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जातीय गणित के मकड़जाल में उलझी यूपी की पॉलिटिक्स

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-भाजपा ने ग्वाला गोत्र के यादवों को अपनी ओर खींचा
-चौधरी हरमोहन की नयी पीढ़ी 14 के बाद भाजपा में
-सपा सांसद सुखराम के बेटे मोहित स्वतंत्रदेव से मिले
-हरमोहन जयंती वर्ष के बहाने अखिलेश यादव पर निशाने
-दावा है 75% ग्वाला (घोसी) तो 25% हैं कमरिया यादव
-कमरिया वर्ग में आता है मुलायम सिंह यादव का कुनबा
-मुलायम सिंह परिवार तक सिमटी है सपा की राजनीति
-आबादी के अनुपात के हिसाब से नहीं मिली भागीदारी
कानपुर।
जहां एक ओर भाजपा से टूट-टूटकर विधायक समाजवादी पार्टी में शामिल होकर मोदी-शाह की भाजपा को झटका दे रहे हैं तो वहीं भाजपा ने पिछड़ी जाति यादव में गोत्र की राजनीति शुरू करते हुए कभी मुलायम सिंह यादव के करीबी चौधरी हरमोहन सिंह यादव के परिवार की नयी पीढ़ी को अपनी ओर लाना शुरू कर दिया है।

इसी कड़ी में चौधरी हरमोहन सिंह यादव के पौत्र सपा सांसद चौधरी सुखराम के पुत्र चौधरी मोहित यादव ने भाजपा में जाने का निर्णय ले लिया। वे कल (10 जनवरी) को भाजपा के प्रदेश स्वतंत्रदेव सिंह से मिले। मोहित ने बताया कि 14 जनवरी के बाद अच्छे दिन आने वाले हैं तभी ज्वाइन करेंगे।

चौधरी मोहित यादव ।
स्व. चौधरी हरमोहन सिंह यादव

राजनीति में प्रभावी चौधरी (स्व.) हरमोहन के बेटे सांसद सुखराम अखिलेश के नेतृत्व वाली सपा से खफा हैं। वह कहते हैं कि उन्हें जो कुछ भी राजनीति में मिला है वह नेताजी (मुलायम सिंह यादव) से मिला है। जब तक वो हैं तब तक पार्टी की हर बात मानूंगा उसके बाद देखा जाएगा। मोहित के निर्णय पर वह खुश हैं और कहते हैं युवा पीढ़ी है। मोहित को मेरा आशीर्वाद है। यूपी में 9 फीसदी यादव है। इनमें से पिछड़ों की कुल आबादी को लें तो उसका 20 प्रतिशत यादव है। यादवों का एक धड़ा (घोसी या ग्वाला) कानपुर के स्वर्गीय चौधरी हरमोहन सिंह यादव के परिवार की अगुवायी में भाजपा से हाथ मिलाएगा। इसकी पृष्ठभूमि तय कर ली गयी है।

प्रदेश में यादवों के दो प्रमुख वर्ग (गोत्र) है। कमरिया और घोसी। मुलायम सिंह यादव कमरिया वर्ग से आते हैं जबकि हरमोहन सिंह यादव का परिवार घोसी वर्ग से है। मुलायम सिंह यादव के राजनीतिक उत्थान में आल इंडिया यादव महासभा का योगदान बताया जाता है। चौधरी हरमोहन सिंह यादव यादव महासभा के अध्यक्ष थे। मुलायम से पहले चौधरी चरण सिंह का यादव समर्थन करते थे।

मेहरबानसिंह का पुरवा में चौधरी हरमोहन सिंह यादव जयंती वर्ष समारोह में दीप प्रज्ज्वलित करते राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, कैबिनेट मंत्री सतीश महाना, सुखराम सिंह यादव

उनकी मौत के बाद उनके चौधरी अजीत सिंह (अब स्वर्गीय) राजनीति में आए तो यादवों का झुकाव उनकी ओर हुआ। पर हरमोहन सिंह ने मुलायम को आगे बढ़ाने के विशेषाधिकार का इस्तेमाल किया और प्रस्ताव पारित कराया जिसमें मुलायम को समर्थन की बात कही गयी थी। मुलायम सिंह के यादवों के बड़े नेता बनने की शुरुआत यहीं से हुई।

यादव समाज के प्रमुख गोत्र कमरिया और घोसी में अंदरखाने में तनातनी बतायी जाती है। वजह यादवों की पार्टी होने के बाद भी घोसियों का कोई बढ़ा नेता नहीं उभर पाया। राजनीति में मुलायम के लगभग रिटायरमेंट लेने के बाद अखिलेश ने कमान संभाली। सपा में जो कुछ मिलता रहा मुलायम, अखिलेश, शिवपाल, रामगोपाल के परिवार के लोग पाते रहे। घोसी वर्ग के लोगों को यही टीस है। खुद सुखराम कहते हैं कि उन्हें एमएलसी व विधान परिषद सभपति पद और राज्यसभा सदस्य नेताजी (मुलायम सिंह यादव) ने बनाया है।

