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Aligarh : पीएम मोदी आज करेंगे राजा महेंद्र प्रताप सिंह यूनिवर्सिटी का शिलान्यास

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स्टेट डेस्क : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज अलीगढ़ में राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम पर यूनिवर्सिटी का शिलान्यास करेंगे. पीएम दोपहर बारह के करीब अलीगढ़ पहुंचेंगे. इस मौके पर प्रधानमंत्री का संबोधन भी होगा. इसके बाद वह उत्तर प्रदेश रक्षा औद्योगिक गलियारे के अलीगढ़ नोड और राजा महेंद्र प्रताप सिंह राज्य विश्वविद्यालय के मॉडलों की प्रदर्शनी का अवलोकन करेंगे.

योगी सरकार इस विश्वविद्यालय को महान स्वतंत्रता सेनानी, लेखक, पत्रकार, शिक्षाविद् और सामाजिक सुधारक रहे मुरसान रियासत के राजा महेंद्र प्रताप सिंह के सम्मान में स्थापित कर रही है. मुरसान को अब हाथरस के नाम से जाना जाता है. राजा महेंद्र प्रताप सिंह जाट थे. पश्चिमी यूपी के जाट समाज में उनके प्रति काफी आदर और सम्मान है. विश्वविद्यालय की स्थापना अलीगढ़ की कोल तहसील के गांव लोधा और गांव मूसेपुर करीम जरौली में 92 एकड़ से अधिक रकबे की जमीन पर होगी. अलीगढ़ प्रखंड के 395 कॉलेज इस विश्वविद्यालय से संबद्ध होंगे.

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उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने सितंबर, 2019 में अलीगढ़ में राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम राज्य स्तरीय यूनिवर्सिटी खोलने की घोषणा की थी. इस यूनिवर्सिटी के शिलान्यास कार्यक्रम के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अलीगढ़ पहुंचने और इस यूनिवर्सिटी को खोले जाने को लेकर राज्य सरकार और भारतीय जनता पार्टी जिन बातों को प्रचारित कर रही है उसमें कहा जा रहा है कि वह उन लोगों को सम्मान देने का काम कर रही है जिन्हें पिछली सरकारों में भुला दिया गया.

राजा महेंद्र प्रताप थे कौन?
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आख़िर राजा महेंद्र प्रताप सिंह थे कौन और उनका जाट समाज के लिए क्या योगदान रहा है. राजा महेंद्र प्रताप सिंह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हाथरस ज़िले के मुरसान रियासत के राजा थे. जाट परिवार से निकले राजा महेंद्र प्रताप सिंह की एक शख़्सियत के कई रंग थे. वे अपने इलाक़े के काफ़ी पढ़े-लिखे शख़्स तो थे ही, लेखक और पत्रकार की भूमिका भी उन्होंने निभाई. पहले विश्वयुद्ध के दौरान अफ़ग़ानिस्तान जाकर उन्होंने भारत की पहली निर्वासित सरकार बनाई. वे इस निर्वासित सरकार के राष्ट्रपति थे.

एक दिसंबर, 1915 को राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने अफ़ग़ानिस्तान में पहली निर्वासित सरकार की घोषणा की थी. निर्वासित सरकार का मतलब यह है कि अंग्रेज़ों के शासन के दौरान स्वतंत्र भारतीय सरकार की घोषणा. राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने जो काम किया था, वही काम बाद में सुभाष चंद्र बोस ने किया था. इस लिहाज़ से देखें तो दोनों में समानता दिखती है.

हालांकि सुभाष चंद्र बोस कांग्रेसी थे और राजा महेंद्र प्रताप सिंह घोषित तौर पर कांग्रेस के नहीं रहे. हालांकि उस दौर में कांग्रेस के बड़े नेताओं तक उनकी धमक पहुंच चुकी थी. इसका अंदाज़ा महेंद्र प्रताप सिंह पर प्रकाशित अभिनंदन ग्रंथ में महात्मा गांधी से उनके पत्राचार से होता है.

इस ग्रंथ में प्रकाशित महात्मा गांधी के विचारों को भी जगह दी गई है. गांधी ने महेंद्र प्रताप सिंह के बारे में कहा था, “राजा महेंद्र प्रताप के लिए 1915 में ही मेरे हृदय में आदर पैदा हो गया था. उससे पहले भी उनकी ख़्याति का हाल अफ़्रीका में मेरे पास आ गया था. उनका पत्र व्यवहार मुझसे होता रहा है जिससे मैं उन्हें अच्छी तरह से जान सका हूं. उनका त्याग और देशभक्ति सराहनीय है.”

बहरहाल, सुभाष चंद्र बोस निर्वासित सरकार के गठन के बाद स्वदेश नहीं लौट सके, लेकिन राजा महेंद्र प्रताप सिंह भारत भी लौटे और आज़ादी के बाद राजनीति में भी सक्रिय हुए. 32 साल तक देश से बाहर रहे राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने भारत को आज़ाद कराने की कोशिशों के लिए जर्मनी, रूस और जापान जैसे देशों से मदद मांगी. हालांकि वे उसमें कामयाब नहीं हुए.

1946 में जब भारत लौटे तो सबसे पहले वर्धा में महात्मा गांधी से मिलने गए. लेकिन भारतीय राजनीति में उस दौर की कांग्रेस सरकारों के ज़माने में उन्हें कोई अहम ज़िम्मेदारी निभाने का मौका नहीं मिला.

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