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जानिए कौन हैं भाजपा में भगदड़ कराने वाले स्वामी दादा

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चुनाव डेस्क। यूपी के चुनावी युद्ध महाहलचल पैदा करने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य की ताकत को लेकर कयास लगाए जाने लगे हैं। आखिर उनमें ऐसा क्या है जो उन्होंने कमंडल से मंडल निकालने के हालात भाजपा में बना दिए। चुनावी जंग के मैदान में विकास और धर्म के रथ पर सवार भाजपा के योद्धाओं जात-पांत की राजनीति वाले मंडल रथ पर बैठने को मजबूर कर दिया। यूपी का चुनाव का फिलहाल पिछड़ी जातियों पर फोकस है।

ऐसे हालात पैदा करने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य की आखिरकार ताकत क्या है? इस बात को लेकर नयी बहस चल रही है। मौर्य न शुक्रवार को अपने भाषण में बढ़-चढ़कर बोला भी। स्वामी प्रसाद मूलतः प्रतापगढ़ जिले के रहने वाले हैं। बीते तीस सालों से स्वामी प्रसाद मौर्य (68) प्रदेश की राजनीति में सक्रिय हैं। पिछड़ा वर्ग खासतौर पर कोइरी समाज में जनाधार रखने वाले मौर्य का आगरा से लेकर गोरखपुर तक फैले कोइरी समाज पर मौर्य की पकड़ जगजाहिर है।

ये कुशवाहा, शाक्य और मौर्य, कोली नाम से जाने जाते हैं। उनका मानना है कि मौर्य इस गैर-यादव ओबीसी वोट को लाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। आगरा, जौनपुर, गाजीपुर, बलिया, मऊ, कुशीनगर, गोऱखपुर, महाराजगंज में कोइरी या कुशवाहा समाज की बड़ी आबादी है। इन इलाकों में कुछ हजार वोटों का अंतर निर्णायक हो जाता है। दरअसल कुशवाहा आबादी वाली जिन सीटों पर तगड़ी फाइट होती है वहां पर स्वामी की अहमियत बढ़ जाती है।

शायद यही वजह है कि स्वामी प्रसाद मौर्य की अहमियत सभी पार्टी में बढ़ जाती है। स्वामी प्रसाद मौर्य ने रायबरेली जिले की डलमऊ विधानसभा सीट से पहला चुनाव बसपा की टिकट से 1996 में जीता था। फिर 2007 में इन्हें इसी विधानसभा सीट से कांग्रेस के अजय पाल सिंह ने हरा दिया था। मौर्य तीसरे नंबर पर आए थे। राजनीति के चतुरसुजान मौर्य को मायावती ने विधान परिषद भेजा। और सरकार में मंत्री बनाया। 2012 में मौर्य फिर विधानसभा चुनाव जीते। इस चुनाव में उनके पुत्र उत्कृष्ट को रायबरेली और पुत्री संघमित्रा अलीगंज विधानसभा सीट से टिकट दिया गया पर दोनों ही हार गए।

मौर्य बसपा में नंबर दो की हैसियत रखते थे। गैर-यादव ओबीसी नेता के रूप में उनकी पहचान बनती चली गयी। मायावती ने इन्हें नेता विरोधी दल बनाया। इनके दबदबे के कारण इनके राजनीतिक दुश्मन भी बनते गए। मायावती से इनके पर कुतरने की बात कही जाने लगी। मौर्य बसपा में बेचैनी महसूस करने लगे, वजह थी सतीश मिश्रा जिन्हें मायावती आगे बढ़ाने लगी।

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2016 में मायावती से मतभेद के चलते स्वामी प्रसाद ने पार्टी छोड़ दी। वह मायावती के खिलाफ मुखर होते गए। 2017 में मौर्य ने भाजपा की टिकट पर पडरौना से चुनाव लड़ा जीते और मंत्री बनाये गए। बेटा उत्कृष्ट ऊंचाहार से चुनाव हार गया पर 2019 में उनकी बेटी संघमित्रा मौर्य को लोकसभा का टिकट भाजपा ने दिया। वह जीत गयी। संघमित्रा मौर्य ने बंदायु से सपा के धर्मेंद्र यादव को हराया। स्वामी प्रसाद मौर्य ने ऐन महीने भर पहले भाजपा छोड़ दी।

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