क्या लालू जी के ‘गरीब रैला’ की लकीर पार कर पाएगी NDA की संकल्प रैली : शिवानंद तिवारी

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पटना के गांधी मैदान में पहली आम सभा मैंने 1956 में देखी थी. उसी वर्ष पटना के बी एन कालेज में छात्रों पर गोली चली थी. दीनानाथ पांडे जी शहीद हुए थे. उसके कुछ ही दिनों बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की सभा गांधी मैदान में हुई थी. मेरे लिए वह पहली सभा थी गांधी मैदान में जिसको मैंने देखा था और उसमें शामिल हुआ था.

उसके बाद से अब तक अनेकों सभाएं तथा रैलियों को देखने का मौका मिला है. मुझे लगता है कि अब तक जितनी रैलियों को मैंने देखा है उनमें गरीब रैला सबसे बड़ी लकीर है. उस रैली का आयोजन 1995 में लालू जी ने किया था. वह उनकी अकेले की रैली थी. उसके बाद और भी रैलियां गांधी मैदान में लालू जी ने बुलाई. लेकिन वह स्वयं गरीब रैला की लकीर को पार नहीं कर पाए.

अब भाजपा गठबंधन की रैली होने जा रही है. दिल्ली और पटना दोनों जगह उनकी सरकारें हैं. इस रैली में नरेंद्र मोदी जी नीतीश कुमार जी और रामविलास पासवान जी जैसे दिग्गज लोगों का सामूहिक बल लगा है. अकूत साधन झोंका जा रहा है. सरकार का बल अलग से है. तीनों पार्टियों के कार्यकर्ता रैली को ऐतिहासिक बनाने मैं दिन रात लगे हुए हैं.

अब देखना है की 1995 में लालू जी के उस गरीब रैला के लकीर को यह आयोजन पार कर पाता है या नहीं. हालांकि मुझे शुबहा है कि सब कुछ के बावजूद लालू जी के उस रैली को पार कर पाना इनके लिए संभव हो पाएगा.

लालू जी के रैली के पीछे साधन से ज्यादा जनता का बल था. अद्भुत थी वह रैली ! रैली पटना में थी या पटना रैली में यह कहना कठिन था. प्रधानमंत्री सहित मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्रियों का बल जिस रैली के पीछे लगा हुआ है उसका नतीजा क्या होता है यह देखना दिलचस्प होगा.