Dharm: जाने दत्‍तात्रेय जयंती क्यों मनाई जाती है

मार्गशीर्ष माह में शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को दत्तात्रेय जयंती पूरे उत्साह के साथ मनाई जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान दत्तात्रेय एक समधर्मी देवता हैं और ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश का सम्मिलित अवतार हैं। इस साल दत्तात्रेय जयंती आज 29 दिसंबर को है।



कैसे हैं दत्‍तात्रेय:

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान दत्तात्रेय के 3 सिर हैं और 6 भुजाएं हैं। दत्तात्रेय जयंती पर भगवान के बालरूप की ही पूजा अर्चना की जाती है। साथ ही भगवान दत्तात्रेय को भगवान विष्णु के 24 अवतारों में से छठे स्थान पर माना गया है। दत्तात्रेय एक ऐसे अवतार हैं, जिन्होंने 24 गुरुओं से शिक्षा ली। महाराज दत्तात्रेय पूरे जीवन ब्रह्मचारी, अवधूत और दिगंबर रहे थे। भगवान दत्तात्रेय की उपासना में अहं को छोड़ने और ज्ञान द्वारा जीवन को सफल बनाने का संदेश मिलता है।

दत्‍तात्रेय के जन्‍म की कथा:

धार्मिक मान्यता है कि महर्षि अत्रि की पत्नी अनसूया अपने तप और पतिव्रत धर्म के पालन की लिए जानी जाती थी। जब देवी अनसूया की महिमा तीनों लोक में फैली तो माता अनसूया के पतिव्रत धर्म की परीक्षा लेने का विचार माता पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती के मन में आया और उन्होंने ब्रह्मा, विष्णु, महेश से धरतीलोक में माता अनसूया की परीक्षा लेने के लिए कहा। जब तीनों देव साधु के भेष में देवी अनसूया के आश्रम में पहुंचे तो उन्होंने माता अनसूया के सामने भोजन करने की इच्छा प्रकट की। लेकिन साथ ही यह शर्त रखी कि वह उन्हें निर्वस्त्र ही भोजन परोसे।

इस शर्त के कराण देवी अनसूया असमंजस में पड़ गई। अपने पतिव्रत धर्म के कारण वह इस शर्त का पालन नहीं कर सकती थी। ऐसे में उन्होंने अपने पति अत्रिमुनि का स्मरण किया तो सामने खड़े साधुओं के रूप में उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश खड़े दिखाई दिए। तब तत्काल माता अनसूया ने अत्रिमुनि के कमंडल से जल निकालकर तीनों साधुओं पर छिड़का तो वे छह माह के शिशु बन गए।

तब माता अनसूया ने शर्त के मुताबिक बालरूप बने ब्रह्मा, विष्णु और महेश को निर्वस्त्र होकर भोजन कराया। लेकिन जब बहुत समय बीत जाने पर भी तीनों देवता अपने-अपने लोक नहीं पहुंचे तो पति के वियोग में तीनों देवियां दुखी हो गईं। तब नारद मुनि ने उन्हें पूरा वृत्तांत सुनाया। तीनों देवियां पृथ्वी लोक में पहुंचीं और माता अनसूया से माफी मांगने लगी। तीनों देवों ने भी अपनी गलती को स्वीकार कर माता की कोख से जन्म लेने का आग्रह किया। इसके बाद तीनों देवों ने दत्तात्रेय के रूप में जन्म लिया, तभी से माता अनसूया को पुत्रदायिनी के रूप में पूजा जाता है।