विपक्षी राजनीति के राष्ट्रीय चेहरे के रूप में दिखने लगीं दीदी, सिकुड़ता एनडीए

कोलकत्ता/ महेश शर्मा: पश्चिम बंगाल में भाजपा की हार ने गैर भाजपावाद की राजनीति की ठोस शुरुआत के संकेत दे दिए हैं। ममता बनर्जी (दीदी) विपक्ष के प्रमुख चेहरे की सशक्त दावेदार बन चुकी हैं। मोदी तंत्र को शिकस्त देना आसान नहीं था। भाजपा की चुनाव जिताऊ जोड़ी मोदी-शाह का पूरा फोकस पश्चिम बंगाल के चुनाव पर था।


देखा जाए तो पांच राज्यों में हुए चुनाव में एनडीए को एक छोटा सा केंद्र शासित राज्य पुडुचेरी में लाभ हुआ। केरल, पश्चिम बंगाल व तमिलनाडु हार चुकी है जबकि असम में रिपीट हुई है। राजनीतिक हल्कों में एनडीए की सिकुड़ती ताकत का एहसास लोगों को होने लगा है। यहां के चुनाव के बाद राष्ट्रीय परिदृश्य में गैर भाजपावाद की राजनीति का तानाबाना की तैयारी शुरू हो चुकी है। राज्य से कांग्रेस और वाम दलों का सूपड़ा साफ हो चुका है पर इनके बिना राष्ट्रीय फलक पर मजबूत विपक्ष की परिकल्पना असंभव है। गैर भाजपा, गैर कांग्रेस वाला तथाकथि विपक्ष भले ही मजबूत क्षेत्रीय पार्टियों के साथ बनाया जाए पर ऐसा सदैव रहा है कि लोकसभा चुनाव यह विपक्ष ज्यादा कारगर नहीं रहा।

इस चुनाव को लेकर कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि देश के राजनीतिक मानचित्र पर टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी कद्दावर नेता के रूप में उभरीं। दीदी के सियासी सफर में यह चुनाव एक दिलचस्प मोड़ साबित हुआ जहां पर यदि दीदी सरकार न बचा पाती तो राजनीति में हासिए पर आ जाती, जीतने पर काफी मजबूत होकर उभरी हैं। दीदी को एक लाभ यह भी मिला, वह यह कि 2024 के संसदीय चुनाव में विपक्ष की ओर से पीएम कंडीडेट के रूप विपक्ष में सशक्त दावेदार हो गयी हैं। एनडीए का घटक दल बनने से पहले नीतीश कुमार में पीएम का कंटेंट होने की चर्चा शुरू हो गयी थी। मोदी-शाह की कोशिशों को झटका देकर वह विपक्षी दलों में प्रमुख नेता के रूप में लोगों के सामने हैं। पहले कहा जा रहा था कि करीब की जीतहार की स्थिति आती है तो भाजपा मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार गिराने का राजनीतिक तियापांचा कर सकती है, पर विशाल जीत ने यह अवसर तक नहीं दिया।

अब 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव में न केवल विपक्षी दलों का गठबंधन मजबूत होकर उभर सकता है बल्कि ममता विपक्षी गठबंधन की सशक्त नेता के रूप में सामने आ सकती हैं जिनके बिना केंद्र की एनडीए सरकार को नहीं हटाना मुश्किल कार्य हो सकता है। यह भी संभव है कि ममता दीदी संयुक्त विपक्ष की पीएम प्रत्याशी के रूप में सामने आ जाएं। इस चुनाव में अनुमान है कि टीएमसी को 50 प्रतिशत के अल्ले-पल्ले वोट मिला है। 2011 में टीएमसी को 39.79 प्रतिशत, 2016 में 44.91 प्रतिशत वोट मिला था। जबकि 2019 में लोकसभा चुनाव में टीएमसी ने 43.6 प्रतिशत वोट हासिल किया और भाजपा 18 सीटें जीतकर 40.60 प्रतिशत वोट हासिल किया था। इस चुनाव से पश्चिम बंगाल देश में विपक्ष की राजनीति की धुरी बन चुका है। ममता बनर्जी के बिना विपक्ष की मजबूत राजनीति की परिकल्पना भी संभव नहीं होगी। यह चुनाव राष्ट्रीय राजनीति के पटल पर काफी कुछ प्रभाव डालेंगे।

बात समझने के लिए थोड़ा पीछे चलते हैं। मई 2018 में भाजपा का असर थोड़ा कम होना शुरू हो गया था जब भाजपा को कर्नाटक में झटका लगा। शपथ लेने के बाद भी येदुयुरप्पा को बहुमत न होने से इस्तीफा देना पड़ा था। एक साल बाद जनता दल (एस) के कुछ विधायक भाजपा में आ गए। तब कहीं जाकर कर्नाटक में भाजपा की वापसी हुई। दिसंबर 2018 में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में विधानसभा चुनाव हुए तो ये राज्य भाजपा हार गयी। फिर मार्च 2020 में मध्यप्रदेश में कर्नाटक की तरह कांग्रेस के 22 विधायक भाजपा में आ गए। इसके नायक बने ज्योतिरादित्य सिंधिया। अक्तूबर 2019 में हरियाणा भी भाजपा के हाथ से फिसल गया था। जनता जननायक पार्टी के दुष्यंत चौटाला की मदद से सरकार बचायी गई। 2019 में ही महाराष्ट्र और झारखंड भाजपा के हाथ से निकल गया। दिल्ली में भाजपा फिर हारी। बिहार जैसे तैसे एनडीए बचाने में सफल रहा। कुल मिलाकर 17 राज्यों तक एनडीए सिमट गया। कहा जा सकता है कि 2019 के चुनाव के बाद एनडीए चार राज्यों में जीत पायी।

2017 में जब भजापा ने गुजरात और हिमाचल में जीत दर्ज की थी तो खुद मोदी संसदीय दल की बैठक मे इंदिरा गांधी से तुलना करते हुए कहने लगे कि जब वो सत्ता में थीं तो 18 (वास्तिवक फिगर 17 जिनमें देश की 88 फीसदी जनता रहती थी, क्षेत्रफल 94 फीसदी) राज्यों में कांग्रेस की सरकारें थी। जब हम आए तो 19 राज्यों में भाजपा है। हालांकि तब कई राज्यों का बंटवारा नहीं हुआ था। मोदी जब 2014 में आए तो तीस विस चुनावों में एनडीए ने 17 में सरकारें बनायीं। 2018 में उत्तर-पूर्व राज्यों की मिलाकर संख्या 21 तक पहुंची। यही एनडीए का पीक था। कहा जाता है कि एवरेस्ट पर चढने वाला उतरता जरूर है। तो क्या एनडीए राजनीति के एवरेस्ट से उतार पर है। ममता की जीत से तो यही लगता है।