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पं. बिरजू महाराज के दिल में बसता था बनारस

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वाराणसी: कथक को दुनिया में एक अलग पहचान दिलाने वाले पद्म विभूषण पंडित बिरजू महाराज के न रहने की खबर से काशी के संगीत प्रेमी स्तब्ध हैं। वह भले ही बनारस घराने से नहीं थे, लेकिन बनारस उनके दिल में बसता था। यहां उनकी ससुराल और समधियाना दोनों था।

पं. बिरजू महाराज का जब भी काशी आने का कार्यक्रम बनता तो वह दस दिन पहले से अपनी तैयारी शुरू कर देते थे। बनारस घराने के ख्यात संगीतकार पं. श्रीचंद्र मिश्र की बेटी अन्नपूर्णा देवी से उनका विवाह हुआ था। जबकि उनकी बड़ी कविता मिश्रा का पद्मविभूषण पं. साजन मिश्र से उनका विवाह हुआ था।

काशी की सड़कों पर ट्रैफिक के शोर में खोजते थे लय
ख्यात सितार वादक पं. नीरज मिश्र संस्मरणों को याद करते हुए कहते हैं कि कई बार उनके साथ मंच साझा करने का अवसर मिला। काशी के ट्रैफिक के शोर और बोल-चाल में भी वह लय खोजते थे। उनमें साक्षात कृष्ण की छवि दिखाई देती थी। उनके निधन से संकटमोचन का आंगन, गंगा महोत्सव का मंच अब सदैव के लिए सुना हो गया।

रविवार रात रूपवाणी स्टूडियो लोहटिया में आयोजित तीन दिनी “युवा बनारस” कार्यक्रम की अंतिम निशा में आनलाइन ख्यात नृत्यकार विशाल कृष्णा की प्रस्तुति देखकर वह अभिभूत हुए।

कलाश्रम में ली अंतिम सांस
पं. बिरजू महाराज की पोती रागिनी महाराज ने दैनिक जागरण को फोन पर बताया कि पं. बिरजू महाराज युवा बनारस कार्यक्रम की समाप्ति के बाद डोरबाग स्थित कलाश्रम (संगीत संस्थान) में ही थे। अचानक से उनको घबराहट हुई। पोती रागिनी उनके बालों में हाथ फेर रही थी इस बीच उनकी सांसें थम गईं। अभी कुछ दिन पहले ही वह एक निजी अस्पताल से डायलिसिस करवाकर घर लौटे थे। उनकी दिली इच्छा थी कि कथक को सीखने और समझने के लिए एक संस्थान बने जहां युवा इस विधा से परिचित हो सकें। लखनऊ के अमीनाबाद स्थित बिंदादीन महाराज की ड्योढ़ी को उन्होंने कथक शोध संस्थान और संग्रहालय में बदल दिया था।

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