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झंडागीत के रचइता श्यामलाल गुप्त पार्षद की 125वीं जयंती साल भर तक मनायी जाएगी

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-पार्षद जी का झंडागीत स्वतंत्रता सेनानियों में अनुशासित जोश भर देता था
-नरवल में भी हुआ 125वीं जयंती समारोह जिसे नरेंद्र शर्मा ने संबोधित किया

कानपुर: झंडा गीत के रचइता पद्मश्री श्यामलाल गुप्त पार्षद की 125वीं जयंती वर्ष के अवसर लोक सेवक मंडल और पार्षद स्मृति संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित समारोह में साल भर तक उनकी स्मृति में कार्यक्रम आयोजित करने का निर्णय लिया गया। यह अद्भुत संयोग है कि देश की आजादी के 75 साल पूरे हो चुके हैं तो दूसरी झंडा गीत के रचइता की 125वीं जयंती मनायी गई। दूसरी तरफ नरवल में भी समारोह आयोजित किया गया जिसे शहर के उद्योगपति समाजसेवी नरेंद्र शर्मा ने संबोधित किया।

शास्त्री भवन में आयोजित कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि प्रतीक पुरुषों की तलाश के इस दौर में देश को आजादी दिलाने वालों को साल भर तक याद किया जाना अपने आप में बड़ी बात है। इसकी घोषणा करने वाले वक्ता सुरेश गुप्ता ने यह स्पष्ट नहीं किया कि पार्षद जी की स्मृति में चलने वाले कार्यक्रम किस बैनर तले आयोजित किए जाएंगे।

श्यामलाल गुप्त पार्षद के साथ स्वतंत्रता सेनानी पूर्व विधायक शिवराम पांडेय

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रोफेसर डा.शिवकुमार दीक्षित ने श्यामलाल गुप्त पार्षद के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने आज के संदर्भ में उनकी प्रासंगिकता को रेखांकित किया। श्यामलाल गुप्त पार्षद ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान क्रांतिवीरों अपने गीतों के जरिये नया जोश भरने का काम किया था। देश को झंडागीत देने का पुनीत कार्य किया। कानपुर में हर वर्ष उनकी जन्मतिथि और पुण्यतिथि मनायी जाती है जिसमें उनके अविस्मरणीय योगदान को याद किया जाता है।

शास्त्री भवन में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ इतिहासकार रामकिशोर त्रिपाठी ने की। उन्होंने झंडा गीत के रचइता श्यामलाल गुप्त पार्षद के जीवन से जुड़े रोचक संस्मरण सुनाए। लोक सेवक मंडल के कानपुर केंद्र के अध्यक्ष दीपक मालवीय ने कहा कि शास्त्री भवन राष्ट्र एवं व्यक्ति निर्माण संबंधी एक्टीविटी का मुख्य केंद्र रहा है, हमेशा रहेगा। यह संस्था का सौभाग्य है कि पार्षद जैसे महान व्यक्ति की 125वीं सालगिरह यहां मनायी जा रही है। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जिस व्यक्ति के लिखे गीत भीड़ को अनुशासित भीड़ में बदलने की क्षमता रखते थे, उस भारत मां के अमर सपूत को आज देश के कर्णधार भूल चुके हैं। देश का नेतृत्व भले ही श्यामलाल गुप्त के योगदानों को भुला दे, लेकिन आजादी की लड़ाई के इतिहास में उनका नाम सदा स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा और राष्ट्रप्रेमियों के हदय में उनका झंडागीत गूंजता रहेगा।

