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आखिर अयोध्या क्यों छोड़ी योगी आदित्यनाथ ने

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-नेतृत्व की इच्छा के बिना गोरखपुर से लड़ने का निर्णय
-राम मंदिर के माहौल से ध्रुवीकरण चाहती थी भाजपा
-107 उम्मीदवारों की पहली सूची में चेंज देख लोग चौंके
-अयोध्या के अब तक 44 दौरे कर चुके हैं सीएम योगी
-राम मंदिर के माहौल बना ध्रुवीकरण चाहती थी भाजपा
चुनाव डेस्क।
कहां से लड़ेंगे योगी आदित्यनाथ? अयोध्या से? मथुरा से? या कहीं और से? गोरखपुर का तो नाम भी नहीं लिया जाता था। बाद में यह खबरें आने लगी कि अयोध्या से ही लड़ेंगे। आखिर 44 दौरे कर चुके हैं। सारी अटकलों को फुस्स करते हुए योगी के कहने पर 107 प्रत्याशियों की सूची में उनका नाम गोरखपुर शहर विधानसभा सीट से फाइनल हुआ। नाम घोषित कर दिया गया।

गोरखपुर नाथ संप्रदाय का मठ है जिसके मठाधीश खुद योगी हैं। भाजपा ने 107 सीटों पर प्रत्याशियों की सूची जब जारी की तो लोगों को उम्मीद थी कि योगी का अयोध्या विधानसभा सीट से आ सकता है पर ऐसा नहीं हुआ। लोग चौंक गए कि योगी का नाम अयोध्या से नहीं है। पार्टी चाहती थी कि योगी को अयोध्या से लड़ाकर लाभ लिया जाए।

राम मंदिर के नाम पर यूपी में माहौल बन सकता है। पर शायद भाजपा छोड़कर सपा में जा रहे मंत्रियों और विधायकों के कारण योगी को फैसला लेना पड़ा। हारने पर बड़ी किरकिरी होती। मुख्यमंत्रित्व कार्यकाल में योगी ने अयोध्या के 44 दौरे किए और सभाएं संबोधित की।

सूत्रों की मानें तो पार्टी हाईकमान की भी मंशा यही थी। योगी जैसा कट्‌टर हिंदुत्व का चेहरा अयोध्या से उतरता तो पूरे उत्तर प्रदेश में वोटों के ध्रुवीकरण की उम्मीद ज्यादा थी। लाभ उत्तराखंड में भी मिल सकता था। मगर खुद योगी अपने गढ़ गोरखपुर से उतरकर पहले अपनी जीत सुनिश्चित करना चाहते थे।

दरअसल, अयोध्या ऐसी सीट है, जहां 93.23% आबादी हिंदू होने के बावजूद भाजपा की जीत तय नहीं रही है। 2012 में यह सीट सपा ने जीती थी, 2017 में मोदी-योगी लहर में भाजपा के हाथ आई। इस बार समीकरण क्या बनेंगे, अभी यह तय नहीं है।

2012 के चुनाव में सपा के पवन पांडे जीते थे। भाजपा के लल्लू सिंह और बसपा के टिकट पर लड़े वेदप्रकाश गुप्ता तीसरे स्थान पर थे। बाकी पार्टियों और निर्दलीयों का वोट शेयर भी ठीक-ठाक था। 2017 के चुनाव का वोट शेयर बताता है कि सपा का वोट बैंक ज्यादा नहीं खिसका। बसपा का वोट शेयर थोड़ा बढ़ा। लेकिन मोदी-योगी लहर में बाकी सभी पार्टियों और निर्दलीयों का सूपड़ा साफ हो गया। सिर्फ 5.92% वोट मिले। यानी 2012 के मुकाबले 22% वोट घटे जो सीधे भाजपा को गए।

अबकी सपा गठबंधन समीकरण बिगाड़ सकता है। इसी आशंका के मद्देनजर योगी को अय़ोध्या रास नहीं आयी। बताते हैं कि अयोध्या में ब्राह्मण खुश रहते तो भाजपा की जीत पक्की थी। वहां पर शहरी क्षेत्र में 70 हजार ब्राह्मण, 28 हजार क्षत्रिय हैं। 27 हजार मुस्लिम के साथ ही 50 हजार दलित हैं। इसके साथ ही शहरी क्षेत्र में यादव वोटरों की संख्या 40 हजार है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के मित्रसेन यादव यहां से सांसद चुने जाते थे।

बाद में वह सपा में चले गए। योगी उतरते तो टक्कर कड़ी रहती और उन्हें यहां अपना ज्यादा समय देना पड़ता, क्योंकि सपा के मौजूदा विधायक पवन पांडेय का दबदबा यहां अधिक है। योगी के यहां से हटने के बाद अयोध्या सदर सीट भाजपा के हाथ से निकलती दिख रही है।

अयोध्या सदर विधानसभा से योगी के चुनाव लड़ने के कयासों के बीच भाजपा कार्यकर्ता के साथ ही संत, साधु और मंदिर से जुड़े लोगों ने जनसंपर्क शुरू कर दिया था। 8 से 12 लोगों की टीम बना करके घर-घर संपर्क किया जा रहा था। साधु-संत मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं से जहां योगी के पक्ष में वोट डालने की बात कह रहे थे।

व्यापारी भी लगातार योगी के पक्ष में प्रचार कर रहे थे। वार्ड स्तर पर भाजपा का स्थायी कार्यालय बनाया गया था। जहां से प्रत्येक वार्ड में रहने वाले लोगों को योगी के पक्ष में सहेजा जा सके। योगी खुद गोरखपुर से लड़ने की इच्छा रखने लगे। बताते हैं कि वह कहते हैं कि उनके गोरखपुर छोड़ने से 17 विधानसभा सीटों पर फरक पड़ता। यह क्षेत्र स्वामी प्रसाद मौर्य के भी दबदबे वाला बताया जाता है। योगी आदित्यनाथ को यह भी भय था कि अयोध्या का जातीय गणित सदैव काम नहीं आता।

पहली बार जब 1967 में वैश्य बिरादरी के बृजकिशोर अग्रवाल भारतीय जनसंघ से चुनाव जीते, तब वैश्यों की शहरी आबादी बहुत नहीं थी। उसके बाद विश्वनाथ कपूर ने बीकेडी के ब्राह्मण प्रत्याशी को हराया। 1974 के चुनाव में जनसंघ के वेद प्रकाश अग्रवाल ने बीकेडी के ही संत श्री राम द्विवेदी को बहुत ही कम अंतर से हराया।

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1977 में जयशंकर पांडेय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े। वह समाजवादी खेमे के थे। ब्राह्मण कांग्रेस का वोट बैंक था। लेकिन जनता लहर में वह जातीय समीकरण के विपरीत होते हुए भी चुनाव जीत गए, लेकिन अगले ही चुनाव में उन्हें चंद परिवारों तक सीमित खत्री बिरादरी के निर्मल खत्री से शिकस्त मिली।

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