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सियासी गलियारों में सवाल! क्या भाजपा को पता था चुनाव शेड्यूल?

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-कुछ तो गड़बड़ है, चुनाव शेड्यूल भाजपा मैच कैसे कर गए -403 में 275 सीटों पर प्रचार कर चुकी है भाजपा
-मायावती निकल नहीं पायी, अखिलेश का रथ थमा, अचार संहिता ने रोका प्रियंका को

चुनाव डेस्क। यूपी में पीएम नरेंद्र मोदी की 14, गृहमंत्री अमित शाह की 20 और सीएम योगी आदित्यनाथ की 78 भीड़भाड़ वाली चुनावी सभाओं के खत्म होने के बाद चुनाव आचार संहिता लागू हो जाना, डिजिटल प्रचार तक पार्टियों को सीमित रखने के साथ ही 7 चरणों में मतदान कराने, 10 मार्च को परिणाम घोषणा से लगता है जैसे सत्तादल को चुनाव आयोग की योजना की भनक लग गयी थी कि अमुक तारीख से चुनाव होंगे।

क्या यह महज संयोग था या भाजपा ने कोरोना की गम्भीरता को भांप लिया था या फिर भाजपा को मालूम था कि 8 जनवरी को आयोग चुनाव की घोषणा कर देगा। इन कयासों पर अभी भी काई जमा है। घोषणा से पहले ही मोदी शाह और योगी द्वारा 68% विधानसभा क्षेत्रों को जल्दी जल्दी मथ डालना महज इत्तफाक नहीं कहा जा सकता।

पांच राज्यों में चुनावी तिथियों का एलान किया जा चुकाहै। अखिलेश 24 सभाएं ही कर सके। हालांकि यह सब देखने में तो रोजमर्रा के काम जैसा लगता है कि भई यह तो करना ही था। पर गहराई से देखने पर तस्वीर का दूसरा रुख समझ आने लगता है। यूपी पर ही भाजपा का फोकस क्यों? चुनाव कार्यक्रम इतने फिट कैसे बैठ गए कि भाजपा को सूट कर रहे थे।

आयोग ने 15 जनवरी तक रैली, रोड-शो और नुक्कड़ सभाओं पर रोक लगा दी है, लेकिन इससे पहले ही भाजपा के टॉप नेता पूरे उत्तर प्रदेश में रैलियों और रोड-शो की बमबारी कर सुरक्षित अपने ठिकानों पर उतर चुके थे। विपक्षी नेताओं की बारी आने तक चुनावी आसमान में उड़ान पर ही रोक लगा दी गई।

दरअसल, नए साल के आठवें दिन चुनाव की तारीखों के ऐलान से पहले ही मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और यूपी के मुख्यमंत्री योगी सूबे की हर तीन में से दो एसेंबली सीटों पर रैली या रोड-शो कर चुके हैं। प्रतिशत के लिहाज से समझें तो यह आंकड़ा 68% होता है। सीटों के हिसाब से देखें तो यूपी की 403 सीटों में से 275 पर यह तिकड़ी पहुंच चुकी थी।

एक और मजेदार बात- इनमें से ज्यादातर रैलियां आचार संहिता लागू होने से पहले होने के कारण सरकारी खर्च पर की गई हैं।
विपक्षी अखिलेश यादव का रथ कोरोना ने रोक दिया, तो बसपा की मायावती अब तक बाहर ही नहीं निकलीं। हां, कांग्रेस की प्रियंका की लड़कियां कई शहरों में सड़कों पर तो उतरीं, लेकिन क्या वो लड़ाई का रुख बदल पाएंगी या इनामी स्कूटी लेकर घर बैठ जाएंगी, ये तो 10 मार्च ही बताएगा।

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