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हिस्ट्री में फेल पीरियड फिल्मों में पास गोवारिकर, ऐतिहासिक फिल्में बनाना उनकी यूएसपी है

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नवीन शर्मा

लगान फिल्म में भुवन बने आमिर खान अधिकतर लोगों को जरूर याद होंगे भले ही इस बेहतरीन फिल्म के डायरेक्टर का आशुतोष गोवारिकर को कम लोग जानते हैं। आशुतोष को इतिहास पर आधारित या कहे पीरियड फिल्में बनाने में भले ही महारत हासिल हो लेकिन स्‍कूल के दिनों में वे अक्‍सर हिस्‍ट्री में ही फेल हुआ करते थे। अपने बेहतर निर्देशन के लिए पहचाने जाने वाले आशुतोष इतिहास में इतने कमजोर थे कि उन्हें तारीखें याद नहीं रहती थीं।

आशुतोष को कभी भी इतिहास में दिलचस्‍पी नहीं रहीं। लेकिन फिल्में उन्हें इतिहास के करीब ले आई। आशुतोष ने हमेशा से ऐसे विषयों पर फिल्में बनाना पसंद किया है, जिनके बारे में सिर्फ इतिहास की किताबों में ही पढ़ा गया हो। फिर चाहें वह ‘लगान’ हो ‘जोधा अकबर’ हो या फिर ‘मोहनजोदाड़ो’ ये अलग बात है कि उनकी कई फिल्‍में असफल साबित हुईं।

अभिनेता के रूप में असफल रहे

प्रारंभ में डायरेक्शन में बुरे दौर से गुजरे आशुतोष एक फ्लॉप एक्टर भी रह चुके हैं।आशुतोष ने अपने फिल्‍मी सफर की शुरुआत बतौर एक्टर की थी। उन्होंने पहली बार केतन मेहता की फिल्म ‘होली’ में कैमरा फेस किया। इसके बाद उन्‍होंने कई और फिल्‍मों में काम किया इनमें ‘चमत्‍कार’,‘कभी हां कभी ना, ‘कच्‍ची धूप’और ‘नाम’ जैसी फिल्‍में शामिल हैं। एक्टिंग की बात करें तो आशुतोष टीवी पर शाहरुख के साथ भी एक शो कर चुके हैं। टीवी सीरियल सर्कस में उनके साथ नजर आए थे। इस शो में आशुतोष विक्की नाम के किरदार में थे। लेकिन एक्टिंग में उन्हें सफलता नहीं मिली। साल 1993 में उन्होंने डायरेक्शन की दुनिया में कदम रखा। उनकी पहली फिल्म‘पहला नशा’ थी।

आमिर खान ने पहले रिजेक्ट की थी लगान

जब आशुतोष ने लगान की स्क्रिप्ट आमिर को सुनाई तो आमिर ने फिल्म करने से मना कर दिया था। उसके बाद पांच म​हीने बाद उन्होंने फिर आमिर को स्क्रिप्ट सुनाई तो वे न नहीं कह पाए। इसके बाद लगान जैसी बड़ी फिल्म के लिए बजट जुटाना सबसे बड़ी समस्या थी। ऐसे में आमिर खान ने खुद की कंपनी बना कर फिल्म को प्रोड्यूस किया ।

इस फिल्म का सेट गुजरात भुज पर लगाया गया और लोकेशन को रियलस्टीक दिखाने की कोशिश की गई। आशुतोष गोवारिकर हमेशा अपनी फिल्मों की लोकेशन रियल दिखाने की कोशिश करते हैं। ताकि लोग खुद को इससे कनेक्ट कर सके।

आशुतोष गोवारिकर जब लगान की शू​टिंग कर रहे थे उस दौरान उनका एक्सीडेंट हो गया। उन्होंने​​ फिल्म के कुछ हिस्से को लेटकर शूट किया था। आशुतोष गोवारिकर अपनी फिल्मों में कोई कसर नहीं छोड़ते। वे अपनी रियल कहानियों के लिए जाने जाते हैं। उनका रियल कहानियों के​ लिए प्रति लगाव और रियलस्टिक लोेकेशन पर शूट करने का जज्बा उन्हें औरो से अलग बनाता है।

लगान एक साधारण से लगनेवाली कहानी पर बनी असाधारण फिल्म है। इसने हिंदी सिनेमा को एक नया मोड़ दिया। इसी फिल्म ने आमिर खान को मिस्टर परफेक्शनिस्ट बनाया। इस फिल्म के बाद से ही आमिर ने बेकार की फिल्मों में काम करना बंद कर दिया।

सेट पर नहीं करते कोई कोम्प्रोमाईज़
आशुतोष अपनी फिल्म के साथ किसी भी तरह का कोई समझौता नहीं करते। फिल्म जोधा अकबर के समय आगरा के किले की ऊंचाई को 45 फीट से 70 फीट किया गया था। बजट के चलते उनकी पत्नी और आर्ट डायरेक्टर ने कहा था कि ऊंचाई कम ही रहने दें, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

