Personality : 88 साल की उम्र में मेट्रो मैन श्रीधरन राजनीति के अखाड़े में कूदे , केरल में भाजपा को स्थापित करने का लक्ष्य

(सेंट्रलडेस्क ,नयीदिल्ली )। मेट्रोमैन ई श्रीधर को कौन नहीं जानता ।सभी जानते हैं कि दिल्ली में मेट्रो का श्रेय उन्हीं को है । आमतौर लोग रिटायर मेन्ट के बाद घर पर बैठ जाते हैं लेकिन श्रीधर की डिक्शनरी में रिटायर मेन्ट जैसा शब्द है ही नहीं। 65 साल की अवस्था श्रीधरन ने दिल्ली मेट्रो जिम्मा संभाला और अपनी कर्तव्यनिष्ठा के बल उसे ऐसी ऊंचाईयों पर ले गये जिसे लोग आज भी याद करते हुए उनका नाम लेते है।



समय के पाबन्द श्रीधरन अपने काम मे कोई दबाव , चाहे वह राजनीतिक ही क्यों हो , नहीँ मानते ।जिम्मेदारी अपने कंधे पर ली । दिल्ली मेट्रो परियोजना को आगे ले जाने में उन्होंने अपने मन के मुताबिक काम किया। कभी कोई हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीँ किया ।
88 साल के श्रीधरन ने अब भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम कर राजनीति के अखाड़े में उतर गए।

अब उन्होंने केरल में भाजपा को घर -घर तक पहुंचा कर उसे स्थापित करने का बीड़ा उठाया है। देखना होगा कि इस बार वह अपना टारगेट पूरा कर पाते हैं या नहीँ। गीता में उनकी अगाध श्रद्धा है । गीता को वह महज धार्मिक ग्रंथ भर नहीं मानते बल्कि प्रबंधन का मैन्युअल मानते रहे हैं और उसका पालन करते हैं।

‘मैनेजमेंट स्ट्रैटजी फार दिल्ली मेट्रो: द श्रीधरन वे’ किताब लिखने वाले डीएमआरसी के कार्यकारी निदेशक (जनसंपर्क) अनुज दयाल कहते हैं कि वह हर रोज योग करते हैं। दिल्ली मेट्रो में जब प्रबंध निदेशक (एमडी) थे, तब भी रोज गीता पढ़ा करते थे। समय के इतने पाबंद हैं कि हर रोज सुबह नौ बजे दफ्तर पहुंच जाते थे।

शाम को निर्धारित समय से देर तक दफ्तर में बैठते नहीं थे। बैठकें भी समय से शुरू होती और खत्म होती थीं। वह 79 साल की उम्र तक एमडी रहे। इस उम्र में भी 20 से 25 मीटर की गहराई में बनने वाली सुरंगों में उतरकर कार्य का निरीक्षण किया करते थे। वर्ष 2008 में मेट्रो भवन में पानी भर जाने पर 76 वर्ष की उम्र में भी वह सीढ़ी चढ़कर आठवीं मंजिल पर अपने कार्यालय में जाया करते थे। उन्होंने परियोजनाओं को हर हाल में निर्धारित समय में पूरा किया।

समयबद्धता, पेशेवर अंदाज, कार्य के प्रति निष्ठा व पारदर्शिता उनका मूलमंत्र है। दरअसल, जून 1990 में नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद तत्कालीन केंद्र सरकार ने उन्हें कोंकण रेलवे का सीएमडी (मुख्य प्रबंध निदेशक) बनाया। बाद में वर्ष 1997 के मध्य में दिल्ली मेट्रो के एमडी बनाए गए। इस पद पर उनकी नियुक्ति की कहनी भी दिलचस्प है।

एमडी की नियुक्ति के लिए गठित सर्च कमेटी में वह सदस्य थे। उस समय साहिब सिंह वर्मा मुख्यमंत्री, तेजेंद्र खन्ना उपराज्यपाल व राजेंद्र गुप्ता दिल्ली के परिवहन मंत्री थे। तीनों ने श्रीधरन से एमडी का पद संभालने का आग्रह किया। तब उन्होंने यह शर्त रखी कि उनके कामकाज में दखल नहीं होनी चाहिए। उन्हें मेट्रो की टीम गठित करने के लिए पूरी आजादी होनी चाहिए।

इन शर्तों को स्वीकार किए जाने पर वह दिल्ली मेट्रो की कमान संभालने को तैयार हुए। उनकी उम्र को लेकर नौकरशाही ने सवाल खड़े किए तो उनकी फिटनेस जांच कराई गई। तब तत्कालीन केंद्रीय सचिव टीएसआर सुब्रमण्यम ने फाइल पर कमेंट लिखा कि 75 वर्ष की उम्र में जब कोई प्रधानमंत्री हो सकता है तो श्रीधरन 65 की उम्र में दिल्ली मेट्रो के एमडी क्यों नहीं हो सकते।

उन्होंने अपने चयन को बिलकुल सही साबित किया। पद संभालने के बाद उन्होंने मेट्रो की कई परियोजनाओं में बदलाव कराया और राजनीतिक दृष्टि से तैयार किए गए रूटों को रद कराकर मेट्रो को घनी आबादी वाले इलाकों से गुजारा।

श्रीधरन स्टैंडर्ड गेज का मेट्रो ट्रैक बनाना चाहते थे। रेलवे बोर्ड की सलाह पर 4 अगस्त 2002 को मंत्री समूह ने जब ब्राड गेज का मेट्रो ट्रैक बनाने की ही स्वीकृति दी तो उन्होंने इस्तीफा देने की चेतावनी दी। इसके बाद स्टैंडर्ड गेज का मेट्रो ट्रैक बनाने की स्वीकृति दी गई। अब देशभर में इसी तरह से मेट्रो ट्रैक का निर्माण हो रहा है।

इसका फायदा यह है कि घनी आबादी वाले इलाकों में अधिक घुमावदार कारिडोर पर भी मेट्रो रफ्तार भर सकती है। मेट्रो में महिलाओं को किराये में छूट की बात चली तो श्रीधरन इस फैसले के खिलाफ भी खड़े हुए। उनके व्यक्तित्व को समझने वालों का कहना है कि सेवानिवृत्ति के बाद भी दिल्ली में मेट्रो नेटवर्क तैयार करने की चुनौती को बखूबी निभाकर ‘मेट्रो मैन’ कहे जाने वाले श्रीधरन राजनीति के अखाड़े की चुनौती को भी बखूबी पार करके दिखाएंगे।