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ग्रामीण बैंकों में बढ़ता कार्यभार, बड़े आंदोलन की तैयारी, फैजाबाद में कोर कमेटी की बैठक में तय होगी रणनीति

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कानपुर: देश के ग्रामीण बैंकों में अधिकारियों और कर्मचारियों पर लगातार कार्यभार बढ़ता जा रहा है। बैंकों में 30 से 35 हजार पद रिक्त हैं और नई नियुक्तियां नहीं की जा रही हैं जिसके कारण प्रति शाखा औसतन ग्राहक भार 19,000 का है तथा प्रति स्टाफ औसतन ग्राहक भार 4,400 का है। बैंकों शाखाओं में न्यूनतम सुविधाओं के बाद भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देने और राष्ट्रीय स्तर पर समस्याओं को सरकार के सामने लाने के लिए बैंक अधिकारियों और कर्मचारियों के सभी संगठन रणनीति तैयार कर रहे हैं। इसके लिए 4 जुलाई को फैजाबाद में कोर कमेटी की बैठक बुलाई गई है।

नेशनल फेडरेशन आफ क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक अधिकारी NFRRBO के अध्यक्ष सगुण शुक्ला ने बताया कि देश की सभी सरकारी एवम निजी बैंकों के औसत चार्ट का अध्ययन करने पर पता लगता है कि ग्राहकों के आधार पर निर्धारित औसत अधिभार सर्वाधिक रूप से ग्रामीण बैंकों में है। ऐसी स्थितियों में भी नीति निर्धारकों का ध्यान इस ओर नहीं जा रहा है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण बैंकों के क्षेत्र में आल इंडिया रीजनल रूरल बैंक इम्पलाइज एसोसिएशन सबसे बड़ा संगठन है। उसके साथ ही अन्य संगठन भी इन मुद्दों पर एक साथ मिल कर संघर्ष करने की तैयारी कर रहे हैं।

8 लाख 60 हज़ार करोड़ से अधिक का कारोबार
देश भर में स्थापित 43 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की लगभग 21,000 से अधिक शाखाएं हैं। इनमें वर्तमान में लगभग 90,000 स्टाफ विभिन्न पदों में मानव शक्ति के रूप में सेवारत है। सभी ग्रामीण बैंक का मार्च 2021 के संयुक्त डेटा के अनुसार कुल व्यवसाय 8 लाख 60 हज़ार करोड़ से अधिक का हो चुका है। यह कारोबार देश के ग्रामीण भारत से जुड़े लगभग 40 करोड़ ग्राहकों के माध्यम से संभव हुआ है।

ये हैं प्रमुख समस्याएं

  • न्यूनतम भत्ते एवम सुविधाएं तथा समय-समय पर मिलने वाला एरियर टुकड़ों में प्राप्त होता है।
  • शाखाओं में न्यूनतम ग्राहक सुविधा के साथ न्यूनतम इंफ्रास्ट्रक्चर में सेवा दे रहे हैं।
  • न्यूनतम रूप से नई भर्ती की जा रही है, वर्तमान में निर्धारित मैनपावर नीति का भी अनुपालन नही किया जा रहा है जबकि 30 से 35,000 पद वर्षो से रिक्त हैं।
  • ग्राहकों की सेवा संवाद की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी स्थाई चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी ग्रामीण बैंक में न्यूनतम संख्या में सेवारत है और हज़ारों रिक्त पदों में न्यूनतम वेतन पर एक दशक से ज्यादा अवधि से सेवारत अस्थाई संदेशवाहक स्थाई भी नहीं किए जा रहे हैं।
  • शाखाओं की साफ सफाई के लिए ग्रामीण बैंकों में सफाई कर्मी से न्यूनतम भुगतान कर वर्षो से काम लिया जा रहा है।
  • संगठनात्मक व्यवस्था को न्यूनतम पहचान भी नियम के अनुसार 45 वर्षो में नही प्रदान की गई है।
  • अधिकतम विसंगतियों के साथ बैंकिंग पेंशन योजना को लागू कर न्यूनतम संख्या बल को न्यूनतम रूप से पेंशन निर्धारित कर पेंशन का भुगतान किया जा रहा है।
  • संवैधानिक रूप से ग्रेच्युटी की गणना बिना महंगाई भत्ते के करते हुए न्यूनतम भुगतान किया जा रहा है।
  • मृतक आश्रित योजना को पुनः लागू करते हुए भारत सरकार द्वारा यही ध्यान रखा गया कि न्यूनतम परिवारों को रोजगार प्रदान किया जाए जो कि हो रहा है जबकि 5,000 से ज्यादा परिवार भुखमरी की कगार पर है जिन्हें बैंकिंग उद्योग की योजना के अनुसार रोजगार मिलना चाहिए था।
  • देश की वृहद विस्तार वाली ग्रामीण भारत की बैंकिंग व्यवस्था की रीढ़ को सशक्त करने की भावी योजना में ग्रामीण बैंकों के नीति निर्धारक प्रवर्तक बैंक (देश के सरकारी बैंक), नाबार्ड, राज्य सरकारें, भारत सरकार अपनी गंभीरता का न्यूनतम से न्यूनतम प्रयोग करती चली आ रही है।
  • भविष्य में भारत सरकार अपनी मजबूत हिस्सेदारी को भी न्यूनतम स्तर में लाने के लिए प्रतिबद्ध लग रही है और ग्रामीण बैंक से जुड़े 90 फीसद गरीब ग्राहक भी उपरोक्त बैंक के सरकारी एवं सुरक्षित आवरण से शीघ्र ही न्यूनतम संरक्षण प्राप्त करने की दिशा में केंद्र सरकार की पूंजीवादी नीतियों के कारण अग्रसर हैं।

संघर्ष के चरण

सभी जिलाधिकारियों को ज्ञापन, सभी सांसदों को ज्ञापन, राजधानी स्थित नाबार्ड, आरबीआई, मुख्यमंत्री कार्यालयों को ज्ञापन, सभी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के मुख्यालय में बैंक अध्यक्ष को प्रदर्शन करते हुए ज्ञापन देना।

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