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रोशन है मेरा नाम बड़ा नामवर हूँ मैं…

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हिंदी के प्रख्यात आलोचक और साहित्यकार नामवर सिंह नहीं रहे। महीने भर पहले उन्हें अपने कमरे में गिर जाने की वजह से एम्स, दिल्ली में भर्ती किया गया था। वह 93 साल के थे। वह काफी समय से बीमार चल रहे थे और एम्स में भर्ती थे। 19 फरवरी को रात लगभग 11:50 बजे अंतिम सांस ली।

रामचंद्र शुक्ल परंपरा के नामवर सिंह का जन्म 28 जुलाई 1927 को जीयनपुर, ज़िला चंदौली में हुआ था. उन्होंने बीएचयू से हिंदी साहित्य में एमए और पीएचडी की। उंन्होने बीएचयू, सागर, जोधपुर और जेएनयू में बतौर प्रोफेसर सेवा दी है। हजारी प्रसाद द्विवेदी के प्रिय शिष्य नामवर सिंह वर्तमान में आलोचना के वे सबसे बड़े स्तंभ थे।

बीएचयू के बाद डॉ. नामवर सिंह ने क्रमश: सागर विश्वविद्यालय और जोधपुर विश्वविद्यालय में भी अध्यापन किया। लेकिन बाद में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में उन्होंने काफी समय तक अध्यापन कार्य किया। अवकाश प्राप्त करने के बाद भी वे उसी विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र में इमेरिट्स प्रोफेसर रहे। वे हिन्दी के अतिरिक्त उर्दू, एवं संस्कृत भाषा भी जानते थे।

उनकी प्रमुख रचनाएं- छायावाद(1955) इतिहास और आलोचना (1957) कहानी : नयी कहानी (1964) कविता के नये प्रतिमान (1968) दूसरी परम्परा की खोज (1982) वाद विवाद और संवाद (1989) हैं। उन्होंने जनयुग और आलोचना नामक हिंदी की दो पत्रिकाओं का संपादन भी किया।

मार्क्सवादी परंपरा के आलोचक नामवर सिंह के साथ एक विशेष बात यह है कि उन्होंने जितना लिखा है, उससे बहुत ज्यादा अलिखित है जो उनके शिष्य या अन्य लोगो ने संदर्भ रूप में इकट्ठा कर लिया है। वे वाचिक परंपरा के साहित्यकार थे। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित नामवर हिंदी साहित्य में आज सबसे बड़ा नाम है। उनका लम्बा और सर्जनापूर्ण जीवन हिंदी साहित्य में सदैव अमर रहेगा।

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