नाटक सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि जन जागरण का सशक्त माध्यम : सर्वेश कुमार

बेगूसराय/विनोद कर्ण:जिले की चर्चित नाट्य संस्था मॉडर्न थियेटर फाॅउण्डेशन (एम.टी.एफ.) ने स्थानीय दिनकर कला भवन के प्रेक्षागृह में वर्तमान समय के वेशभूषा तथा विचार पर आधारित नाटक रिडिक्यूलस का सफलतापूर्वक मंचन सोमवार को किया। नाटक का आलेख, परिकल्पना एवं निर्देशन परवेज़ यूसुफ़ ने किया।मंचन से पूर्व उद्घाटन सत्र में बिहार विधान परिषद सदस्य सर्वेश कुमार, उप महापौर राजीव रंजन, नृत्याचार्य सुदामा गोस्वामी, चिकित्सक डॉ., एस. पंडित, गंगा ग्लोबल बी.एड. काॅलेज के प्राचार्य डाॅ. राजेश सिंह, वरिष्ठ चित्रकार सीताराम शर्मा, निर्देशक अमित रोशन, निर्देशक दीपक सिन्हा, रंगकर्मी व पत्रकार विजय कुमार तथा फिल्म अभिनेता अमित कश्यप ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का उद्घाटन किया। 


संस्था की ओर से सभी अतिथियों को अंग वस्त्र और पुष्पगुच्छ से सम्मानित किया गया। उद्घाटन करते हुए एमएलसी सर्वेश कुमार ने कहा कि रंगमंच समाज के लिए बहुत ही आवश्यक है। इसके माध्यम से मनोरंजन के साथ लोगों को जागरूक करने का काम किया जाता है। मॉडर्न थियेटर फाॅउण्डेशन के कलाकार वर्षों से इस मुहिम में लगे हैं यह सभी बधाई के पात्र हैं। उप महापौर राजीव रंजन ने बताया कि बहुत ही जल्द नगर में एक और प्रेक्षागृह बनना आरंभ हो जाएगा, प्रक्रिया चल रही है। सभी आगत अतिथियों ने संस्था को बधाई और शुभकामनाएं दी।प्रस्तुत नाटक रिडिक्यूलस का अर्थ ही है बेतूकापन अर्थात् हास्यास्पद।


नाटक का कथानक आज के पहनावे-उढ़ावे से आरंभ होता है। एक परिवार में उल्टे कपड़े पहनने को लेकर बहस होती है और बात राजा के दरबार तक चली जाती है जहां राजा भी प्रभावित होकर पूरे नगर वासी को उल्टे कपड़े पहनने के लिए बाध्य करता है। राजा का बेटा और महारानी इस विचार से सहमत नहीं होते हैं और अंत में राजा को इस बात का ज्ञान होता है कि हमारा पहनावा-उढ़ावा रहन-सहन, बातचीत, व्यवहार हमारे विचार की अभिव्यक्ति है। विचार कभी नकारात्मक तो कभी सकारात्मक रूप में हमारे सामने आता है। लोगों को इतना सक्षम होना चाहिए कि वह सही और गलत को समझ सके।


नाटक के आरंभ का गीत दर्शकों को कथ्य समझने में मदद कर रहा था- “बेतुकी सी हो गई है जिंदगी ये आजकल, पढ़ने-लिखने का असर भी दिखता नहीं है आजकल…” । निर्देशक परवेज़ यूसुफ़ ने प्रस्तुति में मोबाईल के नकारात्मक इस्तेमाल को भी बखूबी दिखाया तथा वर्तमान समय और ऐतिहासिक समय को एक साथ जोड़कर नाटक को हास्य बनाया। कुल मिलाकर नाटक हास्य मनोरंजन के साथ-साथ अपनी बात दर्शकों तक पहुंचाने में पूरी तरह सफल रहा। राजा-अंकित राज, रानी- एकता भारती, महामंत्री- अभिनव मटिहान्वी, दरबारी- एवं मोनादी वाला राहुल कुमार, सिपाही- शिवम कुमार एवं कृष्णा नीतीश, युवक- मनीष कुमार, मां- शुभम कुमारी, दादा- संदीप कुमार, बेटी- फागुनी कुमारी, पिता – अमरीश कुमार, राजा का बेटा – कमलेश कुमार, मित्र – रुपेश कुमार, बालक- चंचल राज एवं शिवम राज, दरबारी गायक – संतु कुमार, ग्रामीण- दिवाकर झा, प्रशांत कुमार तथा अंकित कुमार ने काफी अच्छा अभिनय किया और अपनी प्रतिभा का खूबसूरत प्रदर्शन किया। अधिकांश कलाकारों का यह पहला अवसर था मंच पर आने का। 


संगीत संचालन एवं मुख्य स्वर अभिनेत्री सुशीला कुमारी तथा नाल पर संगत कर रहे थे नंदकिशोर मालाकार। प्रकाश परिकल्पना एवं संचालन एमटीएफ के पुराने रंगकर्मी तथा केंद्रीय विश्वविद्यालय के छात्र अमरजीत कुमार ने किया। पूरे कार्यक्रम में हर्षवर्धन प्रसाद गुप्ता, ओम कुमार, मेहरून निशा, सुशीला कुमारी, कमलेश कुमार, राहुल कुमार, समीर और अलीशा के साथ-साथ पंकज कुमार सिन्हा उर्फ झंडू का सक्रिय योगदान रहा।मंच संचालन कर रहे थे निर्देशक परवेज़ यूसुफ़।