लौट आओ फुदकते हुए आंगन में गौरेया

कानपुर/दिवस पाण्डेय : आधुनिकता की दौड़ में प्रकृति दोहन अक्सर किसी विभीषिका को निमंत्रण दे डालती है। कांक्रीट के जंगल प्राकृतिक पर्यावरण को लीलते जा रहे हैं। तमाम प्रजातियां अब विलुप्त हो चुकी हैं और बहुत सी विलुप्त होने की कगार पर हैं। गौरैया भी उन्ही में से एक है। घरेलू गौरैया (पासर डोमेस्टिकस) एक पक्षी है जो भारत  में सामान्य रूप से हर जगह पाया जाता है। इसके अतिरिक्त पूरे विश्व में जहाँ-जहाँ मनुष्य गया इसने उनका अनुकरण किया और अमरीका के अधिकतर स्थानों, अफ्रीका के कुछ स्थानों, न्यूज़ीलैंड और आस्ट्रेलिया तथा अन्य नगरीय बस्तियों में अपना घर बनाया।


शहरी इलाकों में गौरैया की छह तरह ही प्रजातियां पाई जाती हैं। ये हैं हाउस स्पैरो, स्पेनिश स्पैरो, सिंड स्पैरो, रसेट स्पैरो, डेड सी स्पैरो और ट्री स्पैरो। इनमें हाउस स्पैरो को गौरैया कहा जाता है, यह गाँव में ज्यादा पाई जाती हैं। आज यह विश्व में सबसे अधिक पाए जाने वाले पक्षियों में से लोग जहाँ भी घर बनाते हैं देर सबेर गौरैया के जोड़े वहाँ रहने पहुँच ही जाते हैं। पिछले कुछ सालों में शहरों में गौरैया की कम होती संख्या पर चिन्ता प्रकट की जा रही है। आधुनिक स्थापत्य की बहुमंजिली इमारतों में गौरैया को रहने के लिए पुराने घरों की तरह जगह नहीं मिल पाती। सुपरमार्केट संस्कृति के कारण पुरानी पंसारी की दूकानें घट रही हैं। इससे गौरेया को दाना नहीं मिल पाता है। इसके अतिरिक्त मोबाइल टावरों से निकले वाली तंरगों को भी गौरैयों के लिए हानिकारक माना जा रहा है।

ये तंरगें चिड़िया की दिशा खोजने वाली प्रणाली को प्रभावित कर रही है और इनके प्रजनन पर भी विपरीत असर पड़ रहा है जिसके परिणाम स्वरूप गौरैया तेजी से विलुप्त हो रही है। गौरैया को घास के बीज काफी पसंद होते हैं जो शहर की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में आसानी से मिल जाते हैं। ज्यादा तापमान गौरेया सहन नहीं कर सकती। प्रदूषण और विकिरण से शहरों का तापमान बढ़ रहा है। खाना और घोंसले की तलाश में गौरेया शहर से दूर निकल जाती हैं।और अपना नया आशियाना तलाश लेती हैं। गौरैया के बचाने की कवायद में दिल्ली सरकार ने गौरैया को राजपक्षी घोषित किया है। और देश में 20 मार्च का दिन गौरैया बचाव दिवस के रूप में मनाया जाने लगा है.।
कानपुर महानगर का  परिवेश  ग्रामीण आँचल से घिरा हुआ था , पर बढ़ते शहरीकरण चलते हुए पर्यावरण के नुकसान का अंदाजा किसीने नहीं  लगाया था. वर्तमान में घरेलू चिड़िया गौरैया “लगभग लुप्त हो  चुकी है।  इस बात को सबसे पहले सन 2014 में एक नवयुवक गौरव बाजपेयी ने महसूस किया।  और तभी से गौरव ने गौरैया बचाव अभियान की शुरुआत कर डाली। 

एक छोटी  सी शुरुआत एक बड़े अभियान का हिस्सा बनाने के लिए गौरव बाजपाई ने एक मुहिम चला रखी है , जिसके अंतर्गत वे लोगों को गौरैया के महत्त्व और उसके पर्यावरण में योगदान के बारे में बताते है और साथ ही साथ उसके बचाव के लिए विशेष रूप से बने घरों को भी बना कर लोगों  प्रोत्साहित करते कि अपने घरों में वे ऐसे घर बनाएं जिसमे गौरैया अपना घोसला बना सके।  प्राकृतिक साहचर्य के नियम के तहत गौरैया ही एक ऐसा पक्षी है जो स्वतंत्र हो कर भी मनुष्यों के साथ रहना पसंद करता है।  इसलिए यह हमारी जिम्मेदारी है की इस अनूठे पक्षी को अपने साथ जीने के सभी साधन उपलब्ध कराएं। आज गौरव के साथ पांच हजार से ज्यादा लोग जुड़ चुके हैं जो उनके अभियान में अपना सहयोग कर रहे हैं।  गौरव बाजपेयी का मानना है की अभी बहुत कुछ किया जाना बांकी है।  उनके इस प्रयास से अब गौरैया पुनः अपने आस्तित्व की रक्षा कर पाने में सक्षम होने के लिए संघर्ष कर रही है।  आशा है आने वाले वर्षों में अगर इस प्रयास को इसी तरह बल मिलता रहे तो जल्द ही गौरैया के कलरव से शहरों की इमारतें गुंजायमान हो सकेंगी।