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बिहार की त्रासदी : हर दिन हो रही मौत की गिनती…

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पटना/ रज़िया अंसारी : बिहार उत्तर भारत का एक ऐसा राज्य जो पिछली कई सदी से गरीबी की मार झेल रहा है, साक्षरता के मामले में भी बिहार सबसे पिछड़ा राज्य है, यह ऐसा राज्य है जो कई तरह की दुश्वारियां झेल रहा है. बाढ़ की विभीषिका अमूमन हर साल यहां आती है और हजारों लोगों की ज़िंदगी तहस-नहस करती है. लेकिन इस बार बिहार में मौत और तबाही का जो मंजर दिख रहा है उससे पूरा देश हिल गया है. यहाँ हर दिन मौत की गिनती हो रही है.

बिहार में एक बीमारी ने सैकड़ों बच्चों की जिंदगियां लील ली है. इस बीमारी का नाम है, एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) इसे मस्तिष्क बुखार भी कहते हैं. लोकल भाषा में इसे चमकी बुखार कहा जा रहा है. इस बीमारी ने अब तक सौ से ज्यादा बच्चों की जान ले ली है. अकेले मुजफ्फरपुर में इंसेफेलाइटिस से 18 दिन में 139 बच्चों की मौत हो चुकी है.

बता दें कि मुजफ्फरपुर में दिमागी बुखार का पहला मामला 1995 में सामने आया था. वहीं, पूर्वी यूपी में भी ऐसे मामले अक्सर सामने आते रहते हैं. इस बीमारी के फैलने का कोई खास पैमाना तो नहीं है लेकिन अत्यधिक गर्मी और बारिश की कमी के कारण अक्सर ऐसे मामले में बढ़ोतरी देखी गई है.

वहीं, उत्तर प्रदेश और बिहार दोनों ही राज्यों में कुपोषण बहुत ही अधिक है और कुपोषित बच्चे जल्दी संक्रमित होते हैं. स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, देश भर में होने वाली बच्चों की कुल मौतों में से 35 फीसदी उत्तर प्रदेश और बिहार में होती हैं.

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 के आंकड़ों के अनुसार, साल 2015-16 में पांच साल से कम उम्र के 48 फीसदी बच्चे बिहार में मौत का शिकार बन गए थे, जो भारत में सर्वाधिक था.

यह तो है चमकी बुखार कहर, समस्या यही ख़त्म नहीं होती, बिहार में इस बार भीषण गर्मी ने भी सैकड़ों लोगों की जान ले ली है. अकेले औरंगाबाद में लू से एक दिन 25 मौतें हो गई थी. देखते-देखते नवादा, मुंगेर, गया, बेगूसराय, पटना तथा और कई जिलों में लू ने मौत का खेल खेला. नौबत यहाँ तक आ गई कि बिहार के कई जिलों में धारा 144 लगानी पड़ी. लोगों को घर से निकलने पर रोक लगाई जा रही है.

जाहिर सी बात है बिहार की तबाही का जिम्मेदार जितना हम प्रकृति को दे रहे हैं उतना ही व्यवस्था भी जिम्मेदार है. यह बीमारी कई साल से बच्चों की जान ले रही है, लेकिन अभी तक इसका इलाज और कारण नहीं ढूंढा जा सका है. सरकारें बड़े वादे और बड़ी बातें कर के निकल जाते हैं, लेकिन इस समस्या का कोई ठोस उपाय नहीं कर पाते. कमसे कम अगर स्वास्थ्य व्यवस्था ही दुरुस्त हो जाये तो इतने बच्चे असमय काल के गाल में समाने से बच जायेंगे.

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