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म‍िल‍िए च‍ित्रकार से : मानवीय संवेदनाओं के पारखी मुकेश कुमार ‘सोना’, कोरोना काल की भयावहता को दर्शाती पेंट‍िंंग

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मुजफ्फरपुर : जीवन संघर्ष पर आधारित मनुष्य जीवन इर्ष्या एवं द्वेष से पूर्ण है। यह प्रवृत्ति असुर शक्ति की पोषक है। हमें जो वेद और शास्त्रों से ज्ञात असुरों की जानकारी मिलती है, जिनका संहार माँ दुर्गा और काली ने किया, वह कोई अलग प्रजाति के नहीं थे, हमारे आसपास के ही लोग थे। आज भी हैं, जिसे हम पहचान नहीं पाते। असुर मायावी, झुठे, मक्कार व स्वार्थी होते हैं। आप देखिये आपके आसपास ऐसा मनुष्य है, जरूर है। इसको चित्रकार मुकेश सोना ने पहचाना और उसे चित्रित किया है। उनका चित्र “Maleviolence” मनुष्य के इसी प्रवृति की व्याख्या करता है।

चित्रकार मुकेश लोगों के मन को पढ़कर उसके अंदर की पाशविक प्रवृति की पहचान किया, जिसे अपने चित्रों में दर्शाया है। इन प्रवृत्तियों पर विजय पाने के लिए ईश्वरीय गुणों की तरफ प्रवृत होने के लिए प्रेरित करते हैं। मानव कल्याण की, मनुष्य के सुख-दुख में सहयोग करने की प्रवृति को उभारने के लिए दिव्य दर्शन की आवश्यकता है। इसे अपने चित्र “दिव्य दर्शन” में चित्रित किया है। उनका कहना है कि “मानवमात्र का जन्म आपसी सहयोग, दया और करुणा पर निर्भर है। इन मनोवृतियों को पाकर ही मनुष्य देवता की श्रेणी में स्वयं को स्थापित करता है।” उसे ज्ञान ज्योति के लिये माँ सरस्वती की अराधना अति आवश्यक है। बिना ज्ञान के पशुत्व को ही प्राप्त किया जा सकता है। अपने चित्र” Divine Mother-1″ में इस चित्र की व्याख्या की है।

मुजफ्फरपुर की माटी में जन्‍मे, यही बनी कर्मभूम‍ि:

मुकेश सोना जी मूलतः बिहार के मुजफ्फरपुर के निवासी हैं। इन्होंने कला विषय में स्नातक के बाद कामेश्वर सिंह कॉलेज से कला शिक्षा की ग्रहण की। कला साधना के बल पर इन्होंने अनेक पुरस्कार जीते। इनके चित्र विभिन्न गणमान्य व्यक्तियों के संग्रह में संग्रहित है। कला साधना ही इनके जीवन का मूल है। शाकुंतलम कला मंच का संचालन कर देश के कलाकारों मान संवर्धन कर रहें हैं। इनके कदम सराहनीय एवं अनुकरणीय है। मुकेश सोना का जन्मतिथि-21 अक्टूबर 1967 को ब‍िहार के मुजफ्फरपुर ज‍िले में हुआ। पिता स्‍व. उमाशंकर प्रसाद और माता स्‍व. शकुंतला देवी मुजफ्फरपुर ज‍िले के कटरा अंचल के खंगुरा गांव के रहने वाले थे।

कई कला सम्‍मान से अबतक हो चुके हैं सम्‍मान‍ित:

