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बाढ़ का प्रकोप : नहीं मिली सूखी जमीन तो मचान बनाकर दी अंतिम विदाई

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दरभंगा (निशि)। बिहार में बाढ़ के हालत ऐसे हैं कि लोगों को शवों का अंतिम संस्कार करने के लिए सूखी जमीन नहीं मिल रही है। ऐसा ही एक मामला दरभंगा जिले के कुशेश्वरस्थान प्रखंड में सामने आया। यहां बाढ़ से घिरे महिसौत गांव के श्मशान घाट सहित आसपास के सभी गांवों के श्मशान घाट इन दिनों बाढ़ के पानी में जलमग्न हैं। जल प्रलय के इस काल में 90 वर्षीय बुजुर्ग को मृत्यु होने पर गांव की मिट्टी भी नसीब नहीं हुई।

जानकारी के अनुसार उक्त गांव के शिवानी यादव (90 ) का निधन गत 19 जुलाई को देर रात हृदय गति रुक जाने से हो गया। उनके निधन के बाद से ही परिजनों को उनके अंतिम संस्कार करने की चिंता सताने लगी, क्योंकि गांव के श्मशान घाट सहित आसपास के सभी गांवों के श्मशान घाट इन दिनों बाढ़ के पानी में जलमग्न हैं। इतना ही नहीं महिसोट सहित आसपास के गांवों की सभी सड़कें भी बाढ़ के पानी में डूबी हुई हैं। मृतक के परिजनों ने अंतिम संस्कार कैसे हो, इसी विषय पर मंथन करते-करते रात गुजार दी।

सुबह कुछ लोग नाव पर सवार होकर आसपास के इलाकों में सूखी जमीन की तलाश में निकल पड़े किन्तु आसपास के इलाकों में गांव को छोड़कर अन्य कोई स्थान सूखा नहीं मिला। थक-हारकर लोग वापस लौट आये और अंतिम संस्कार के लिए मंथन शुरू कर दिया। कुछ लोगों ने इस विषम परिस्थिति में शव को जल में प्रवाहित करने का सुझाव दिया लेकिन परिजनों को यह सुझाव पसंद नहीं आया।

अंत में कुछ लोगों ने बाढ़ के पानी में बांस का मचान बनाकर उसके ऊपर मिट्टी की कोठी रखकर उसमें शव को रखकर लकड़ी से जलाने सुझाव दिया। इसे सभी लोगों ने स्वीकार कर लिया और इसकी तैयारी में जुट गए। आनन-फानन में लोगों ने नाव के सहारे श्मशान घाट पर बांस का मचान बनाकर उस पर मिट्टी की कोठी रख दी। फिर नाव के सहारे शव के साथ अंतिम यात्रा शुरू हुई।

शव को श्मशान घाट लाकर पूरे वैदिक रीति-रिवाज के अनुसार शव को कोठी में बैठाकर लकड़ी के जलावन से कोठी को भर दिया। तत्पश्चात मृतक के पुत्र रामप्रताप यादव ने मुखाग्नि की रस्म पूरी की। इसके साथ ही शव पंचतत्व में विलीन हो गया। इस संबंध में इलाके के प्रसिद्ध पंडित शिवाकांत ठाकुर ने बताया कि हिन्दू धर्म में शव को जलाने की प्रथा को सर्वोत्तम माना गया है।

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