धीरे सामान्य व्यवस्था का हिस्सा बनते चले गए। नतीजा, अब दूसरी लहर में संसाधनों की भारी कमी हो गई। मेडिकल उपकरणों से लेकर दवाओं तक की किल्लत हो रही है।डॉ. गुलेरिया के मुताबिक लॉकडाउन से स्थिति संभल जाती है। हालांकि हर समय इस तकनीक को इस्तेमाल नहीं कर सकते। करोड़ों लोगों की आजीविका को भी देखना है। कोशिश करें कि जहां पर कोविड पॉजिटिव रेट 10 फीसदी से ज्यादा है और वहां के 60 प्रतिशत बेड भर चुके हैं तो उस क्षेत्र को कन्टेनमेंट जोन घोषित कर दें। वहां पर तुरंत ऑक्सीजन बेड की संख्या बढ़ा दी जाए। ऐसे क्षेत्र में संक्रमण की चेन तोड़नी होगी। लॉकडाउन का मतलब होता है कि एक सख्त पाबंदी। अगर लोग समझ से काम लें तो इससे बचा जा सकता है।

उन्होंने कहा कि केस कम हैं तो लोग आपस में दूरी बना लें। मिलना-जुलना बंद कर दें। जहां केस अधिक हैं और तेज गति से संक्रमण फैल रहा है तो वहां लॉकडाउन लगाना पड़ता है। शुरू में दो सप्ताह का लॉकडाउन ठीक रहता है। उस अवधि में स्वास्थ्य सेवाओं को अपडेट किया जा सकता है। नाइट कर्फ्यू या वीकेंड लॉकडाउन का कोई ज्यादा फायदा नहीं रहता। एक दिन जो कुछ हासिल किया, वह लॉकडाउन खुलते ही बराबर हो जाता है। अब हमें पॉजिटिव रेट कम करना होगा ताकि स्वास्थ्य ढांचे को अपडेट करने का समय मिल जाए। लॉकडाउन इस तरह लगाया जाए कि उससे कामकाज का ढांचा प्रभावित न हो। बढ़ते केसों के मद्देनजर एक-दो बार के लॉकडाउन से काम नहीं चलता। उसे कई बार बढ़ाना पड़ता है। बेहतर है कि लोग स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी गाइडलाइन का कठोरता से पालन करें।

एम्स निदेशक डॉ. गुलेरिया का कहना है कि अब कई जगहों पर कोरोना संक्रमण हवा में फैल चुका है। यानी सामुदायिक फैलाव की स्थिति से आगे बढ़ चुका है। आप कोरोना संक्रमित हैं, लेकिन आपको पता नहीं चल पा रहा है। 20 फीसदी लोगों को पता ही नहीं चलता कि वे कोरोना पॉजिटिव हैं। वे सोचते हैं कि हम घर में हैं तो सुरक्षित हैं, ऐसा नहीं है। आप तो कहीं बाहर नहीं गए, लेकिन कोई मैकेनिक आपके घर में आया है। ऐसा हो सकता है कि वह कोरोना संक्रमित हो। वह छींक दें तो आपके लिए मुश्किल हो जाएगी। कई घंटे तक वायरस के कण वहां मौजूद होते हैं। इसलिए लोगों को घर में मास्क लगाने की सलाह दी गई है। परिवार में ही कोई व्यक्ति कोरोना पॉजिटिव है, लेकिन उसमें लक्षण नहीं हैं। दूसरे सदस्य साथ रहते हैं, तो उनके संक्रमित होने का खतरा बना रहता है।