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तेजस्वी राजाओं के बंगले : बाप रे बाप…

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सब जानते हैं कि आज की राजनीति नेताओं के लिए समाज-सेवा से ज्यादा सत्ता-सुख की भोग-चाहना है। वे दिन बहुत पीछे छूट गए जब- ‘भिक्षुक होकर रहते सम्राट, दया दिखाते घर घर घूम।’ आज सम्राट जैसा जीवन और ऐश्वर्य मंत्रियों का है। राजतंत्र और सामंत को कोसने वाले समाजवादियों का चेहरा कितना घिनौना और कृत्य कितना भ्रष्ट है-किसी से छिपा हुआ नहीं है। यहां तक कि साम्यवादी कुछेक नेताओं को छोड़ दें तो जनवादी प्रतिबद्धता की दुहाई देने वाले अनेक नेताओं का रहन-सहन और खान-पान तथा भोग-विलास किसी राजा-महाराजा और सामंत से तनिक भी कम नहीं है ।

बल्कि राजा को तो सब कुछ व्यवस्थित करने के लिए सचेष्ट रहना और चिंतित होना पड़ता था। जनतंत्र में तो सारी व्यवस्था और चिंता नौकरशाह को करनी पड़ती है। मंत्री जी को तो सक्रिय होकर सारे सुख-संसाधनों का भोग करते जाना है केवल। गाड़ी, बंगला, यातायात, धुलाई, सफाई चिकित्सा सब सरकार की चिंता जबकि सरकार स्वयं मंत्री जी होते हैं लेकिन व्यवस्था की सरकार तो सिस्टम और नौकरशाही है।

पंचायत से लेकर संसद तक जो जनतंत्रीय प्रणाली और जनतांत्रिक मूल्य हैं वे सबके सब ध्वस्त और छिन्न-भिन्न हैं। संविधान का हवाला देते असंवैधानिक और संसद में शोर मचाते असंसदीय कार्य तथा व्यवहार बेशर्मी से खूब खूब किए जा रहे हैं। शोर मचाते हुए ईमानदारी, नैतिकता, सादगी और सच्चाई की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं। भोली भाली जनता को भरमा-भटकाकर दिन-रात बड़गलाया जा रहा है।

जनता धर्म, भाषा, क्षेत्र, दल, मजहब और जाने किस किस अनर्गल प्रलापों और प्रपंचों में फंसकर आपस में लड़-मर रही है। सत्ता-लोलुप नेता इसका लाभ उठाता है। वह सारी सुविधाएं जनता की बलि चढ़ाकर हासिल करता है। साधु स्वभाव के नेता अब दुर्लभ हैं। संत और त्यागी अब कौन है भला? सत्ता में सरदार वल्लभ भाई पटेल, राजेंद्र प्रसाद, लालबहादुर शास्त्री, अब्दुल कलाम, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता हुए जो सेवा, सादगी, त्याग, निष्ठा, संवेदना, संस्कृति की मिसाल हैं।

राजनीतिक अवमूल्यन के इस विकट दौर में भी कुछ नेता हैं जिनके विचारों से असहमति होने के बावजूद उनकी सादगी और ईमानदारी पर भरोसा किया जाता है। वे जनता, जनपद और देश के लिए सोचते हैं। अपनी दलगत मजबूती बनाए रखने की मजबूरी में वे अनाप-शनाप बोलते हुए भी अपनी मितव्ययिता और सादगी बचाए रखते हैं। एक तरफ उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव का सैफई जलसा ऐश्वर्य और खर्च का बड़ा दृश्य हुआ करता था तो दूसरी तरफ मुलायम सिंह को मात देकर मुख्यमंत्री बनी मायावती का मायालोक कुबेर का खजाना लूटकर निर्मित हुआ था।

दोनों ने सत्ता को वैयक्तिक सुख-भोग का माध्यम मान लिया था। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रही जयललिता का महँगा ठस्सा जिसने भी देखा फटी आँखों से वह देखता ही रह जाता था। हजारों जोड़े जूते और चप्पल-यह चलचित्र की नायिका मात्र की उपलब्धि नहीं थी. यह तो जनता के खून-पसीने की प्रदर्शनी थी। शौक से ज्यादा भोग का आडम्बर था।

