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अपनी मातृभाषा पर गर्व किजिए, उसे जिंदा रखिए

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अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर विशेष

-नवीन शर्मा
आज अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस है। यह उचित मौका है जब हम अपनी मातृभाषा का हाल जाने उसे जिंदा रखने का संकल्प भी लें। आज स्थिति बहुत ही चिंताजनक है। जिस तरह बड़ी मछलियां छोटी मछलियों को खा जाती हैंं उसी से बड़ी भाषाएं छोटी भाषाओं और बोलियों को खत्म करती जा रही हैं। अपने यहां तो संकट अजीब तरह का है। अंग्रेजों से देश 15 अगस्त 1947 को राजनीतिक तौर पर तो आजाद हो गया लेकिन अंग्रेजी भाषा की गुलामी की जंजीर तो मजबूत होती जा रही हैं।

आज जबकि हिंदू, हिंदी व हिंदुस्तान का नारा देनेवालों का शासन है फिर भी हिंदी भाषा अंग्रेजी की दासी ही बनी हुई है। आज भी प्रशासन की भाषा अंग्रेजी ही बनी हुई है। इसी वजह से अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की संख्या कुकुरमुत्तों की तरह बढ़ती जा रही है।

दुनिया भर में 7000 भाषाएं मौजूद हैं, लेकिन इनमें से 70-90 प्रतिशत भाषाएं विलुप्त होने के कगार पर हैं। इन भाषाओं को बोलने वालों की संख्या एक हजार से भी कम हो गई है। ये खतरनाक स्थिति है अगर हम नहीं चेते तो आनेवाली सदी में ये भाषाएं गायब हो जाएंगी।

मातृभाषा आदमी के संस्कारों की संवाहक होती है। मातृभाषा के बिना, किसी भी देश की संस्कृति की कल्पना बेमानी है। मातृभाषा हमें राष्ट्रीयता से भी जोड़ती है और देश प्रेम की भावना उत्प्रेरित करती है। मातृ भाषा आत्मा की आवाज़ है तथा देश को माला की लड़ियों की तरह पिरोती है। माँ के आंचल में पल्लवित हुई भाषा बालक के मानसिक विकास को शब्द व पहला सम्प्रेषण देती है। मातृ भाषा ही सबसे पहले इंसान को सोचने-समझने और व्यवहार की अनौपचारिक शिक्षा और समझ देती है। बालक की प्राथमिक शिक्षा मातृ भाषा में ही करानी चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस
17 नवंबर, 1999 को यूनेस्को ने इसे 21 फरवरी को मनाने की स्वीकृति दी। इस दिवस को मनाने का उद्देश्य है कि विश्व में भाषाई एवं सांस्कृतिक विविधता और बहुभाषिता को बढ़ावा मिले।यूनेस्को द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की घोषणा से बांग्लादेश के भाषा आन्दोलन दिवस को अन्तर्राष्ट्रीय स्वीकृति मिली, जो बांग्लादेश में सन 1952 से मनाया जाता रहा है।

बांग्लादेश में इस दिन एक राष्ट्रीय अवकाश होता है। 2008 को अन्तर्राष्ट्रीय भाषा वर्ष घोषित करते हुए, संयुक्त राष्ट्र आम सभा ने अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के महत्व को फिर महत्त्व दिया था। हमें अपनी मातृभाषा पर गर्व होना चाहिए तथा वो सदियों तक जिंदा भी रहे इसकी फिक्र करनी चाहिए। बच्चों को मातृभाषा जरूर सिखाएं। दूसरी भाषाओं से भी प्यार करें ।

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