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प्रसंगवश : हमारी हिंदी एक दुहाजू की नयी बीबी

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हिंदी दिवस मंगलवार को बीत गया लेकिन इसी बहाने हिंदी की हालत पर बहस भी शुरू हुई है। इसी संदर्भ में हम प्रकाशित कर रहे हैं राघवेंद्र दुबे का विचारोत्तेजक लेख। उनकी फेसबुक वॉल से साभार

साथियों को याद होगा ‘दिनमान’। रघुवीर सहाय के संपादकत्व में इस पत्रिका की वह छवि बन गयी कि इसे हाथ में लिए या गोलिया कर कांख में दाबे शख्स को इंटेलेक्चुअल ( बुद्धिधर्मी ) मान लिया जाता था। वैचारिकता और संदर्भ समृद्धि के मद्देनजर ऐसी पत्रिका दूसरी भाषाओं या अंग्रेजी में तो नहीं थी । 1974 के दौर में मुझ जैसे ‘ दिनमान ‘ का संपादकीय रट डालते थे । राजनीतिक सक्रियों के बीच स्टडी सर्किल या बहस – मुबाहिसे के केंद्र में ‘ दिनमान ‘ अपरिहार्य था । विजयदेव नारायण साही , सर्वेश्वर दयाल सक्सेना , रघुवीर सहाय, साहित्य और पत्रकारिता में लोहिया के प्रतिनिधि थे ।

‘दिनमान’ ने हिंदी पत्रकारिता को वैश्विक चेहरा ही नहीं दिलाया बहुत से सफल प्रयोग भी किये ।अब बात पत्रकारिता के दूसरे सबसे उज्ज्वल नक्षत्र राजेन्द्र माथुर की जो सक्रिय या संस्थागत पत्रकारिता में आने से पहले अंग्रेजी के प्राध्यापक थे । उन सा लिखने वाला खासकर राष्ट्रीय – अंतराष्ट्रीय मुद्दों पर , अंग्रेजी की आकाश गंगा में उनके समकालीनों में कोई नहीं था । स्व. प्रभाष जोशी का लिखा याद आ रहा है जो उन्होंने माथुर जी के देहावसान पर लिखा था — ‘ अब हम अंग्रेजी वालों से कैसे कह सकेंगे – है तुम्हारे पास कोई राजेन्द्र माथुर ..? ‘ दिलीप पडगांवकर जैसे अंग्रेजी दिग्गजों को राजेन्द्र माथुर को पढ़ने के लिये हिंदी पढ़नी / सीखनी पड़ी ।

एक बहुत वरिष्ठ पत्रकार ने मुझसे कहा कि हिंदी के अखबारों ( दरअसल हिंदी में अखबारों ) में रिपोर्टर या उप संपादक की भर्ती के लिए होने वाले इम्तहान में अंग्रेजी के न्यूनतम व्यावहारिक ज्ञान पर खासा जोर होता है । उसे यूएनआई या पीटीआइ का तार दे दिया जाता है अनुवाद के लिये । उससे यह नहीं पूछा जाता कि वह हिंदी कितनी जानता है ।

हम मान बैठे हैं कि हिंदी पट्टी में पैदा हो जाने और उसी माहौल में नहाने – खाने भर से कोई हिंदी में सिद्धहस्त हो जाता है । ठीक उसी तरह जैसे इंग्लैंड के मछुआरे ,पांच – सात सितारा होटलों के बेयरे और विमान परिचायिकाएँ हमें अंग्रेजी दक्ष लगती हैं । यह न पचने वाला तथ्य हो सकता है लेकिन सच है कि आज के हिंदी अखबारों के 80 प्रतिशत पत्रकारों को हिंदी नहीं आती । वह शब्द दरिद्रता के शिकार हैं । बहुत घिसे और अर्थ की केंचुल तक बदल चुके अधिकतम 12 से 20 शब्दों के सहारे ही किसी भी बहु प्रसारित हिंदी अखबार का पहला पन्ना सालों से निकल रहा है ।