लेकिन त्रिपुरा के मुख्यमंत्री रहे मानिक दा सादगी के प्रतिरूप थे। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी अपनी सादगी के लिए जानी जाती हैं। उनकी आक्रामकता और राजनीतिक पहल से सहमति-असहमति हो सकती है, मगर उनकी कर्मनिष्ठा और सादगीपूर्ण जीवन-शैली पर टिप्पणी नहीं की जा सकती है

युवा मुख्यमंत्री रहे अखिलेश यादव को सत्ताच्युत होने के बाद जब सरकारी बंगला छोड़ना पड़ा तो उन्होंने कीमती सामानों को निजी मान निजी भवन में उठा लाये, जो चीजें नहीं आ सकती थी उन्हें तहस-नहस कर दिया। इस आचरण को क्या कहा जाए? यह कैसी नैतिकता है? नीतीश कुमार की सरकार में उपमुख्यमंत्री रहे तेजस्वी का सरकारी बंगला-प्रकरण जोरदार चर्चे में है।

उच्चतम न्यायालय के आलोक में उच्च न्यायालय पटना ने पूर्व के मुख्यमंत्रियों के बंगले को खाली करने और कराने का निर्देश दिया तो सारे बंगले अपने सच के साथ जनलोक में निकल कर आ गए। तेजस्वी के बंगले का वैभव देख सब भौंचक रह गए। किसी बड़े पंचसितारा होटल की तरह ही नहीं बल्कि कई मायनों में उससे ज्यादा सुविधाजनक। विलासिता की भव्यता से भरे सारे कमरे।

19 फरवरी 2019 को पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला आया कि पूर्व मुख्यमंत्रियों को खाली करना होगा जिंदगी भर के लिए मुफ्त में मिला सरकारी बंगला। इस बावत बिहार सरकार के द्वारा बनाए गए कानून को कोर्ट ने असंवैधानिक कहते हुए राजकीय आदेशों को निरस्त कर दिया। मुख्य न्यायाधीश एपी शाही ने कहा कि- ‘यह सब आपलोगों के धन का दुरुपयोग है।’ फैसले के अनुसार सारी सुविधाएँ छीन ली गई। बहुत ही उचित और जनसंवेदी फैसला. सबने तारीफ की और कहा- ‘न्यायपालिका ही उम्मीद और भरोसा है।

पूर्व मुख्यमंत्रियों में हड़कंप मचा। फैसला कोर्ट का था इसलिए नेताओं ने अनर्गल प्रलाप नहीं किया। जब राजद सुप्रीमो लालू यादव के पुत्र तेजस्वी के बंगले का अवलोकन किया गया तो सबकी नजरें चुँधिया गई। छियालीस एसी एक अकेले आदमी के लिए। ऊपर से स्टाफ, एस्कॉर्ट और तमाम वित्तीय सुविधाएँ भी। यह अय्याशी नहीं तो और क्या है?

संजय पंकज (मुजफ्फरपुर)
साहित्यकार, पत्रकार और लेखक

जन प्रतिनिधि को आवासीय सुविधा सिर्फ उसके लिए ही नहीं बल्कि दूर सुदूर से कार्य के लिए आई क्षेत्र की जनता के रैनबसेरे के ख्याल से भी मानी गईं। मगर सुविधा के नाम पर नेताजी- बल्ले बल्ले ! ये नेता जाने किस मुँह से राजशाही की निन्दा करते हैं! भारत के राजाओं का भवन अब संग्रहालय बन गए या फिर होटल बन गए। कई खंडहरों में तब्दील होकर भी दर्शनीय भर बनकर रह गए। राजभवन को देखकर किसी संवेदनशील व्यक्ति के भीतर मिश्रित प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है, मगर प्रजातंत्र के रास्ते आई इस सामंती प्रवृत्ति पर किस तरह की टिप्पणी की जाए-जनता तय करेगी।

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