बचपन से ही मुकेश सोना की रुचि रंग रेखाओं एवं आकृतियों में रही है। कालांतर में पटना, कोलकाता एवं दिल्ली के वरिष्ठ स्वनामधन्य कलाकारों का सानिध्य एवं निर्देशन उन्‍हें प्राप्त हुआ। उन्‍होंने स्नातक प्रतिष्ठा के साथ सात वर्षीय डिप्लोमा इन फाइन आर्ट, चंडीगढ़ से किया। तत्पश्चात कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय दरभंगा से आचार्य की उपाधि प्राप्त की। जिला राज्य राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अनेक सम्मान और पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। वर्तमान में वह मुजफ्फरपुर जैसे शहर में रहते हैं। इस क्षेत्र की प्रतिभाओं का समुचित मार्गदर्शन कर उन्हें देश के विभिन्न कला महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में भेजने का काम कर रहे हैं। उन्‍होंने ‘शाकुंतलम् कला-संस्कृति मंच की स्थापना 1995 में की। इसके माध्यम से उन्‍होंने अनेक कला संवाद एवं गोष्ठियां आयोजित कीं। 10 राज्य स्तरीय कला प्रदर्शनी, दो राज्य स्तरीय कला शिविर, एक अखिल भारतीय कला प्रदर्शनी एवं अनके जिला स्तरीय कला कार्यक्रम सामाजिक सेवा के कार्यक्रम आयोजित कर चुके हैं। इन दिनों वह निरन्तर अपनी कला साधना में लीन हैं। उनके अनेक छात्र-छात्राएं देश-विदेश में अपना नाम रोशन कर रहे हैं।

लाकडाउन में देशभर के च‍ित्रकारों को दी मंच:

16 मार्च को लाकडाउन के बीच मुकेश सोना ने राष्‍ट्रीय स्‍तर पर देश भर के च‍ित्रकारों को मंच देने के ल‍िए आनलाइन च‍ित्रकला प्रदर्शनी का आयोजन क‍िया था। इसमें सैकड़ों च‍ित्रकारों ने ह‍िस्‍सा ल‍िया था। इस आयोजन की पूरे देश में जमकर सराहना हुई थी। उन्‍होंने इस आयोजन में भाग लेने वाले च‍ित्रकारों को आनलाइन सम्‍मान‍ित भी क‍िया था। मुकेश कुमार सोना मुजफ्फरपुर के सांस्‍कृत‍िक पर‍िवेश को ज‍िंंदा बनाए रखने के ल‍िए हर साल कलाश्री महोत्‍सव का आयोजन बड़े पैमाने पर करते हैं। इस आयोजन में हर व‍िधा के कलाकार शाम‍िल होते हैं। च‍ित्रकला से जुड़े युवा च‍ित्रकारों के ल‍िए यह एक शानदार मंच होता है। मुकेश कुमार सोना कहते हैं क‍ि हर मनुष्‍य के भीतर एक च‍ित्रकार छ‍िपा होता है, बस उसे उभारने की दरकार है। समाज के समुच‍ित व‍िकास के ल‍िए सांस्‍कृत‍िक व‍िकास भी जरूरी है। यही वजह है क‍ि उन्‍होंने अपनी ज‍िंंदगी च‍ित्रकला के नाम कर दी है।

ब‍िहार सरकार बनाए सांस्‍कृत‍िक नीत‍ि जरूरी:

च‍ित्रकार मुकेश सोना कहते हैं क‍ि ब‍िहार जैसे राज्‍य में कला और संस्‍कृत‍ि के व‍िकास के ल‍िए सरकारी स्‍तर पर सांस्‍कृत‍िक नीत‍ि का नहीं होना दुखद है। अगर राज्‍य में कला-संस्‍कृत‍ि के व‍िकास के ल‍िए नीत‍ि बन जाए तो कलाएंं और कलाकार दम नहीं तोड़ेंगे। दोनों का संरक्षण संभव हो सकेगा। वह कहते हैं क‍ि ब‍िहार के हर ज‍िले की अपनी सांस्‍कृत‍िक व‍िशेषता है। इसके व‍िकास और संरक्षण के ल‍िए एक रोडमैप की जरूरत है। यह तभी संभव है जब राज्‍य सरकार ब‍िहार में कला-संस्‍कृत‍ि नी‍त‍ि बनाएगी। उन्‍होंने कहा क‍ि अब तक ज‍ितनी भी सरकारें बनीं, क‍िसी ने इस द‍िशा में अबतक पहल नहीं की। यही वजह है क‍ि कलाकार और कलाएं दोनों लुप्‍त होती जा रही हैं। कई कलाएं तो अब पूरी तरह लुप्‍त हो चुकी हैं।

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