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जगन्नाथ रथयात्रा पर कोरोना का साया, बिना भक्तों के घूमेंगे भगवान

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महेश शर्मा


ओडिशा ही नहीं पूरे देश के लिए सोमवार (12 जुलाई 2021) का दिन धार्मिक दृष्टि से ऐतिहासिक होगा। करीब तीन महीनों से चल रही रथयात्रा आयोजन को लेकर उधेड़बुन समाप्त हो गयी। कहा जाता है कि भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र व बहन देवी सुभद्रा के साथ श्रीमंदिर से बाहर आकर अपने भक्तों को दर्शन देते हैं पर बीते साल की तरह अबकी बार भी भगवान तो विराजमान होंगे, लेकिन भक्त गायब रहेंगे। खौफ कोरोना वायरस का जो है।

सुप्रीमकोर्ट ने पिछले साल 18 जून को जगन्नाथ भगवान की रथयात्रा पर रोक का अपना निर्णय 22 जून को पलटते हुए श्रीजगन्नाथ की रथयात्रा आयोजन के लिए ‘हां’ कहा तो भक्तों के बीच खुशी की लहर दौड़ पड़ी। यह लहर आज भी बरकरार है। दूरशर्शन पर सजीव प्रसारण में महाप्रभु के दर्शन लाभ पाकर भक्तजन खुद को धन्य समझेंगे।

पूरी गोवर्धनपीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद से रथ यात्रा आयोजन पर चर्चा करते आयोजक

प्रसारण का लिंक ओडिशा के बाहर भी लोगों से शेयर किया जाएगा। पुरी को लॉकडाउन करते हुए जिला प्रशासन ने धारा 144 लागू कर दी है। रथ खींचने व अन्य सेवाओं में लगे सभी सेवायतों और सुरक्षा बलों का आरटीपीसीआर टेस्ट के साथ ही कोरोना के दोनों डोज दिए जा चुके हैं।

तिथि और मुहूर्त
रथ यात्रा सोमवार, जुलाई 12, 2021 को
द्वितीया तिथि प्रारम्भ – जुलाई 11, 2021 को 07:47 बजे सुबह
द्वितीया तिथि समाप्त – जुलाई 12, 2021 को 08:19 बजे सुबह
मौसी के घर आराम करते हैं भगवान जगन्नाथ

जगन्नाथ मंदिर से रथ यात्रा शुरू होकर 3 कि.मी. दूर गुंडीचा मंदिर पहुँचती है. इस स्थान को भगवान की मौसी का घर भी माना जाता है. एक अन्य मान्यता के अनुसार यहीं पर विश्वकर्मा ने इन तीनों प्रतिमाओं का निर्माण किया था,अतः यह स्थान जगन्नाथ जी की जन्म स्थली भी है. यहां तीनों देव सात दिनों के लिए विश्राम करते हैं. आषाढ़ माह के दसवें दिन सभी रथ पुनः मुख्य मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं. वापसी की यह यात्रा बहुड़ा यात्रा कहलाती है।

ग्रांड रोड जिसे बड़दंड भी कहा जाता है, को जाने वाली हर गली की नाकाबंदी कर दी गयी ताकि कोई रथों के निकट न आ सके। बताते हैं कि बीते कोई ढाई हजार वर्ष से भी अधिक रथयात्रा के इतिहास में पहली बार ऐसा अवसर आया कि भक्तों की उपस्थिति के बिना ही रथ पर भगवान निकलेंगे। भक्त घरों में कैद रहेंगे। वजह कोरोना वायरस। भक्तों को बचाना भी तो उन्हीं की जिम्मेदारी है।

