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नामवर सिंह ने हिंदी साहित्य का मिजाज़ बदला, विचारों के नए आयाम विकसित किये

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-राजन आनंद

-नामवर सिंह जी आप बहुत याद आयेंगे
-नामवर सिंह ने हिंदी साहित्य का मिज़ाज़ बदला, विचारों के नए आयाम विकसित किये
-मर्माहत है साहित्य जगत, आलोक धन्वा और प्रेम कुमार मणि ने कहा उनका जाना निजी क्षति है

हिंदी साहित्य के बेताज बादशाह, शब्दों के जादूगर और भाषा के मज़बूत स्तम्भ नामवर सिंह हमारे बीच नहीं रहे। मगर उनकी कीर्त्ति कभी ख़त्म न होगी। पूरा साहित्य जगत आज मर्माहत है। उनकी यादें साहित्यकारों ही नहीं बल्कि उनके प्रशंसकों को भावुक कर रहीं है। साहित्य से जुड़े साथी, सहयोगी उनके साथ बिताये पलों को अपनी पूंजी मानते हैं। तभी तो साहित्यकार व कवि आलोक धन्वा नामवर सिंह के जाने की खबर पाकर सुबह से ही व्यथित है।


आलोक धन्वा

दुखी आलोक धन्वा नामवर सिंह के निधन को एक युग का अंत बताते है। उनका कहना है कि नामवर सिंह ने हिंदी साहित्य की स्वास्थ्य एवं प्रगतिशील परम्पराओं को विकसित ही नहीं किया बल्कि दूसरी विधाओं इतिहास, दर्शन, धर्मशास्त्र और समाजशास्त्र के चिन्तन को भी समृद्ध किया। भारत की तमाम भाषाओं में उनका लिखा पढ़ा गया और उनका कहा सुना गया। वे बहुत ही साधारण रहते थे।

एक ठेठ शिक्षक की छवि थी उनकी बावजूद इसके उनकी क़ाबलियत के कायल विदेशी भी थे। विदेशों से आये साहित्यकार, रंगकर्मी, शिल्पी, चित्रकार सभी उन्हें देखने और मिलने को लालायित रहते थे। देश दुनिया का शायद ही कोई विश्वविद्यालय हो जहां उनका लेक्चर न हुआ हो। आलोक धन्वा कहते है कि जो उनसे सहमत नहीं थे वो भी उनके परम मित्र थे। एक शिखर आलोचक रहे लेकिन उनके चिंतन में रूढ़ियाँ नहीं थी।

उन्होंने अपने गुरु आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी का नाम रौशन किया। छायावाद पर जो उनकी पुस्तक है वो बहुत प्रसिद्ध हुई। ‘कविता के प्रतिमान’ उनकी पुस्तक का जोड़ नहीं। आलोक धन्वा ने बिफोर प्रिंट से बताया कि नामवर सिंह के साथ बिताये पल स्मृतियों से कभी नहीं निकल पायेगा।किसी भी मंच पर उनकी उपस्थिति गौरव की बात थी।

वहीं नामवर सिंह के देहावसान पर आहत साहित्यकार प्रेम कुमार मणि का कहना है कि नामवर सिंह ने हिंदी साहित्य का मिजाज़ ही बदल दिया। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कभी कहा था कि हिंदी साहित्य में आलोचना का अभाव है। मगर नामवर सिंह जी के आने के बाद तो सोच और पूरा साहित्यिक वातावरण ही बदल गया। आलोचना की शुरुआत रामचंद्र शुक्ल ने किया। हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ने इसे आगे बढ़ाया लेकिन इसे उचाईयों पर नामवर सिंह लेकर गए।


प्रेम कुमार मणि

प्रेम कुमार मणि कहते है कि नामवर सिंह ने हिंदी साहित्य की जड़ता से संघर्ष किया और विचारो के नए आयाम विकसित किये। वो नयी पीढ़ी से सहज थे। उनके चले जाने से जो खालीपन है, जो वैचारिक सूनापन है उसे दूर करना हिंदी समाज के लिए मुश्किल होगा।

नामवर सिंह के निधन से मर्माहत साहित्यकार कर्मेन्दु शिशिर ने कहा कि डाक्टर नामवर सिंह के निधन से हिन्दी का शीर्ष गौरव -स्तंभ टूट गया। वे हिन्दी के संभवतः अकेले ऐसे आलोचक थे जिनका दखल आदिकाल से अत्याधुनिक काल तक के साहित्य में था। उन्होंने एक ओर आचार्य रामचंद्र शुक्ल की लोकमंगल की अवधारणा तो दूसरी ओर आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की लोकपरंपरा को समवेत रूप से जोड़कर साहित्य का नया सामाजिक सरोकार विकसित किया।


कर्मेन्दु शिशिर

नामवर सिंह की यह विलक्षण खूबी थी कि वे वैचारिक स्तर पर हमेशा गतिशील रहे और आधुनिक विचारों को लगातार अपने चिंतन में शामिल करते रहे। उनकी एक विशेषता यह थी कि वे साहित्य की तमाम विधाओं से गहरे परिचित थे और सभी विधाओं के आलोचनात्मक विवेक के विकास में उनका योगदान रहा। नामवर सिंह ने साहित्य के भूगोल का भी व्यापक विस्तार किया। उनका गुजरना एक युग के गुजरने जैसा है। उनकी कमी कभी पूरी नहीं होगी।

साथ ही साहित्यकार कवि अरुण कमल ने बिफोर प्रिंट से कहा – मेरी श्रद्धांजलि है उन्हें, मगर मैं इस वक़्त कुछ बोलने की स्थिति में नहीं हूं।

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