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दर्द का रिश्ता : कैंसर से हारी राजलक्ष्मी ने सहेली नम्रता की बाहों दम तोड़ा

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-नम आंखों के बीच पुरी में हुई अंत्येष्टि में नम्रता ने मुखाग्नि दी
भुवनेश्वर/महेश शर्मा।
कहा जाता है कि औरत ही औरत की दुश्मन है। लेकिन ओडिशा की नम्रता और राजलक्ष्मी की दोस्ती ने इसे झुठला दिया। कैंसर से जूझ रही राजलक्ष्मी (63) (प्यार से नम्रता उन्हें झूनू बुलाती थी) ने नम्रता की बाहों में दम तोड़ दिया।

उसकी इच्छा थी कि महाप्रभु जगन्नाथ की नगरी पुरी के स्वर्गद्वार में अंत्येष्टि हो। ऐसा ही हुआ। यही नहीं मुखाग्नि भी उसकी (राजलक्ष्मी) इच्छा के अनुसार नम्रता ने ही पुरी में दी। जानीमानी सोशल वर्कर नम्रता चड्ढा ओडिशा राज्य महिला आयोग की पूर्व सदस्य रही हैं। ओडिशा के लोग दोनों की दोस्ती को जानते और मानते भी थे। ऐसा लगता था जैसे दोनों ने सुख-दुख, जीने-मरने में भी साथ रहने की कसम खा ली हो। राजलक्ष्मी अविवाहित थी। वह जिला बाल अधिकार सुरक्षा कमिशन की सदस्य थी।

नम्रता माध्यम नाम की सामाजिक संस्था चलाती हैं जिसकी सेक्रेटरी राजलक्ष्मी ही थी। दोनों की जुगलजोड़ी सामाजिक कार्यों में बढ़चढ़कर हिस्सा लेती थी। जैसा कि ऊपर लिखा है कि औरत ही औरत की दुश्मन होती है,हमारे समाज में यह बात इतनी बार कही जाती है कि सच लगने लगती है। नम्रता और राजलक्ष्मी की दोस्ती इसमें अपवाद रही हैं।

राजलक्ष्मी की अंत्येष्टि करके लौटी नम्रता ने बताया कि वह जब अपनी ज़िंदगी के पन्नों को पलटती हैं तो बहुत सी महिला दोस्त दिखाई देती है, उन सब मे सबसे पहले राजलक्ष्मी का स्थान आता है। उसके सहयोग से आज मैं अपनी एक पहचान बना पाई हूँ। बीजू जनता दल की महिला शाखा की प्रदेश उपाध्यक्ष मीरा परीड़ा बताती हैं कि दोनों की दोस्ती की हम लोग कसमें खाते थे। राजलक्ष्मी का परिचय नम्रता के माध्यम से हुआ था।

पर जब भी किसी काम से गयी। उन्होंने पूरी संजीदगी से काम किया। सामाजिक कामकाज के ही विषय हुआ करते थे। ह्यूमन राइट्स डिफेंडर्स के राज्य संयोजक मनोज जेना का कहना है कि मैंने तो दोनों सहेलियों को लोगों के दुखदर्द बांटते देखा है। ऐसी तमाम यादें हैं जो नम्रता और राजलक्ष्मा आपा (ओडिशा मंं बहन को आपा कहते हैं) से जुड़ी हैं। राजलक्ष्मी को महाप्रभु जगन्नाथ ने अपने पास बुला लिया है। वो जिस भी दुनिया में हैं शांति से होंगी।

कैंसर पीड़ित राजलक्ष्मी सहेली नम्रता के साथ। (फ़ाइल फोटो)

नम्रता बताती हैं कि राजलक्ष्मी के परिवार में तीन बहने और एक भाई थे। इंजीनियर की नौकरी मिलने के पहले ही दिन भाई की एक्सीडेंट में मौत हो गयी थी। इस सदमे से वह टूट गयी थी। उसकी मां तो जैसे पागल सी हो गयी थी। पिता सरकारी नौकरी में थे। गांव घर से संपन्न थी। दोनों बहनों की शादी हो गयी वे अपने घरों को चली गयीं। झूनू (राजलक्ष्मी) के हिस्से में बेटे की मौत से मानसिक संतुलन खो बैठने वाली मां औरौ चलने फिरने को मोहताज खटिया पकड़े पिता आए जिनकी सेवा वह करती थी। उसके सेवा भाव और किसी की भी मदद को उसकी संवेदनशीलता से दोस्ती का रिश्ता गहरा होता गया।

यही रिश्ता तो दर्द का रिश्ता था जिसने उसकी अंत्येष्टि तक साथ देने को प्रेरित किया। उसकी इच्छा भी यही थी। वह अपनी बहनों के भी परिवार को समर्पित थी। उसने कह दिया था कि उसकी अंत्येष्टि उसकी पक्की सहेली नम्रता ही करेंगी। झूनू ने कदम कदम पर साथ दिया। वही मेरी बेस्ट फ्रेंड थी। उनका कहना है कि महिला की महिला की दोस्त है, यह संदेश समाज में जाना चाहिए।

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