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नहीं रहे भाई जी : चम्बल को डकैतों से मुक्ति दिलाने वाले गांधीवादी सुब्बाराव का निधन

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सेंट्रल डेस्क। प्रख्यात गांधीवादी नेता और चंबल की धरती को डकैतों के आतंक से मुक्ति दिलाने वाले डा एसएन सुब्बा राव का निधन हो गया है। श्री राव ने बुधवार काे तड़के 4:00 बजे जयपुर के अस्पताल में अंतिम सांस ली है। शाम 4 बजे उनकी पार्थिव देह मुरैना पहुंचेगी, जहां अंतिम दर्शनों के लिए उनकी पार्थिव देह को रखा जाएगा। उसके बाद जौरा स्थित गांधी सेवा आश्रम में ले जाया जाएगा, जहां गुरुवार को उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। गौरतलब है कि डा एसएन सुब्बा राव चंबल में आतंक का पर्याय बन चुके डाकुओं का सामूहिक सरेंडर करवाने के बाद चर्चाओं में आए थे।

राव ने बुधवार काे तड़के 4:00 बजे जयपुर के अस्पताल में अंतिम सांस ली है। शाम 4 बजे उनकी पार्थिव देह मुरैना पहुंचेगी, जहां अंतिम दर्शनों के लिए उनकी पार्थिव देह को रखा जाएगा। उसके बाद जौरा स्थित गांधी सेवा आश्रम में ले जाया जाएगा, जहां गुरुवार को उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। गौरतलब है कि डा एसएन सुब्बा राव चंबल में आतंक का पर्याय बन चुके डाकुओं का सामूहिक सरेंडर करवाने के बाद चर्चाओं में आए थे।

सलेम नंजुदैया सुब्बा राव का जन्म 7 फरवरी 1929 को कर्नाटक के बैंगलोर में हुआ था। उनके पिता नंजुदैया ख्याति के वकील थे, जो अन्यायपूर्ण मामलों से इनकार करने के लिए जाने जाते थे। अपने तीन भाइयों के साथ, सुब्बा राव ने रामकृष्ण वेदांत कॉलेज, मल्लेश्वरम में दस साल की उम्र में भक्ति गीत गाना शुरू कर दिया था। स्कूल में पढ़ते समय वह महात्मा गांधी की शिक्षाओं से प्रेरित थे। वह खादी पहनने वाला बन गया। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के साथ उनका पहला अनुभव 9 अगस्त 1942 की सुबह था जब उन्होंने अन्य स्कूली छात्रों के साथ कक्षाओं का बहिष्कार किया।

जब वह ब्रिटिश पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया था, तब वह सड़क की दीवारों और सड़कों पर “भारत छोड़ो” लिख रहा था, लेकिन बाद में केवल 13 वर्ष की आयु में रिहा कर दिया गया था। तभी से श्री सुब्बा राव देश के स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय हो गए।छात्र जीवन के दौरान उन्होंने छात्र कांग्रेस और राष्ट्र सेवा दल के कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से भाग लिया। एक स्थानीय संगठन ‘गांधी साहित्य संघ’ के बैनर तले उन्होंने मजदूरों के मुहल्लों में प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम आयोजित करने के लिए युवाओं का नेतृत्व किया। इन कार्यक्रमों और उनकी आयोजन क्षमताओं के माध्यम से उनकी लोकप्रियता थी जिसके परिणामस्वरूप 1946 में गुरलहोसुर (जिला बेलगाम) में 31 दिवसीय प्रशिक्षण शिविर के लिए उनका चयन हुआ।

डॉ .एस एन सुब्बाराव का पार्थिव शरीर अंतिम दर्शन के लिए रखा गया।

फरवरी 1929 को कर्नाटक प्रदेश के बैंगलोर में जन्मे सुब्बाराव शुरू से ही गांधीजी के विचारों से प्रभावित रहे हैं। 13 वर्ष की उम्र से ही वे भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़े और जेल भी गए, लेकिन उन्होंने अपना मिशन जारी रखा। गांधीवादी विचारों को स्थापित करने के लिए सुब्बाराव ने वर्ष 1954 में चंबल घाटी में कदम रखा। उन्होंने वर्ष 1964में रिकॉर्ड 10 महीने का श्रम शिविर आयोजित कर युवाओं की बड़ी टीम को इससे जोड़ा। उन्होंने यहां गांधी सेवाश्रम की स्थापना की और करीब 3 हज़ार परिवारों के करीब 5 हज़ार लोगों को रोजगार दिया। यहां खादी के वस्त्र निर्माण के अलावा शहद उत्पादन का कार्य भी होता है।

डकैतों का हृदय परिवर्तन और सरेंडर से आए चर्चा में

चंबल को डकैतों से मुक्त कराने में भाई जी की थी अहम भूमिका

एसएन सुब्बाराव चंबल अंचल में सुर्खियों में आए 14 अप्रैल 1972 को डकैतों के बड़े सरेंडर के बाद। वे इसके लिए निरंतर डकैतों के संपर्क में रहे और उनका हृदय परिवर्तन कराने में सफल रहे। जौरा के गांधी सेवाश्रम में आयोजित सरेंडर कार्यक्रम में मोहर सिंह व माधौसिंह जैसे बड़े डकैतों ने हथियार डाले। बाद में उत्तर प्रदेश के बटेश्वर में भी एक सरेंडर कराया।

अहिंसा के पक्षधर:

गांधीवादी विचारक व पूर्व विधायक सूबेदार सिंह सिकरवार कहते हैं एसएन सुब्बाराव के साथ काम करने का उन्हें मौका मिला है। 1972 के डकैत समर्पण कार्यक्रम में राव की भूमिका काबिले तारीफ है। हमारे जैसे कई लोगों ने उनके साथ काम किया और इस अंचल में अमन-चैन स्थापित करने के लिए सुब्बाराव के प्रयासों में सहयोग किया। आज यहां डकैतों की समस्या लगभग खत्म हो चुकी है। इसका श्रेय सुब्बाराव को जाता है।

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