भारतीय खेल की सबसे जुझारू आइकॉन मैरीकॉम

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ऐसे समाज में जहां आज भी पढ़ोगे लखोगे बनोगे नवाब खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब की ही मानसिकता हावी हो वहां मैरीकॉम जैसी खिलाड़ी की बेमिसाल उपलब्धि आश्चर्य में डालने है। मेरीकॉम को इस मुकाम तक पहुंचने के लिए कांटों से भरा रास्ता पार करना पड़ा है। मैरीकॉम जैसी सफलता अभी तक भारतीय खेलों के इतिहास में बिलियडर्स और स्नूकर के दिग्गज पंकज आडवाणी ने और शतरंज के महारथी विश्वनाथन आनंद ने ही हासिल की है.

पंकज आडवाणी ने आईबीएसएफ विश्व बिलियर्ड्स चैंपियनशिप के लंबे और छोटे दोनों प्रारूपों के खिताब को रिकॉर्ड चौथी बार अपने नाम कियाहै। वहीं आनंद पांच बार के फिडे विश्व चैंपियन हैं. वह दो बार रैपिड प्रारूप में भी विजेता रह चुके हैं। मैरी कॉम ने विश्व चैंपियनशिप में खिताबी सिक्सर लगाते हुए इतिहास रचा है। . दिल्ली के केडी जाधव हॉल में हुई 48 किलो वर्ग के फाइनल मुकाबले में उन्होंने यूक्रेन की हेना ओखोटा को 5-0 (30-27, 29-28, 29-28, 30-27, 30-27) से हराया और रिकॉर्ड छठी बार महिला विश्व कप का खिताब जीतने का गौरव हासिल किया. उनके नाम एशियाई चैंपियनशिप में भी पांच स्वर्ण और एक रजत पदक हैं।

इससे पहले मैरी कॉम ने साल 2002, 2005, 2006, 2008 और साल 2010 में विश्व चैंपियनशिप का खिताब अपनी झोली में डाला था. मैरी कॉम ने एक खिताब 45 किग्रा, तीन वर्ल्ड खिताब 46 किग्रा भार वर्ग और आखिरी दो खिताब 48 किग्रा वजन वर्ग मे जीता है. इसके अलावा साल 2001 में मैरी इसी भार वर्ग में उपविजेता रही थीं. और उन्होंने सिल्वर पदक जीता था. यही नहीं, मैरी विश्व चैंपियनशिप (महिला एवं पुरुष) में सबसे अधिक पदक भी जीतने वाली खिलाड़ी बन गई हैं. मैरी कॉम छह स्वर्ण और एक रजत जीत कर क्यूबा के फेलिक्स सेवोन (91 किलोग्राम भारवर्ग) की बराबरी की. फेलिक्स ने 1986 से 1999 के बीच छह स्वर्ण और एक रजत पदक जीता था।

कोच ने बच्चों के जन्म के बाद कहा घर बैठो
2007 में मैरीकॉम ने जुड़वा बेटों को जन्म देने के बाद रिंग में वापसी का फैसला किया था। उनको कोच के बर्ताव से भारी धक्का लगा. मां बनने के बाद जब वह पहली बार सेलेक्शन ट्रॉयल के लिए गईं तो ये जिम्मेदारी पुरुष टीम के एक कोच निभा रहे थे. जाहिर है कि मैरी कॉम में पहले जैसी ताकत और फुर्ती नहीं रह गई थी. मैरी कॉम ने कोच से कहा कि थोड़े दिनों में सब ठीक हो जाएगा. लेकिन कोच ने कहा कि अगर तुम फिट नहीं हो तो घर में जाकर बैठो, बॉक्सिंग करने की क्या जरूरत है।

मैरी कॉम को कोच के जवाब से भारी धक्का लगा. उसी दिन उन्होंने ठान लिया कि अब पीछे नहीं हटना है. करारा जवाब देना है. एक बार फिर विश्व चैंपियन बनना है. लेकिन मैरी कॉम की वापसी इतनी आसान नहीं थी. पति आनलुर चाहते थे कि बच्चे कम से कम एक साल के हो जाएं तो वह मुक्केबाजी करें. लेकिन मैरी कॉम नहीं मानीं. हारकर पति को झुकना पड़ा. गुवाहाटी में हुई एशियन चैंपियनशिप के लिए कैंप में गईं तो बच्चे सिर्फ नौ महीने के थे. आनलुर थोड़ा नाराज थे, लेकिन उन्होंने रोका नहीं.

