पश्चिम बंगाल में चुनावी दंगल : तृणमूल कांग्रेस की घेरेबंदी में जुटी भारतीय जनता पार्टी

कोलकाता/ महेश शर्मा: भारतीय जनता पार्टी का पूरा फोकस पश्चिम बंगाल पर है। राज्य की 294 विधानसभा सीटों पर प्रत्याशी लड़ाने के साथ जीत के समीकरण बैठाने पर उसके लीडर जुटे हैं। भाजपा ने चुनाव के लिहाज से रणनीति के तहत पश्चिम बंगाल को पांच जोनों में बांटा है।



ये जोन हैं राढ़बंग, नवद्वीप, कोलकाता, मेदिनीपुर और उत्तर बंगाल। यहां पर बंगालियों के अलावा उत्तर भारतीय बिहारी, मुस्लिम आबादी और उनकॆ मुद्दों पर फोकस किया है।

कहा जाता है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी के लिए चुनावी रणभूमि में भाजपा के चक्रव्यूह बेधने में मुश्किलें उत्पन्न हो सकती है। उनके विधायक मंत्री पार्टी छोड़-छोड़कर भाजपा का दामन थामने लगे हैं। हालांकि इस्तीफा दे चुके खेल मंत्री लक्ष्मीरतन शुक्ला अभी मौन हैं पर समझा जाता है कि उन्हें सौरव गांगुली के इशारे इंतजार है।

ममता की दूसरी मुश्किल यह भी है कि उनके मुस्लिम वोट बैंक में ओवैसी की पार्टी और कांग्रेस-वामदलों का गठजोड़ सेंधमारी को तैयार बैठा है। राज्य की 125 सीटों पर प्रभावी मुस्लिम आबादी ममता बनर्जी की ताकत हुआ करती है। ताजा सर्वे की मानें तो ममता बनर्जी और उनकी पार्टी टीएमसी (तृणमूल कांग्रेस) अभी भी आराम से बढ़त बनाए हुए है।

थोड़ा पीछे जाकर देखें तो भाजपा ने छह साल पहले यानी 2014 में ही पश्चिम बंगाल को टॉप एजेंडे पर रखा है। कम्युनिस्टों का गढ़ रहे त्रिपुरा पर काबिज होने के बाद भाजपा के नेताओं को लगा कि खांटी वाम और मध्यमार्गी वाले राज्यों में पार्टी पैठ बना सकती है। हालांकि शुरू में भाजपा को सफलता तो नहीं मिली लेकिन उसने हार भी नहीं मानी। जमीनी कार्यकर्ताओं से जुड़ाव के साथ ही टीएमसी व अन्य दलों के प्रभावशाली नेताओ और कार्यकर्ताओं को भाजपा ने जोड़ना शुरू किया।

ममता को पहला बड़ा झटका सुवेंदु अधिकारी और उनके समर्थकों ने टीएमसी को गुडबॉय कहकर दिया। ये केसरिया रंग में रंग गए। भाजपा के रणनीतिकारों ने बीते वर्षों में पश्चिम बंगाल में मजबूत आधार बनाने में सफलता पायी है। उसका माइक्रो मैनेजमेंट आज भी मजबूत माना जाता है। वर्ष 2014 की मोदी लहर में राज्य से मात्र दो सीटें जीतने वाली भाजपा ने 2016 के राज्य विधानसभा चुनाव में 10.15 प्रतिशत वोट हासिल करके तीन प्रत्याशी जिता पायी। लेकिन अमित शाह का पूरा फोकस पश्चिम बंगाल की ओर होने के बाद 2019 में लोकसभा चुनाव में भाजपा की झोली में 18 सीटें आ गिरी। इस चुनाव में पार्टी को 2.3 करोड़ वोट मिले जो कि टीएमसी के मुकाबले मात्र 17 लाख वोट ही कम बताए जाते हैं।

भाजपा के रणनीतिकारों ने संगठन खड़ा करने में माहिर नेताओं को जोनवार कमान सौंप दी है। ये सब बीते छह माह से मेहनत कर रहे हैं। इसमें राज्यों के महामंत्री (संगठन) के दिग्गजों की ड्यूटी लगायी गई है। गुजरात प्रदेश के भाजपा महामंत्री भीखू भाई दलसाड़िया को इन जोनों में संगठन मजबूत करने की जिम्मेदारी दी गयी है। महामंत्रियों का काम बूथ स्तर पर सूक्ष्म प्रबंधन के लिए कार्यकर्ताओं का समूह  तैयार करना है। प्रभारियों को अपने-अपने जोन के स्थानीय मुद्दों और जातिगत समीकरण को गहराई से समझने के साथ ही प्रत्याशिता के दावेदारों की वर्तमान स्थिति और उसके असर की समीक्षा करना है।
पार्टी के सूत्र बताते हैं कि जोनों प्रभारी महामंत्रियों से यह भी कहा गया है कि वे अपने-अपने कार्य का हर हफ्ते पॉवर प्रेजेंटेशन जरूर तैयार करें ताकि यह अंदाजा लगाया जा सके कि जोन में भाजपा कहां तक पहुंची।

यह आंकड़ा भी मांगा गया है कि कितने लोगों को स्थानीय स्तर पर भाजपा के पक्ष में किया गया। बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण और मुद्दों पर चर्चा व दबाव बनाने का कामकाज भी देखा जा रहा है। इसके अलावा केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और पार्टी अध्यक्ष जय प्रकाश नड्डा, प्रभारी महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय के लगातार दौरे लगाए जा रहे हैं।

भाजपा के वार रूम के योद्धापश्चिम बंगाल को पांच जोनों में बांटकर संगठन विशेषज्ञ चुनींदा नेताओं को लगाया गया है। रवींद्र राजू व विनोद सोनकर (राढ़बंग जोन), भीखू भाई दलसाड़िया, विनोद तावड़े (नवद्वीप जोन), सुनील बंसल व दुष्यंत गौतम (कोलकाता जोन), पवन राणा व सुनील देवधर (मिदनापुर जोन), हरीश द्विवेदी (उत्तर बंगाल)। प्रत्येक महामंत्री संगठन के साथ प्रभारी लगाए गए हैं। इनका काम है सीटों के हिसाब से जातीय समीकरण समझनता और संगठन तथा बूथ की मजबूती।