नरवल में सम्बोधित करते हुए समाजसेवी नरेंद्र शर्मा।

श्यामलाल गुप्त पार्षद जी का जन्म 16 सितंबर,1893 को कानपुर जिले के नरबल कस्बे के एक साधारण व्यवसायी विशेश्वर गुप्त के घर में हुआ था। मिडिल पास करेने के बाद विशारद की उपाधि हासिल की। उन्हें जिला परिषद एवं नगरपालिका में अध्यापक की नौकरी मिली भी, लेकिन जब दोनों जगहों पर तीन साल का बांड भरने की नौबत आई, तो उन्होंने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। एक जानकारी के अनुसार वर्ष 1921 में जब वह गणेश शंकर विद्यार्थी के संपर्क में आए, तो फतेहपुर को अपना कार्यक्षेत्र बना लिया। उन्होंने नागपुर के कांग्रेस अधिवेशन में भी भाग लिया। फतेहपुर में वह रानी असोधर के महल से असहयोग आंदोलन शुरू करने के आरोप में गिरफ्तार होकर जेल गए। एक व्यंग्य रचना लिखने के अपराध में उन पर 500 रुपये का जुर्माना भी लगा। वर्ष 1924 में जब स्वाधीनता आंदोलन अपने चरम पर था, तब उन्होंने झंडागान की रचना की, जिसे कांग्रेस ने स्वीकारा और 1925 में कानपुर कांग्रेस में यह गीत ध्वजारोहण के दौरान पहली बार सामूहिक रूप से गाया गया।

श्यामलाल गुप्त द्वारा लिखित झंडा गीत इस प्रकार है-विजयी विश्व तिरंगा प्यारा/ झंडा ऊंचा रहे हमारा/ सदा शक्ति बरसाने वाला/ वीरों को हरषाने वाला/ शांति सुधा सरसाने वाला/ मातृभूमि का तन-मन सारा/ झंडा ऊंचा रहे हमारा। आजादी के आंदोलन में इस गीत ने देश के जनमानस में चेतना जगाने का महत्वपूर्ण काम किया। इस गीत की तीसरी पंक्ति में गांधीजी ने शांति के स्थान पर प्रेम शब्द जोड़ा। यह गीत ब्रिटिश हुकूमत की आंखों की किरकिरी बना रहा, लेकिन आजादी मिलने के बाद इसे भुला दिया गया। वर्ष 1930 में नमक आंदोलन में भी वह गिरफ्तार होकर जेल गए। 1932, 1942 और 1944 में तो वह लंबे समय तक भूमिगत रहे। अपनी राजनीतिक सक्रियता के दौरान उनका संपर्क पुरुषोत्तम दास टंडन, मोतीलाल नेहरू, महादेव देसाई व पंडित रामनरेश त्रिपाठी से भी रहा।

समाज के गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए उन्होंने कानपुर में गंगादीन-गौरीशकंर विद्यालय की स्थापना की, जो अब दोसर वैश्य इंटर कॉलेज के नाम से जाना जाता है। उन्होंने इस कॉलेज की पत्रिका का भी वर्षों संपादन किया। उन्होंने एक अनाथालय और एक बालिका विद्यालय की भी स्थापना की। देश से उन्हें कितना प्यार था, यह उनके अग्रलिखित गीत से प्रकट होता है। यह गीत गुप्तजी ने 12 मार्च, 1972 को लखनऊ के कात्यायनी कार्यालय में सुनाया था-देख गतिविधि देश की मैं मौन मन में रो रहा हूं/आज चिंतित हो रहा हूं/बोलना जिनको न आता था, वही अब बोलते हैं/रस नहीं वह देश के, उत्थान में विष घोलते हैं। ऐसा उल्लेख भी एक वेबसाइट में मिलता है कि श्यामलाल गुप्त इतने स्वाभिमानी थे कि जीवन भर अभावों में रहने के बावजूद कभी किसी से याचना नहीं की।

यहां तक कि अर्थाभाव के कारण ही वह अपना इलाज नहीं करा सके और 10 अगस्त, 1977 की रात इस दुनिया से विदा हो गए। यह विडंबना ही है कि जिस व्यक्ति ने 23 साल तक लगातार राष्ट्रीय झंडा को उठाये रखा, उसके सम्मान में एक दिन भी झंडा झुकाया नहीं गया।

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