सपा सांसद चौधरी सुखराम सिंह यादव, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह, डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा, मोहित सिंह यादव

घोसियों का दावा है कि उत्तर प्रदेश में उनकी संख्या अधिक है। एक अनुमान के मुताबिक करीब 75 फीसदी घोसी तो 25 फीसदी के करीब कमरिया यादव है। प्रदेश की सात या कुछ ज्यादा विधानसभा क्षेत्रों में कमरिया बड़ी संख्या में हैं। ये सीटें भरथना, करेल, जसवंतनगर, विधूना, दिबियापुर, सिरसागंज व लखना। यहां पर कमरिया जीत-हार में निर्णायक भूमिका होती है। बताते हैं कि इन सीटों पर कमरिया यादव 50 से 70 प्रतिशत तक हैं।

दावा है कि राज्य के शेष हिस्से में घोसियों की संख्या कमरिया के मुकाबले बहुत अधिक है। यह भी कहा जाता है कि सपा के शासनकाल में तीन चौथाई से अधिक कमरिया यादवों की भरती हुई। भाजपा शासनकाल में भरती पाए यादवों का यह आंकड़ा उलट गया। नौकरियों में घोसी वर्ग की नियुक्तियां हुईं। यादवों की भीतरखाने की राजनीति समझते हुए भाजपा ने सपा के इस वोट बैंक में सेंधमारी की है।

अखिलेश यादव के साथ सुखराम सिंह यादव (फाइल फोटो)

चौधरी हरमोहन सिंह यादव जयंती वर्ष में कार्यक्रमों राष्ट्रपति, भाजपा सरकार के डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा, प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह मेहरबान सिंह का पुरवा में आयोजित कार्यक्रमों में आ चुके हैं। योगी वीडियो कांफ्रेंसिंग से सभा संबोधित की थी। घोसी यादव के नेता चौधरी स्व.रामगोपाल यादव (पूर्व सांसद) चौधरी स्व.हरमोहन सिंह यादव (पूर्व सांसद) मेहरबानसिंह का पुरवा (कानपुर) गांव के हैं। हरमोहन सिंह के बड़े भाई चौधरी रामगोपाल यादव भी आल इंडिया यादव महासभा के अध्यक्ष कई वर्ष तक रह चुके हैं।

चौधरी हरमोहन सिंह यादव से गुफ्तगू करते मुलायम सिंह यादव (फाइल फोटो)

इनकी अगली पीढ़ी अभी भी गांव में ही रहती है। हरमोहन सिंह के पौत्र चौधरी मोहित सिंह यादव यादवों के घोसी वर्ग को एकजुट करने में लगे हैं। मोहित अपने पिता सुखराम सिंह यादव के साथ गांव में ही रहते हैं। सुखराम का इसी वर्ष उनका राज्यसभा का कार्यकाल समाप्त हो जाएगा। संभव है कि वह भी सक्रिय रूप से काम करने लगे। यह वर्ष चौधरी हरमोहन सिंह यादव का जयंती वर्ष है। साल भर तक कार्यक्रम चलने वाले कार्यक्रमों से सपा के दिग्गजों को दूर ही रखा गया है।

कहा जाता है कि मोहित को राजनीति में स्थापित करने को तानाबाना बुना जा रहा है। आपको बताते चलें कि यादव वह वर्ग है जिसने ब्राह्मण, ठाकुर राजनीतिक नेतृत्व को उत्तर प्रदेश की सत्ता से न सिर्फ बेदखल किया बल्कि मंडल आंदोलन के बाद मायावती को छोड़ दें तो सबसे बड़ी जनसंख्या वाले राज्य में सत्ता में बने रहे। और इस चुनाव में भी करारी टक्कर दे रहे हैं।

2014 के चुनाव में मोदी की आंधी में यादव सत्ता पर असर पड़ा। 2017 के चुनाव में तो सपा मुलायम सिंह के परिवार तक सिमट कर रह गयी। 2012 में 224 सीटें जीतने वाली सपा 2017 में 47 सीटों पर ही सिमट कर रह गयी है। भाजपा ने किसके हिस्से के वोटर हड़प लिए जो 324 के अल्लेपल्ले सीटें पा गयी।

उत्तर प्रदेश में यादव बिरादरी के पांच बार सीएम बने। रामनरेश यादव से शुरू करें तो तीन बार मुलायम सिंह यादव और एक बार अखिलेश यादव। पिछड़ों में सर्वाधिक राजनीतिक चेतना यादवों में देखी गयी। जाहिर के घोसी यादव बहुतायत में हैं तो उनका समर्थन कमरिया यादव वर्ग को पूरा रहा जिसके चलते मुलायम परिवार सत्ता में आता जाता रहा। यादवों की राजनीति में यह नया दौर है जब गोत्र के नाम पर राजनीति की बात शुरू हो गयी है।

