31.1 C
Delhi
HomeNewsसमय के अंधरे में गुम हो गई ओडिशा के 'जलियांवाला बाग' कांड...

समय के अंधरे में गुम हो गई ओडिशा के ‘जलियांवाला बाग’ कांड की स्मृति

- Advertisement -spot_img

सतीश शर्मा। राष्ट्र के स्वाधीनता संग्राम के दौरान देश के विभिन्न स्थानों में लोगों ने अपने-अपने तरीके से आंदोलन में भाग लिया। जेल गये, यातनाएं सही, गोलियां खाई, बलिदान दिया। इनमें से अनेक बलिदान गाथाओं को इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में स्थान मिला। कई घटनाएं लोगों के स्मृति पटल पर दर्ज हुईं। कुछेक का सामान्य तरीके से उल्लेख हुआ, पर कई बलिदान गाथाएं समय के अंधरे में यूं ही गुम हो गईं।

सतीश शर्मा


विशेषकर पिछड़े आदिवासी इलाकों, रजवाड़ों के क्षेत्रों में हुए आंदोलनों को इतिहास में समुचित स्थान नहीं मिला। पंजाब के जलियांवाला बाग जैसे नरसंहार की घटनाएं और भी कई जगहों पर हुई पर देश उनसे अपरिचित बना रहा। ऐसी अपरिचित नरसंहार की एक घटना ओडिशा के आदिवासी बहुल जिले सुंदरगढ़ जिले में भी घटी थी। जलियांवाला बाग गोलीकांड के बीस साल बाद 25 अप्रैल, 1939 को ब्रिटिश पुलिस द्वारा किये गए नरसंहार में 49 से अधिक निरीह आदिवासी मारे गये थे। सैकड़ों घायल हुए। घटना के पचास वर्ष बाद तक भी स्थानीय लोगों के अलावा अन्य लोग इस त्रासदी पूर्ण घटना से अनभिज्ञ थे।

अपने अधिकारों के प्रति जागरूक निर्मल मुंडा (जन्म 27 जनवरी, 1894 – देहावसान 2 जनवरी 1973) राजदरबार के ऐसे निर्णयों से क्षुब्ध हो उठे थे और उन्होंने आदिवासियों को संगठित कर इसके विरुद्ध आवाज उठाने का फैसला किया। रायबोगा के निकट बड़टोली गांव में जन्मे निर्मल मुंडा पहले सेना में भर्त्ती हुए। उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध में फ्रांस में युद्ध में भाग लिया।

विश्व युद्ध से लौटकर वे डाहीजिरा स्कूल और राजगांगपुर स्कूल में शिक्षक के रूप में कार्यरत रहे। इसी दौरान वे स्वाधीनता आंदोलन की ओर आकर्षित हुए। गांगपुर राजदरबार के आदिवासी विरोधी निर्णयों ने उन्हें जीवन का उद्देश्य दे दिया। गांगपुर राज्य द्वारा भूमि बंदोबस्त में कर दोगुना किये जाने से आक्रोशित निर्मल मुंडा आदिवासियों को संगठित कर आंदोलन के लिए तैयार करने में जुट गए।

इस आंदोलन को कुचलने के लिए गांगपुर राज्य ने निर्मल मुंडा को गिरफ्तार करने का निर्णय किया। इसके बाद आदिवासियों पर दमनचक्र आरंभ हुआ। इसके प्रतिवाद में आवाज उठाने के लिये निर्मल मुंडा ने 25 अप्रैल 1939 को सिमको गांव में जनसभा बुलाई। इस जनसभा में खुंटकटी का अधिकार के लिए छोटानागपवुर टेनेंसी एक्ट के तहत मिले अधिकारों को बहाल करने, जंगल जमीन पर रैयतों का अधिकार देने समेत अन्य मांगों पर चर्चा होनी थी। यह भी कहा जाता है कि उस दिन गांगपुर की रानी जानकी रत्ना फैसला सुनाने वाली थीं इसलिए फैसला सुनने के लिए लोग आमको सिमको में जमा हुए थे।

गांगपुर की रानी जानकी रत्ना के पोलिटीकल एजेंट ले. ईडब्ल्यूएम मर्गर एवं कैप्टन विस्को भी यहां पहुंचे थे। पुलिस ने जनसभा को तीन ओर से घेर लिया और फैसला सुनाने के बजाय पुलिस ने निर्मल मुंडा की तलाश शुरू कर दी। पुलिस ने लोगों से निर्मल मुंडा के बारे मे पूछताछ शुरू की तो अनेक लोगों ने स्वंय को निर्मल मुंडा बताया। कहा जाता है कि पुलिस अधिकारी जब निर्मल मुंडा के खपरैल घर में घुस रहे थे तो एक अधिकारी की टोपी गिर गई। अधिकारी को लगा कि किसीने उनपर हमला कर दिया है बस इससे क्रोधित होकर अफसरों ने गोलीबारी के आदेश दे दिए। इस आंदोलन में 49 लोग शहीद हुए एवं 80 से अधिक लोगों को गोली लगी थी।

यह भी पढ़ें…

गोलीबारी के बाद पुलिस ने सभी शवों को बीरमित्रपुर के ब्राह्माणमारा खदान में फेंक दिया गया था। निर्मल मुंडा के साथ अनेक आदिवासियों को गिरफ्तार कर जेल में ठूंस दिया गया। उन्हें पहले जशपुर जेल और फिर सुंदरगढ़ जेल में रखा गया। देश आजाद होने के बाद 15 अगस्त, 1947 के बाद इन्हें रिहाई मिली। आदिवासी संगठन इस आंदोलन को स्वाधीनता आंदोलन का हिस्सा माने जाने की मांग कर रहे हैं पर सरकार ने अब तक वह मान्यता नहीं दी है।अवश्य आजादी के 25वें वर्ष के समारोह में 15 अगस्त 1972 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने निर्मल मुंडा को स्वाधीनता सेनानी ताम्रपत्र प्रदान कर सम्मानित किया था। 1957 में निर्मल मुंडा बिसरा से विधायक चुने गये थे।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

ये भी देखें…

- Advertisement -
- Advertisement -
- Advertisement -
Related News
- Advertisement -