वह जानते थे कि मैरी कॉम जो ठान लेती हैं करके दम लेती हैं. गर्भावस्था के दौरान मैरी कॉम का वजन 67 किलो हो गया था. बेटों को जन्म देने के बाद वजन 61 किला रह गया। अब मैरीकॉम के सामने यह असंभव सी लगने वाली चुनौती थी कि वो विश्व चैंपियनशिप में 46 किलो में कैसे हिस्सा ले सकेंगी. खुद मैरी कॉम को भी इसका भरोसा नहीं था। आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई. उसी का नतीजा था कि वह 2008 में चीन के रिंगबो सिटी में अपना चौथा विश्व चैंपियनशिप खिताब जीतने में सफल रहीं।

मॉम मैरीकॉम ने लगाई पदकों की झड़ी
आमतौर पर जब शादी और बच्चे होने के बाद महिला खिलाड़ियों का करियर खत्म हो जाता है वहीं दूसरी तरफ मैरीकॉम ने नई मिसाल कायम की। उन्होंने 2010 विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक, 2012 लंदन ओलिंपिक में कांस्य पदक, 2010 एशियाई खेलों में कांस्य और 2014 एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक, 2018 कॉमनवेल्थ खेलों में स्वर्ण पदक जीता. उन्होंने ना केवल पदकों का ढेर लगाया बल्कि एक और बेटे को जन्म दिया. उनकी हालिया सफलता ने तो उन्हें दुनिया की महान मुक्केबाज बना दिया है।

छह खिताब जीतने वाली पहली महिला मुक्केबाज
इस जीत के साथ ही 35 वर्षीय स्टार भारतीय मुक्केबाज आयरलैंड की कैटी टेलर को पछाड़कर सबसे अधिक छह बार विश्व चैंपियनशिप में खिताब जीतने वाली पहली महिला मुक्केबाज बन गईं. इससे पहले मैरी कॉम और टेलर पांच-पांच बार विश्व चैंपियनशिप का खिताब जीतकर बराबरी पर थीं.

फेलिक्स सेवोन के रिकॉर्ड की बराबरी
यही नहीं, उन्होंने विश्व चैंपियनशिप के इतिहास में छह खिताब जीतने के विश्व रिकॉर्ड (महिला और पुरुष) की बराबरी भी कर ली. छह बार विश्व चैंपियन बनने का गौरव उनसे पहले पुरुष मुक्केबाजी में क्यूबा के फेलिक्स सेवोन के नाम था. सेवोन ने 1997 में बुडापेस्ट में आयोजित हुई विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर यह रिकॉर्ड अपने नाम किया था.

मैरीकॉम के संघर्ष की कहानी इसलिए भी प्रेरक है क्योंकि वे भारत के सबसे छोटे और आधुनिक सुविधाओं की कमी वाले मणिपुर से निकल कर विश्व फलक पर छा गई हैं। इस दौरान उन्हें खेल संघ के शातिर अधिकारियों से भी मुकाबला करना पड़ा जो खिलाड़ियों को अपना गुलाम समझते हैं और खासकर महिला खिलाड़ियों का यौन शोषण को अपना विशेषाधिकार।

ऐसे लोगों को भी मैरीकॉम ने अपने एटीट्यूड और मुक्के से करारा जवाब दिया है। मैरीकॉम विश्व खेल के आकाश में सबसे चमकीले सितारों में शुमार है। वे भारत की सबसे दुलारी मान बढ़ाने वाली बेटी हैं। उनको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं। भारत माता को उनके जैसी ही कई और बहादुर और जुझारू बेटियों की जरूरत है।