मोहेनजोदाड़ो इतिहास में झांकने की कोशिश
भारत दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक हड़प्पा या कहे सिंधु घाटी सभ्यता की शानदार विरासत से परिपूर्ण राष्ट्र रहा है। हमारा दुर्भाग्य है कि हम इसके बारे में काफी कम बाते जानते हैं। इसका प्रमुख कारण यह रहा कि यहां की लिपि पढ़ने में काफी दिक्कतें रही हैं। सिंधु सभ्यता की लिपि चित्रात्मक है इस वजह से भी इसे पढ़ने में कठिनाई रही । कुछ मोहरें मिली हैं।

वहीं कांसे की मूर्ति भी मिली है। नगरीय सभ्यता के कुछ चिह्न जैसे स्नानागार, सड़के, नालियां, अन्न कूटने की जगह और कुछ अन्नों और घातुओं के प्रयोग के पुरातात्विक अवशेष मिले हैं। कुछ पशुओं के बारे में भी जानकारियां मिली हैं। आशुतोष गोवारिकर ने इन्हीं छिटपुट जानकारियों के इर्द-गिर्द अपनी काल्पनिक कहानी का ताना-बाना बुना है। हां इस बार उनके लिए काम जोधा-अकबर की बहुश्रुत कहानी की तरह आसान नहीं था।

मोहनेजोदाड़ों फिल्म में मोहनेजोदाड़ों केवल बैकड्राप में है बाकि कि सारी कहानी बॉलीवुड की साघारण सी लव स्टोरी है। बैकड्राप को फिल्माने में अच्छी मेहनत की गई है। अच्छे सेट बनाए गए हैं। कोशिश की गई है कि यह कहानी उसी समय की लगे।

फिल्म में मोहनेजोदाड़ो, हड़प्पा, लोथल, कोटदिजी, आमरी और सुमेर आदि ऐसे स्थानों का ही जिक्र किया गया है जहां सिंधु सभ्यता के पुरातात्विक प्रमाण मिले हैं। फिल्म में मोहनजोदाड़ों के नागरीय जीवन को भी ऐतिहासिक तथ्यों के आसपास रखने की कोशिश की गई है, लेकिन इन सारी कोशिशों के बावजूद यह फिल्म माइलस्टोन फिल्म नहीं बन पाई क्योंकि आशुतोष को कुल मिलाकर एक मसाला मुंबइया फिल्म बनानी थी। फिल्म में कई गीत ठूंसे गए हैं। एक-दो गीतों से काम चल सकता था। रीतिक रोशन ने शरमन की भूमिका के साथ न्याय किया है। हिरोइन पूजा हेगड़े के लिेए करने को कुछ खास था नहीं। कबीर बेदी खलनायक के रोल में काफी वृद्ध हो जाने के बाद भी जंचे हैं।

सिंघु घाटी सभ्यता के नष्ट होने के बारे में कुछ इतिहासकारों की अलग-अलग राय है। इसमें से एक मत यह है कि सिंघु नदी में आई बाढ़ की वजह से यह सभ्यता नष्ट हो गई। फिल्म में इसी धारणा को मानकर क्लामेक्स रचा गया है। क्लामेक्स के दृश्यों में वीएफएक्स और कंप्यूटर की कलाकारी का अच्छा इस्तेमाल कर स्पेशल इफेक्टस डाले गए हैं जो बड़े पर्दे और डाल्बी साउंड में मजा देते हैं, लेकिन बाहुबली की तुलना में ये कमतर हैं। कुल मिलाकर यह एक औसत फिल्म बनी है। फिर भी आशुतोष की यह फिल्म हिंदी फिल्मों के दर्शकों को इतिहास के एक अनछुए पहलू से रू-ब-रू कराने की कोशिश के रूप में देखी जानी चाहिए।

खुद को महसूस करते हैं बाहरी
लगान जैसी महत्वपूर्ण फिल्म में काम करने के बाद भी वे खुद को बाहरी ​​महसूस करते हैं। क्योंकि फिल्म इंडस्ट्री में आने के लिए न तो उन्होंने कोई ट्रेंनिग ली और न ही कोई पढ़ाई की। उनके परिवार से भी कोई फिल्मो का​ हिस्सा नहीं रहा है। उनके पिता पुलिस ऑफिसर हैं जिन्हें फिल्मों का शौक रहा। पिता के इसी शौक के चलते आशुतोष ने फिल्मों में हाथ आजमाया। वे मुम्बई के मीठीबाई कॉलेज से पासआउट हैं और उनके पास केमिस्ट्री की डिग्री है। उनके अनुसार ऐतिहासिक फिल्में बनाना उनकी यूएसपी है।

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