बीपी डेस्क। भारतीय जनता पार्टी को राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने मंगलवार को राष्ट्रीय अध्यक्ष का पदभार संभाल लिया। इस दौरान पीएम मोदी ने भरे मंच से कहा कि एक कार्यकर्ता के रुप में नितिन नवीन उनके बॉस हैं और वो एक कार्यकर्ता। पीएम मोदी का यह बयान ही नितिन नवीन को उस जिम्मेदारी का अहसास दिला रहा है कि उनकी कंधों पर कितनी बड़ी जिम्मेदारी है।
पीएम मोदी ने यह भी कहा कि नितिन नवीन की जिम्मेदारी केवल पार्टी तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि एनडीए के सभी सहयोगियों को भी एक साथ लेकर चलना होगा। नितिन नवीन के लिए पीएम मोदी के शब्द केवल सलाह नहीं बल्कि आने वाले समय में उनकी चुनौतियों के रुप में देखा जा रहा है। नितिन नवीन बिहार से हैं ऐसे में पूरे देश के साथ साथ बिहार में भी उनके लिए 3 बड़ी चुनौती दिख रही है।
दरअसल, नितिन नवीन बीजेपी से इस शीर्ष पद पर पहुंचने वाले बिहार के पहले नेता हैं। 2005 से नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार में सरकार चला रही बीजेपी 2025 के विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। ऐसे में पार्टी के पास पहली बार अपने मुख्यमंत्री का दावा मजबूत करने का अवसर भी है। हालांकि, राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद नितिन नवीन के सामने बिहार और बंगाल दोनों मोर्चों पर बड़ी राजनीतिक परीक्षा है।
राजनीति जानकारों की मानें तो नितिन नवीन के सामने बिहार में 3 बड़ी चुनौतियां है। पहली चुनौती है बिहार में बीजेपी का सीएम बनाना। फिलहाल एनडीए के नेता सीएम नीतीश को ही नेता बता रहे हैं। लेकिन बढ़ती उम्र और सेहत को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच यह कयास तेज हैं कि बंगाल चुनाव के बाद बिहार में नेतृत्व को लेकर बड़ा बदलाव हो सकता है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस संभावित बदलाव की तैयारी सिर्फ बीजेपी ही नहीं, जदयू में भी भीतरखाने चल रही है।
नीतीश कुमार के बेटे निशांत के राजनीतिक भविष्य को लेकर भी मंथन जारी है। अंतिम फैसला नीतीश कुमार के हाथ में ही रहने की बात कही जा रही है। आंकड़ों पर नजर डालें तो बीजेपी के साथ उसके सहयोगी दल एलजेपी (रामविलास) के 19, हम के 5 और आरएलएम के 4 विधायक हैं। इन चारों दलों को मिलाकर कुल संख्या 117 तक पहुंचती है, जो बहुमत के आंकड़े 122 से सिर्फ पांच कम है। बिहार बीजेपी में अंदरूनी गुटबाजी नितिन नवीन के सामने दूसरी बड़ी चुनौती है। पिछले कुछ वर्षों में प्रदेश अध्यक्षों का बार-बार बदलना इसी का संकेत माना जाता है।
संजय जायसवाल, सम्राट चौधरी और दिलीप जायसवाल तीनों का कार्यकाल अपेक्षाकृत छोटा रहा। पार्टी के भीतर अलग-अलग नेताओं के गुट सक्रिय हैं, जिनमें नित्यानंद राय और सम्राट चौधरी जैसे नेताओं की मजबूत पकड़ मानी जाती है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, स्थिति यह है कि कई नेता सार्वजनिक तौर पर एक-दूसरे से मिलने से भी बचते हैं, ताकि किसी गुट से जुड़ने का ठप्पा न लगे।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नितिन नवीन की कोशिश होगी कि वे प्रदेश नेतृत्व के साथ मिलकर एक संतुलित और मजबूत संगठन खड़ा करें। 2005 से बिहार में एनडीए की सरकार है और तब से नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री बने हुए हैं। कई बार बीजेपी संख्या में बड़ी पार्टी रही, लेकिन मुख्यमंत्री पद जदयू के पास ही रहा। इसका एक बड़ा कारण बीजेपी की राज्यव्यापी स्वीकार्यता का अभाव और गठबंधन की राजनीति मानी जाती है।
2025 के चुनाव नतीजों में ऐसे आठ जिले सामने आए, जहां बीजेपी का एक भी विधायक नहीं है, जबकि आठ जिलों में सिर्फ एक विधायक है। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि गठबंधन के कारण बीजेपी कई सीटों पर चुनाव नहीं लड़ पाती, जिससे संगठन विस्तार भी प्रभावित होता है। नतीजतन, पार्टी राज्य की सभी विधानसभा सीटों पर अपने दम पर उम्मीदवार उतारने की स्थिति में नहीं है।
अब नितिन नवीन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे बिहार के हर जिले में पार्टी संगठन को मजबूत करें, ताकि भविष्य में बीजेपी गठबंधन की मजबूरी से बाहर निकलकर अपने दम पर चुनावी मुकाबले में उतर सके। ऐसे में नितिन नवीन की भूमिका अब केवल संगठनात्मक नहीं रह गई है बल्कि उनके लिए एक चुनौती भी है।
