विक्रांत। यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन, 2026 के समर्थन में तथा इसे और मजबूती से लागु करने के लिए इंकलाबी नौजवान सभा एवं छात्र संगठन आइसा ने डुमराँव में मार्च निकला । मार्च डुमराँव थाना से शुरू हुआ तथा शहर की विभिन्न सडकों से होकर गुजरता हुआ गढ़ चौक पर पहुंचा जहाँ इसे सभा में बदल दिया गया ।

सभा को सम्बोधित करते हुए डुमराँव के पूर्व विधायक एवं इंकलाबी नौजवान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ० अजीत कुमार सिंह ने कहा कि यूजीसी के उच्च शिक्षा संस्थानों में इक्विटी से संबंधित नए नियम का घोषित उद्देश्य धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान या दिव्यांगता के आधार पर विशेष रूप से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति, सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, दिव्यांगजनों अथवा इनमे से किसी के भी सदस्यों के किसी भी प्रकार के भेदभाव को समाप्त करना और विश्वविद्यालयों व कॉलेजों में समानता तथा समावेश को बढ़ावा देना है।
यह कोई छिपी हुई सच्चाई नहीं है कि देश के विश्वविद्यालय जाति उत्पीड़न हो रहें हैं । यूजीसी के अपने आंकड़े बताते हैं कि 2019 से 2024 के बीच उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव की शिकायतों में 118 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। रोहिथ वेमुला, पायल तडवी और दर्शन सोलंकी की मौतों ने यह साफ कर दिया कि शैक्षणिक संस्थान भी सामाजिक अन्याय से अछूते नहीं हैं ।
2012 में यूजीसी द्वारा जारी किए गए दिशा-निर्देश इन घटनाओं को रोकने में पूरी तरह विफल रहे हैं । शिकायत निवारण तंत्र निष्क्रिय रहा, प्रशासनिक पक्षपात बना रहा और पीड़ित छात्रों को अक्सर चुप करा दिया गया । 2026 के नए नियम इसी संस्थागत विफलता की स्वीकृति हैं ।
इन नियमों का एक सकारात्मक पहलू यह है कि अब ओबीसी छात्रों को भी स्पष्ट रूप से इक्विटी सुरक्षा के दायरे में शामिल किया गया है। यह संवैधानिक रूप से आवश्यक और लंबे समय से लंबित कदम था। यदि इन्हें ईमानदारी से लागू किया जाए, तो ये भेदभाव के शिकार छात्रों के लिए कुछ हद तक सुरक्षा प्रदान कर सकती हैं।
ऐसे समय में, जब इन नियमों के खिलाफ कुछ सवर्ण समूह “मेरिट के खतरे” या “अनावश्यक जाति-चर्चा” का तर्क देते हैं, तो यह समझना ज़रूरी है कि यह विरोध समानता के खिलाफ नहीं, बल्कि विशेषाधिकार खोने के डर से प्रेरित है । जिस समाज में सदियों से असमानता रही हो, वहां केवल यह कहना कि “अब सब बराबर हैं” न्याय नहीं कहलाता । अगर दौड़ की शुरुआत ही कुछ लोगों को आगे खड़ा करके की गई हो, तो बराबरी के लिए विशेष उपाय ज़रूरी होते हैं । इक्विटी रेगुलेशन इसी असमानता को संतुलित करने का प्रयास है, न कि किसी के साथ अन्याय ।
समानता कोई रियायत नहीं, बल्कि अधिकार है । और अधिकारों का क्रियान्वयन अक्सर विरोध के बावजूद करना पड़ता है । इसलिए यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन, 2026 को सख्ती, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ देश के सभी उच्च शिक्षा संस्थानों में अनिवार्य रूप से लागू किया जाना ही चाहिए, तभी विश्वविद्यालय वास्तव में न्याय और ज्ञान के केंद्र बन सकेंगे ।
मार्च में इनौस के जिला संयोजक राजदेव सिंह, धर्मेंद्र सिंह यादव, बीरन यादव, सोनू यादव, धुरान यादव, सुरेंद्र प्रसाद, हरेंद्र मौर्या, अरविन्द सिंह, धनई राम, कन्हैया पासवान, नासिर हसन, सुरेश राम, कृष्णा राम, कृष्णा यादव सहित सैकड़ों छात्र-नौजवान शामिल हुए ।
