देशद्रोह कानून के प्रावधानों पर केंद्र करेगा पुनर्विचार, सुप्रीम कोर्ट ने पूछा तब तक कानून स्थगित कर दें?

दिल्ली

सेंट्रल डेस्क। केंद्र सरकार ने भारतीय दंड संहिता की धारा-124 ए (देशद्रोह) का फिर से परीक्षण और पुनर्विचार करने का निर्णय लिया है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने यह बात बताई है। नया हलफनामा दायर कर केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट के सामने अपना पक्ष रखा। इस धारा के तहत अधिकतम सजा के तौर पर आजीवन कारावास का प्रावधान है।

वही पत्रकारों, एक्टिविस्ट, गैर सरकारी संगठनों और राजनीतिक नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर कर इस कानून का विरोध किया है। केंद्र ने हलफनामे में कहा कि इस कानून के बारे में विभिन्न न्यायविदों, शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों और सामान्य नागरिकों ने अलग-अलग विचार रखें गए हैं।

मंगलवार को सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा, देशद्रोह कानून की संवैधानिक वैधता के संबंध में अदालत की कवायद को केवल इसलिए नहीं रोका जा सकता क्योंकि विधायिका को छह महीने या एक साल के लिए पुनर्विचार करने में समय लगेगा। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा कि देशद्रोह कानून पर पुनर्विचार करने में कितना समय लगेगा। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जवाब दिया कि कानून पर पुनर्विचार की प्रक्रिया चल रही है। कोर्ट ने यह भी पूछा है कि वह पता करें कि पुनर्विचार पूरा होने तक कानून को स्थगित रखा जा सकता है।

केंद्र ने हलफनामे में कहा है कि, पीएम की धारणा है कि जब हमारा देश आजादी के 75 वर्ष मना रहा है हमें औपनिवेशिक बोझ को दूर करने की दिशा में काम करना चाहिए। उसी भावना के अनुरूप 2014-15 से अब तक 1500 से अधिक पुराने कानूनों को खत्म कर दिया गया है। 25000 से अधिक अनुपालन (कंप्लायंस) बोझ को भी समाप्त कर दिया है जो लोगों के लिए अनावश्यक बाधा उत्पन्न कर रहे थे। केंद्र ने कहा, लोगों को बिना सोचे-समझे परेशान करने वाले कई कानूनी प्रावधानों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया है। यह सतत प्रक्रिया है। ये ऐसे कानून और अनुपालन थे जो औपनिवेशिक मानसिकता को जन्म देते थे। आज भारत में इनकी कोई जगह नहीं है।

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