BURNING TOPIC : कॉलेज लाइब्रेरियन व यूनिवर्सिटी अस्सिस्टेंट लाइब्रेरियन की नियुक्ति के लिए अलग आयोग क्यों ?

डा. अम‍ित क‍िशोर


बिहार राज्य के परम्परागत विश्वविद्यालयों एवं अंगीभूत महाविद्यालयों में कुल सृजित पदों में यूनिवर्सिटी अस्सिस्टेंट लाइब्रेरियन एवं कॉलेज लाइब्रेरियन के 90% से अधिक पद रिक्त पड़े हुए हैं, जिसकी वजह से राज्य के उच्च शिक्षण संस्थानों में पठन-पाठन का माहौल एवं नैक ग्रेडिंग प्रभावित हो रहा है। सूचना का अधिकार के तहत पटना विश्विद्यालय से प्राप्त आंकड़ों में स्पष्ट है कि पुस्तकालय अध्यक्ष और पुस्तकालय कर्मियों के सृजित 47 में से 43 पद रिक्त हैं, वहीं बीआरए बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर के 42 कॉलेजों में सिर्फ पांच कॉलेज लाइब्रेरियन कार्यरत हैं। यही हाल कमोबेश सभी विश्वविद्यालयों का है।

राज्य में यूनिवर्सिटी अस्सिस्टेंट लाइब्रेरियन एवं कॉलेज लाइब्रेरियन के आभाव में पुस्तकालय सेवाओं का संचालन बाधित है या तो तृतीय अथवा चतुर्थ वर्ग कर्मचारियों द्वारा संचालन किया जा रहा है। विदित हो कि बिहार में पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान के सैकड़ों नेट एवं पी-एच डी. धारक बेरोजगार बैठे हैं। इन पदों पर सीधी वैकेंसी की राह देख रहे हैं, परन्तु 1990 के बाद जबकि अस्सिस्टेंट प्रोफ़ेसर की नियुक्ति हेतु चौथी बार विज्ञापन जारी किया गया है, वहीं राज्य के विश्वविद्यालयों के अंतर्गत केन्द्रीय पुस्तकालय एवं अंगीभूत महाविद्यालयों में यूनिवर्सिटी अस्सिस्टेंट लाइब्रेरियन एवं कॉलेज लाइब्रेरियन की नियुक्ति के लिए एक बार फिर से वेकेंसी नहीं आई है।

विधान परिषद् के बजट सत्र में प्रश्नकाल के दौरान शिक्षा मंत्री द्वारा राज्य के विश्वविद्यालयों एवं अंगीभूत महाविद्यालयों में पुस्तकालयाध्यक्ष की नियुक्ति के लिए अलग आयोग के गठन की घोषणा से पुस्तकालय विज्ञान के सैकड़ों नेट एवं पी-एच. डी. धारक बेरोजगारों में एक सकारात्मक उम्मीद जगी है, परन्तु सवाल यह है कि जब यूनिवर्सिटी अस्सिस्टेंट लाइब्रेरियन एवं कॉलेज लाइब्रेरियन दोनों विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अनुसार अस्सिस्टेंट प्रोफ़ेसर के समतुल्य पद हैं एवं इसका पे स्केल (AGP-6000) एवं इस पद के लिए भी न्यूनतम अहर्ता भी नेट अथवा पी-एच. डी. है, तो कॉलेज लाइब्रेरियन एवं यूनिवर्सिटी अस्सिस्टेंट लाइब्रेरियन की नियुक्ति के लिए अलग आयोग बनाने की जरूरत क्यों ? अस्सिस्टेंट प्रोफ़ेसर की बहाली के लिए पहले से ही ‘बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग’ मौजूद है तो इसके द्वारा इन पदों पर बहाली की जा सकती है। अलग आयोग के गठन से बहाली में अनावश्यक व‍िलंब होगा, जिसका सबसे बड़ा नुकसान शैक्षणिक संस्थाओं के नैक ग्रेडिंग पर पड़ेगा।

वर्तमान शैक्षणिक प्रणाली में पुस्तकालयों के महत्त्व को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पूर्व अध्यक्ष सी डी देशमुख ने शिक्षा प्रणाली में “छात्रों को शरीर, शिक्षकों को आत्मा, प्रशासन को मस्तिष्क और पुस्तकालय को हृदय” बतलाया था, और यह व्यक्तव्य उनके वर्षों के शैक्षणिक अनुभव का निचोड़ था। पुस्तकालय की महत्ता को उजागर करने हेतु राधाकृष्णन कमीशन (1948), कोठरी कमीशन (1964) जैसी कई समितियों की सिफारिशों में विद्यालयी शिक्षा से ही पुस्तकालय की स्थापना के महत्त्व पर जोर दिया गया। वहीं रस्तोगी समिति (1997) के सुझाव पर यूनिवर्सिटी और कॉलेज लाइब्रेरियन के पे स्केल को मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा संशोधित कर इसे प्रोफ़ेसर एवं अस्सिस्टेंट प्रोफ़ेसर के समतुल्य कर दिया गया।

बिहार लाइब्रेरी साइंस नेट एवं पीएचडी होल्डर्स एसोसिएशन ने भी ज्ञापन के माध्यम से यह मांग की है क‍ि यूनिवर्सिटी अस्सिस्टेंट लाइब्रेरियन एवं कॉलेज लाइब्रेरियन की बहाली ‘बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग’ के माध्यम से करवाई जाए, क्योंकि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अनुसार ये दोनों भी अस्सिस्टेंट प्रोफ़ेसर के समतुल्य पद हैं और अस्सिस्टेंट प्रोफ़ेसर की बहाली के लिए पहले से ही ‘बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग’ मौजूद है। अलग आयोग गठन से इन रिक्त पदों पर बहाली प्रक्रिया में अनावश्यक व‍िलंब होगा। ऐसे में यूनिवर्सिटी अस्सिटेंट लाइब्रेरियन एवं कॉलेज लाइब्रेरियन की बहाली ‘बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग’ के माध्यम से करवाकर जल्द से जल्द इस पद को भरा जा सकता है।