भगवान के स्वागत के लिए ग्रैंड रोड सज धज कर तैयार

तीनों रथों को गुंडिचा मंदिर तक ले जाने के लिए 1000 से ज्यादा सेवायतों को अनुमति मिली है जिनका कोरोना टेस्ट किया जा चुका है जो निगेटिव आया है। एक रथ को 500 से ज्यादा लोग नहीं खींचेंगे। वहां पर मौजूद जरूरी लोगों के लिए सोशल डिस्टेंसिंग, सेनीटाइजर, मास्क अनिवार्य है। भगवान जगन्नाथ की ढाई किलोमीटर की रथयात्रा पूरी होगी। आपको बता दें कि रथयात्रा पर रोक के लिए सुप्रीमकोर्ट में 6 याचिकाएं लगायीं गईं, पर अंततोगत्वा निर्णय श्रीमंदिर समिति के पक्ष में आया। यानी आस्था जीती, कोरोना हारा।

12 जुलाई को भगवान जगन्नाथ, अग्रज बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ मौसी घर गुंडिचा मंदिर जाएंगे। इस ढाई किलोमीटर की रथयात्रा का धार्मिक उत्सव देखने को देखने को देशविदेश से 10 से 12 लाख लोग पुरी आते हैं, पर बीते दो साल से श्रद्धालुओं के आने पर मनाही है। वजह कोरोना। कुल नौ दिन का उत्सव होता है।

सात दिन मौसी के घर रुकने के बाद आठवें दिन फिर अपने श्रीमंदिर पहुंचेंगे। यह पहले ही तय किया जा चुका है कि दोनों मंदिरों के निकट किसी भी नहीं आने दिया जाएगा। भारी सुरक्षा का बंदोबस्त किया गया है। लॉकडाउन हटने के बाद भी 144 लागू रखने का निर्णय लिया गया। अबकी रथयात्रा में अड़चने खूब आईं। रथ बनाने का काम ही 15 दिन विलंब से शुरू हुआ। कारीगरों ने ज्यादा समय तक काम करके 40 दिन के भीतर ही तीनों रथ बना दिए।

खास आकर्षण

-श्रीजगन्नाथ मंदिर में 752 चूल्हों पर महाप्रसाद बनाया जाता है। ये चूल्हे नौ दिन तक ठंडे रहते हैं। गुंडिचा मंदिर में भी 752 चूल्हों की ही रसोई है जो श्रीमंदिर के चूल्हों की अनुकृति कही जाती है। रथयात्रा के दौरान महाप्रसाद यहां पर बनता है।-16 पहिये वाला 13 मीटर ऊंचा श्रीजगन्नाथ का रथ गरुड़ध्वज, कपिध्वज और नंदीघोष। रथ के घोड़ों का नाम शंख, बलाहक, श्वेत एवं हरिदाश्व है।

सारथी का नाम दारुक है और रथ पर हनुमान जी और नृसिंह भगवान का प्रतीक होता है। रथ पर रक्षा का प्रतीक सुदर्शन स्तंभ और रक्षक गरुड़ हैं। रथ की ध्वजा त्रिलोक्यवाहिनी कहलाती है और रस्सी को शंखचूड़ कहते हैं जिसे सजाने में 11 सौ मीटर कपड़ा लगता है। इसी प्रकार बलभद्र जी का 13.2 मीटर ऊंचे रथ का नाम तालध्वज है। रथ पर महादेव जी का प्रतीक होता है। रक्षक वासुदेव और सारथी मतालि हैं। ध्वज को उनानी तथा नीले रंग के अश्वों के नाम त्रिब्रा, घोरा, दीर्घशर्मा व स्वर्णनावा है।

बहन देवी सुभद्रा का रथ देवदलन 12.9 मीटर ऊंचा 12 पहियों वाला है। रथपर देवी दुर्गा का प्रतीक मढ़ा जाता है। रक्षक जयदुर्गा, सारथी अर्जुन हैं और रथ के ध्वज का नाम नंदबिक है। रथ के अश्व रोचिक, मोचिक, जीता और अपराजिता हैं। श्रीजगन्नाथ की रथयात्रा प्रति वर्ष अषाढ़ शुक्ल द्वितीया तिथि को निकाली जाती है। पुरी को हजारों वर्षों से नीलगिरि, नीलाद्रि, नीलांचल, पुरुषोत्तम, शंखश्रेष्ठ, श्रीश्रेष्ठ, जगन्नाथ धाम, जगन्नाथ पुरी के नाम से जानते हैं।

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