गोरखपुर के कुछ पत्रकारों को जानता हूं जिनसे उनका ‘ एथी – ओथी , ‘ जो है सो ‘ , छीन लिया जाए तो दो लाइन बोलना मुश्किल हो जाएगा ।आचार्य रामचन्द्र शुक्ल , आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी , रामविलास शर्मा, नामवर सिंह , विश्वनाथ त्रिपाठी , मैनेजर पांडेय आदि कुछ नाम छोड़ दें जिनकी वजह से हिंदी विमर्श की भाषा बन सकी । श्यामा चरण दुबे , लाल बहादुर वर्मा और गिरीश मिश्र जैसे लोगों का कृतज्ञ होना पड़ेगा जिनकी वजह से हिंदी समाजशास्त्र , इतिहास , अर्थशास्त्र के उच्च अध्ययन की भाषा बन सकी ।हिंदी साहित्य में भी वे जो गैर हिंदी हलके से आये , कमाल किया । रामविलास शर्मा, विजयदेव नारायण साही, चन्द्रबली सिंह से लेकर भीष्म साहनी, मोहन राकेश तक कम से कम 50 नाम मैं ले सकता हूं जो मूलत: अंग्रेजी के थे।

हिंदी का सबसे ज्यादा नुकसान किया आज के हिंदी के मास्टर साहबों ( प्रोफेसरों ) ने जो अभी भी रीति काल और वर्णक्रम के तीन- तेरह में लटके हैं और वैश्विक साहित्य बोध के स्तर पर पैदल या अपंग । बहरहाल ऐसे प्रोफेसर किसी भी ज्ञानानुशासन में हों , पर्याप्त नाश कर रहे हैं । हिंदी का सबसे अधिक भला किया हिंदी फिल्मों ने । आजकल तो एक और खतरनाक खेल हो रहा है । ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ जंग की हमारी मूल अभिव्यक्ति हिंदी को कुछ लोग ‘ सनातन ‘ और ‘ नव राष्ट्रवाद ‘ की भाषा बनाने में जुट गए हैं । एक बड़े पत्रकार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हिंदी के सबसे बड़े उद्धारक दिखाई दे रहे हैं । जैसे उद्धारक वह हिंदुत्व के हैं या मंदिर के हैं । वे हिंदी को डंटा भांजकों की भाषा बना देंगे ।

फिलवक्त आइये यह कविता पढ़ें —

हमारी हिंदी एक दुहाजू की नई बीबी है
बहुत बोलने वाली बहुत खानेवाली बहुत सोनेवाली
गहने गढ़ाते जाओ
सर पर चढ़ाते जाओ
वह मुटाती जाए
पसीने से गन्धाती जाए घर का माल मैके पहुँचाती जाए
पड़ोसिनों से जले
कचरा फेंकने को लेकर लड़े
घर से तो ख़ैर निकलने का सवाल ही नहीं उठता
औरतों को जो चाहिए घर ही में है
एक महाभारत है एक रामायण है तुलसीदास की भी राधेश्याम की भी
एक नागिन की स्टोरी बमय गाने
और एक खारी बावली में छपा कोकशास्त्र
एक खूसट महरिन है परपंच के लिए
एक अधेड़ खसम है जिसके प्राण अकच्छ किये जा सकें
एक गुचकुलिया-सा आँगन कई कमरे कुठरिया एक के अंदर एक
बिस्तरों पर चीकट तकिए कुरसियों पर गौंजे हुए उतारे कपड़े
फ़र्श पर ढंनगते गिलास
खूंटियों पर कुचैली चादरें जो कुएँ पर ले जाकर फींची जाएँगी
घर में सबकुछ है जो औरतों को चाहिए
सीलन भी और अंदर की कोठरी में पाँच सेर सोना भी
और संतान भी जिसका जिगर बढ गया है
जिसे वह मासिक पत्रिकाओं पर हगाया करती है
और ज़मीन भी जिस पर हिंदी भवन बनेगा
कहनेवाले चाहे कुछ कहें
हमारी हिंदी सुहागिन है सती है खुश है
उसकी साध यही है कि खसम से पहले मरे
और तो सब ठीक है पर पहले खसम उससे बचे
तब तो वह अपनी साध पूरी करे ।
* रघुवीर सहाय (1957)

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