बिहार को एक साथ तीन रामसर सर्टिफिकेट कैसे मिले? जानिए पूरी कहानी

पटना
  • भारत में कुल 98 रामसरस्थल, बिहार में तीन
  • 2.25 हैक्टेयर से कुल 4316 आर्द्रभूमियों का सत्यापन

बीपी डेस्क। इस वर्ष का विश्व आर्द्रभूमि दिवस बिहार के लिए ऐतिहासिक रहा। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से सोमवार को नई दिल्ली में राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण के सदस्य सचिव एस. चंद्रशेखर को 3 रामसर साइट का विशेष सर्टिफिकेट प्रदान किया गया। राज्य में तीन नई रामसर साइटें घोषित की गई हैं, जिसके लिए ये तीन सर्टिफिकेट बिहार को मिले हैं।

विश्व आर्द्रभूमि दिवस प्रत्येक वर्ष 2 फरवरी को ईरान के रामसर में वर्ष 1971 में हुए वेटलैंड्स कन्वेंशन की स्मृति में मनाया जाता है। वर्ष 2026 में इसका वैश्विक थीम “वेटलैंड्स और पारंपरिक ज्ञान: सांस्कृतिक विरासत का जश्न” रखा गया है।

यह थीम इस बात पर जोर देता है कि किस तरह स्वदेशी और स्थानीय समुदाय सदियों से पारंपरिक ज्ञान के माध्यम से आर्द्रभूमियों का संरक्षण और प्रबंधन करते आए हैं। यह दृष्टिकोण आर्द्रभूमियों को केवल पारिस्थितिक क्षेत्र नहीं, बल्कि आध्यात्मिक, ऐतिहासिक और आर्थिक महत्व से जुड़े जीवंत सांस्कृतिक परिदृश्य के रूप में स्थापित करता है।

ग्लोबल कंजर्वेशन मैप पर बिहार की बढ़ती पहचान
बेगूसराय स्थित कांवरताल, जो बिहार का पहला रामसर साइट और एशिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की ऑक्स्बो झील है। आज भी 220 से अधिक पक्षी प्रजातियों का सुरक्षित आश्रय बनी हुई है। वहीं, वर्ष 2024 में रामसर सूची में शामिल जमुई के नागी और नकटी पक्षी अभ्यारण्य प्रवासी पक्षियों के साथ-साथ इको-टूरिज्म की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरे हैं।

तीन नई आर्द्रभूमियों से मिला राष्ट्रीय सम्मान
वर्ष 2025 में गोकुल जलाशय (बक्सर), उदयपुर झील (पश्चिम चंपारण) और गोगाबिल (कटिहार) के रामसर साइट सूची में शामिल होने के बाद भारत में कुल रामसर स्थलों की संख्या 98 और बिहार में छह हो गई है। ये ऑक्स्बो झीलें गंगा और गंडक नदियों के लिए प्राकृतिक बफर के रूप में कार्य करती हैं।

यह होती है आर्द्रभूमि की खासियत
आर्द्रभूमि वैसे क्षेत्र को कहते हैं, जो स्थायी या मौसमी रूप से जल से संतृप्त रहते हैं। मसलन दलदल, कीचड़ युक्त भूमि, झीलें और नदी तट। इन्हें ‘धरती की किडनी’ कहा जाता है, क्योंकि ये जल को शुद्ध करने, बाढ़ नियंत्रण और जैव विविधता संरक्षण में अहम भूमिका निभाती हैं। बिहार में 2.25 हेक्टेयर से बड़े कुल 4316 आर्द्रभूमियों का सत्यापन किया जा चुका है।

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