फिलहाल यूपी की पॉलिटिक्स में यादवों की पहचान सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव और उनके परिवार से ही है, जबकि बिहार में लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार से. सियासी विश्लेषक मानते हैं कि इन दोनों की वजह से यादवों का विकास अन्य पिछड़ी जातियों के मुकाबले ज्यादा हुआ। और यही वो चोर दरवाजा है जिसकी चाभी संभवतः बीजेपी के हाथ लग गई है।

भाजपा का फोकस अब तक गैरयादव पिछड़ी जातियों पर रहा है पर अब चौधरी हरमोहन सिंह यादव की पीढियों के दम पर भाजपा घोसी वर्ग के यादवों पर डोरे डालने का पूरा प्लान बना चुक है। सूत्र बताते हैं कि मेहरबान सिंह का पुरवा में सपा से सांसद सुखराम सिंह यादव ने यादव महासभा के राज्य प्रतिनिधियों की हाल में बुलायी बैठक में घोसी वर्ग के यादव की उपेक्षा की दलील देते हुए कुछ विचार करने को कहा। मतलब साफ है।

यादवों के इतिहास और राजनीति से जुड़ा ब्लॉग ‘यादवगाथा’ के लेखक उमेश यादव बताते हैं कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भी यूपी के यादवों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। उमेश का दावा है कि साल 1922 में गोरखपुर में हुए चौरीचौरा आंदोलन में हिस्सा लेने वाले ज्यादातर लोग दलित एवं पिछड़ी जाति के थे और इनका नेतृत्व भी भगवान अहीर कर रहे थे। भगवान अहीर को इसके लिए फांसी की सजा भी सुनाई गई थी।

चौधरी रघुबीर सिंह भी एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे। आज़ादी से पहले ही यादव नेता चौधरी नेहाल सिंह, चौधरी गंगाराम, बाबूराम यादव और लक्ष्मी नारायण ने यूपी, दिल्ली और मध्य भारत के कुछ हिस्सों में उपजातियों में बंटे हुए यादवों को एक करना शुरू कर दिया था। 1908 में ही इन नेताओं ने यादव सभा बनाई। 1908 में अहीर गजट नामक पत्रिका भी निकाली गयी। यादवों की एकजुटता का इतिहास पुराना है पर अब राजनीतिक हितों और परिवारवाद के चलते यह एकजुटता प्रभावित होती दिख रही है।

आज की चुनावी राजनीति में एम-वाई समीकरण चर्चा में है यानी मुस्लिम और यादव वोट। यही मुलायम की सियासी गणित था। तभी तो उन्हें मुल्ला मुलायम भी कहा जाता था। 1992 के बाद एम-वाई फैक्टर अधिक प्रभावी हो गया था। इस 2022 के चुनाव में भी यह प्रभावी होता दिख रहा है।

सीएसडीएस के एक सर्वे के मुताबिक 2009 के लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा 73% यादव समाजवादी पार्टी के साथ थे। जबकि 2014 के चुनाव तक इसमें बीजेपी सेंधमारी कर चुकी थी और यह घटकर सपा के पक्ष में सिर्फ 53% ही रह गया। बीजेपी को 27% यादवों के वोट हासिल हुए। जबकि 2009 में उसे इस जाति के सिर्फ 6 फीसदी ही वोट मिले थे। कांग्रेस ने जहां 2009 में 11 फीसदी यादवों का समर्थन हासिल किया था वहीं 2014 में वह और कम होकर सिर्फ आठ फीसदी ही रह गया।

सर्वे का दिलचस्प पहलू ये है कि पिछले दो चुनावों में बसपा के पक्ष में पांच फीसदी से अधिक यादव नहीं आए। बात 2007 और 2012 के विधानसभा चुनाव की करें तो कांग्रेस को इस जाति के सिर्फ चार-चार परसेंट वोट मिले. सपा को 2007 में 72% जबकि 2012 में घटकर सिर्फ 66% यादवों का मत हासिल हुआ। बीजेपी लगातार इस जाति में पैठ बनाने की कोशिश करती नजर आ रही है। चौधरी परिवार की सपा से बगावत और वर्ग फैक्टर इस चुनाव में भाजपा को मजबूती दे सकता है। घोसी और कमरिया के नाम पर इनमें सियासी बेचैनी देखने को मिलती है।

किस दल के साथ कितने यादव (2009 के चुनाव में)

समाजवादी पार्टी-73 प्रतिशत
कांग्रेस- 11 प्रतिशत
भाजपा- 06 प्रतिशत
बसपा-05 प्रतिशत

2014 के लोकसभा चुनाव में

सपा- 53 प्रतिशत
भाजपा- 27 प्रतिशत
बसपा- 05 प्रतिशत
कांग्रेस -08 प्रतिशत

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