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कैसे हुई रक्षाबंधन पर्व की शुरुआत, जानें इसका महत्व

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फेस्टिवल: रक्षा बंधन का त्योहार भाई-बहन के बीच प्यार, रिश्ते और बंधन का प्रतीक है। इस वर्ष यह त्योहार रविवार 22 अगस्त को मनाया जाएगा। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती हैं और बदले में भाई बहनों को उपहार देते हैं। रक्षाबंधन के दिन हर भाई अपने बहन की रक्षा का वादा करता है। रक्षाबंधन भाई बहन के रिश्ते का प्रसिद्ध त्योहार है, रक्षा का मतलब सुरक्षा और बंधन का मतलब बाध्य है।

रक्षाबंधन का इतिहास:

भारतीय धर्म संस्कृति के अनुसार रक्षाबन्धन का पर्व श्रावण माह की पूर्णिमा को मनाते है। यह त्योहार भाई-बहन को स्नेह की डोर में बांधता है। इस दिन बहन अपने भाई के मस्तक पर टीका लगाकर रक्षा सूत्र बांधती है, जिसे राखी कहते हैं। श्रावण (सावन) में मनाये जाने के कारण इसे श्रावणी (सावनी) या सलूनो भी कहते हैं। राखी कच्चे सूत जैसे सस्ती वस्तु से लेकर रंगीन कलावे, रेशमी धागे, तथा सोने या चाँदी जैसी मँहगी वस्तु तक की हो सकती है। रक्षाबंधन के दिन बहने भगवान से अपने भाईयों की तरक्की के लिए भगवान से प्रार्थना करती है। बहनें आरती करती हैं और भाइयों को मिठाई खिलाती हैं।

माँ लक्ष्मी- राजा बलि:

यह कथा भगवान विष्णु के वामन अवतार से जुड़ी है। भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर असुरों के राजा बलि से तीन पग भूमि का दान मांगा था। राजा बलि इसके लिए तैयार हो गया। वामन देवता ने दो पग में पूरी धरती नाप ली। तीसरा पग में बलि समझ गया कि ये वामन स्वयं भगवान विष्णु ही हैं। बलि ने अगला पग रखने के लिए वामन देवता को अपना शीश को प्रस्तुत किया। बलि के इस समर्पण को देख कर विष्णु भगवान बलि पर प्रसन्न हुए और वरदान मांगने को कहा। असुर राज बलि ने वरदान में उनसे अपने द्वार पर ही खड़े रहने का वर मांग लिया। इस प्रकार भगवान विष्णु राजा बलि के द्वारपाल बन गए। तब माता लक्ष्मी ने नारद मुनि की सलाह पर असुर राज बलि को राखी बांधी और उपहार के रूप में भगवान विष्णु को मांग लिया।

द्रौपदी- श्रीकृष्ण:

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महाभारत में शिशुपाल के साथ युद्ध के दौरान भगवान श्री कृष्ण की तर्जनी उंगली कट गई थी। यह देखते ही द्रौपदी श्री कृष्ण जी के पास दौड़कर पहुंची और अपनी साड़ी से एक टुकड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर पट्टी बांध दी। इस दिन श्रावण पूर्णिमा थी। तब श्री कृष्ण ने द्रौपदी से रक्षा का वादा किया था। चीर हरण के समय द्वारकाधीश ने द्रौपदी की रक्षा की थी।

रानी कर्णावती और हुमायूं:

मध्यकालीन युग में रक्षाबंधन पर्व समाज के हर हिस्से में फैल गया। मेवाड़ पर महाराज की विधवा रानी कर्णावती राजगद्दी पर बैठी थीं। गुजरात का सुल्तान बहादुर शाह उनके राज्य पर नजरें गड़ाए बैठा था। तब रानी ने हुमायूं को भाई मानकर राखी भेजी। हुमायूं ने बहादुर शाह से रानी कर्णावती के राज्य की रक्षा की और राखी की लाज रखी।

यह त्योहार देशभर में अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है। उत्तरांचल में इसे श्रावणी कहते हैं। अमरनाथ की अतिविख्यात धार्मिक यात्रा गुरु पूर्णिमा से प्रारम्भ होकर रक्षाबन्धन के दिन सम्पूर्ण होती है। महाराष्ट्र राज्य में यह त्योहार नारियल पूर्णिमा या श्रावणी के नाम से विख्यात है। राजस्थान में रामराखी और चूड़ाराखी या लूंबा बांधने का रिवाज है।

रक्षाबंधन का महत्व:

इन कथाओं से ये पता चलता है कि रक्षाबंधन पर राखी या रक्षासूत्र के साथ ही उसके बदले में मांगे और दिये जाने वाले वचन का बहुत महत्व है। इसलिए इस दिन हर बहन अपने भाई को राखी बांधती हैं और भाई उसकी हिफाजत का वचन देता है। बहन भाई की कुशलता और सफलता की कामना करती है। ये वचन और भावना ही रक्षाबंधन के त्योहार का सबसे महत्वपूर्ण भाग है। क्योंकि प्रेम और विश्वास का यही बंधन भाई और बहन के रिश्ते के स्नेह की डोर अर्थात् राखी होती है।

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