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तेजस्वी यादव का बंगला: अतीत के झरोखे से वर्तमान का अवलोकन

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-ब्रह्मानंद ठाकुर

पिछले दिन अखबार में एक खबर पढ़ने को मिली। खबर थी सूबे बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव जी, जिनके जिम्मे भवन निर्माण विभाग भी था, ने अपने सरकारी बंगले की सजावट (मकराना के संगमरमर, इटालियन टाइल्स, स्वचालित आरामदायक सोफे, बाथरूम में आधुनिक झरने, कीमती फर्नीचर आदि) में करीब 5 करोड़ रूपये खर्च किये। हालांकि अब यह बंगला उनसे वापस ले लिया गया है। ऐसा तब हुआ है जब भारत में कथित रूप से लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम है।

कहते हैं कि लोकतंत्र में नेता या मंत्री जनता के प्रतिनिधि होते हैं। नेता के खुद का जीवन सादा और विचार उन्नत होना ही उसका खास गुण होने की बात भी कही-सुनी जाती रही है। अतीत में इसके अनेक उदाहरण भी हुए हैं। गांधी को ही देख लीजिए। ऐसे और भी अनेक महापुरुष हमें मिल जाएंगे जिन्होंने रहन-सहन की सादगी को अपना व्रत मान लिया था। बिहार के ही समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर इसके उदाहरण हैं जिन्होने दो-दो बार मुख्यमंत्री रहते हुए भी अपना एक मकान तक ढंग का नहीं बनवा सके। 

यह लोकतंत्र का जमाना है। सामंतवाद के गर्भ से पैदा हुए पूंजीवादी लोकतंत्र का। चलिए थोड़ा पीछे लौटते हैं। जब दुनिया के कुछ देशों में सामंती समाज व्यवस्था को ध्वस्त कर समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के सिद्धांत पर पूंजीवादी व्यवस्था स्थापित हो चुकी थी, तब भारत में सामंती व्यवस्था मौजूद थी। आजादी मिलने तक यहां सामंती व्यवस्था कायम थी। स्वतंत्रता से पूर्व भारत में 565 छोटे-बड़े देशी राजे-रजवाड़े थे। सबों की अपनी-अपनी आर्थिक क्षमता के अनुरूप अलग-अलग शान शौकत।     

अभी दो दिन पहले मैने डोमिनीक लापियर लैरी कालिंस की किताब ‘फ्रिडम ऐट मिड नाईट’ का हिन्दी अनुवाद मंगाया है। 496 पृष्ठों की इस किताब में प्राक्कथन और उपसंहार समेत 21 अध्याय है। इस पुस्तक का एक अध्याय है ‘राजा-महाराजाओं के शाही चोंचलेंं।’ आज इस अध्याय को पढ़ते हुए बिहार विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष और पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव जी द्वारा सरकारी आवास की सजावट पर खर्च के साथ देशी रियासतों के राजा-महाराजाओं की शान शौकत में थोड़ी समानता दिखाई पड़ गई।

उन रियासतों के राजा-महाराजाओं के शान शौकत पर ‘आजादी आधी रात को’ किताब में काफी कुछ लिखा गया है।  वैसे तो यह राजशाही युग की बीती बातें हैं लेकिन आज जब अपने चतुर्दिक दृष्टि डालता हूं तो मुझे उसमें कुछ मौलिक बदलाव नहीं दिखाई देता है। आज इस पहली कड़ी में प्रस्तुत है रियासत जूनागढ़ का नवाब कुत्तों का अजीब तमाशबीन था। उनके प्रिय कुत्ते जिन घरों में रखे जाते थे, उनमें टेलिफोन और बिजली की सुविधा के साथ- साथ कुछ घरेलु नौकर भी रहते थे.

ऐसे घरों की बनावट और सुख-सुविधा उनकी प्रजा में से इने-गिने लोगों को ही सुलभ होती होगी। जब कोई कुत्ता मर जाता था, तो उसका शव कुत्तों के कब्रिस्तान में ले जाया जाता था, शव यात्रा के साथ शोपां के शोक-संगीत की धुन बजाई जाती थी और उसकी कब्र पर संगमरमर का मकबरा बनवा दिया जाता था। उन्होंने बाकी नामक एक लैब्राडोर कुत्ते के साथ अपनी लाडली कुतिया रोशना की शादी इतनी धूमधाम से रचायी थी कि उसमें भारत के सभी राजे- महराजाओं और बड़े- बड़े प्रतिष्ठित लोगों को आमंत्रित किया गया था।

विविष्ठ अतिथितियों में वायसराय का नाम भी शामिल था और वह इस बात से बहुत खीझ गये थे. वायसराय ने आने से मना कर दिया था। फिर भी उस बारात में डेढ़ लाख अतिथि आए थे। आगे- आगे नवाब साहब के बाडीगार्डों का रिसाला और उनके सजे-धजे हाथी चल रहे थे। शादी के जुलूस के बाद नवाब साहब ने वर- वधू के सम्मान में बहुत शानदार प्रीतिभोज का आयोजन किया था, इसके बाद नव-वावाहित जोड़े को उनके बहुत ही सुन्दर नये घर में पहुंचा दिया गया था।

इस पूरे समारोह में नवाब साहब ने नौ लाख रुपये खर्च किए थे, जिससे उनकी 6,20,000 की प्रजा में से 12000 लोगों की वर्ष-भर की सम्पूर्ण बुनियादी जरूरतें पूरी की जा सकती थीं।
    अब अगली कड़ी में मैसूर के आलीशान भवन की चर्चा।

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