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नैतिक उद्यम व सांस्कृतिक चेतना का विस्तार है पत्रकारिता : बलदेव भाई

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भाषा में हिंदी सर्वश्रेष्ठ, इसमें एक करोड़ से ज्यादा शब्द सहजता से मिलते हैं : कुलपति
मोतिहारी/राजन दत्त द्विवेदी।
क्या मीडिया की भाषा में आ रहा बदलाव समाज के व्यापक हित में है? क्या यह हमारी सभ्यता-संस्कृति और हमारे आचार-व्यवहार को प्रभावित करने के साथ हमारे स्वत्व पर हमला है?

क्या मीडिया के छात्रों और युवा पत्रकारों के लिए इस बदलाव में सबक जैसी कोई बात है? क्या इस बदलाव को रोका जा सकता है? महात्मा गांधी केंद्रीय विवि मोतिहारी के मीडिया अध्ययन विभाग के ई-गुरुमंत्र शृंखला की छठी कड़ी में गुरुवार को इन्हीं प्रश्नों पर विशेषज्ञों ने मंथन किया।

इस वैचारिक अनुष्ठान में पांचजन्य सहित विभिन्न राष्ट्रीय दैनिकों के संपादक रहे प्रख्यात पत्रकार सह रायपुर के कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विवि के कुलपति प्रो. बलदेव भाई शर्मा, प्रख्यात संचारविद और रिलायंस के मीडिया निदेशक उमेश उपाध्याय और महात्मा गांधी केंद्रीय विवि के कुलपति प्रो.संजीव कुमार शर्मा ने अपने विचार रखे।

प्रो. बलदेव भाई शर्मा ने कहा कि मीडिया में भाषा के बदलाव जैसे प्रकरण पर विचार बहुत सुखद संकेत है। कहा कि भाषा में परिवर्तन केवल शब्दों का हेरफेर मात्र ही नहीं है। इसके पीछे कुत्सित मानसिकता काम करती है। पत्रकारिता केवल छिद्रान्वेषण का विषयवस्तु नहीं है, यह लोक कल्याणकारी दृष्टि से जुड़ा सामाजिक दायित्व बोध है। इसलिए पत्रकारों, विशेषकर पत्रकारिता की शिक्षा प्राप्त कर रहे युवाओं को भाषा के अनुप्रयोग पर गंभीरता से विचार करना होगा।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए एमजीसीयू के कुलपति प्रो.संजीव कुमार शर्मा ने कहा कि शुद्धता और समकालीनता के आग्रह में समन्वय करना आवश्यक है। संस्कृत के कवि वाणभट्ट और उनके दो पुत्रों के उद्धरण से कुलपति ने यह स्पष्ट किया कि भाषा हमें यह दृष्टिबोध देती है। भाषा की दृष्टि से आ रहे बदलावों को मीडिया के विद्यार्थियों को और सतर्क होकर देखना होगा। युवा विद्यार्थी इस बात पर अभी से विचार करें तो उनकी शिक्षा सार्थक होगी।

अंग्रेजी के बारे में यह धारणा है कि यह सबसे समृद्ध है जबकि उसमें लैटिन और ग्रीक मिलाकर दस लाख से ज्यादा शब्द नहीं हैं। जबकि हिंदी में एक करोड़ से ज्यादा शब्द सहजता में मिलते हैं। संस्कृत में तो चार करोड़ से ज्यादा शब्द हैं। जर्मन तो संस्कृत से ही निकली है। भाषा हमारी राष्ट्रीय चेतना की प्रतीक है इसका ध्यान रखने की जरूरत है।

मुख्य वक्ता उमेश उपाध्याय ने हिंदी के यशस्वी साहित्यकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल का उद्धरण देते हुए कहा कि समाज की चित्तवृत्तियों में परिवर्तन देश-काल की परिस्थितियों में बदलाव के कारण होते हैं और इसे दिशा देने में मीडिया की अहम भूमिका होती है। भाषा चलायमान होती है और इसमें निरंतर परिवर्तन स्वाभाविक है किंतु देखना होगा कि यह बदलाव सहज हो।

इसलिए भाषा की नदी में जानबूझकर बाढ़ लाने के प्रयास अच्छे संकेत नहीं हैं। यह प्रकारांतर से हमारे स्वत्व पर हमला है। उन्होंने कहा कि तकनीक ही आज की भाषा भी तय कर रही है। इसलिए मीडिया संस्थानों को ऐसे पाठ्यक्रम बनाने होंगे। प्रतिकुलपति प्रो. जी. गोपाल रेड्डी ने मीडिया के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा मीडिया में भाषा का महत्व बहुत अधिक है। इसी से जनता का जुड़ाव होता है।

अतिथियों का स्वागत करते हुए डॉ. अंजनी कुमार झा ने मुख्य अतिथि प्रो. बलदेव भाई शर्मा, मुख्य वक्ता उमेश उपाध्याय और विवि के कुलपति प्रो. संजीव कुमार शर्मा एवं प्रति कुलपति प्रो. जी. गोपाल रेड्डी के बहुआयामी व्यक्तित्व से परिचित कराया। मीडिया विभाग के अध्यक्ष डा. प्रशांत कुमार ने कहा कि गुरुमंत्र शृंखला की आज की कड़ी अभिभूत करने वाली रही है।

वहीं गुरुमंत्र शृंखला की आगे और कड़ियां प्रस्तावित हैं। कार्यक्रम संचालन करते हुए ई-गुरुमंत्र शृंखला के संयोजक डॉ. साकेत रमण ने भगवद्गीता का उद्धरण देते हुए कहा कि अक्षर का मतलब ही है कि जो शाश्वत है। शब्द ब्रह्मस्वरूप होते हैं। कार्यक्रम में हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. राजेंद्र सिंह, कार्यक्रम के आयोजन सचिव डॉ. परमात्मा कुमार मिश्रा, डॉ. सुनील दीपक घोडके और डॉ. उमा यादव, पीआरओ शेफालिका मिश्रा सहित सभी शोधार्थी और विद्यार्थी मौजूद थे।

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