सेंट्रल डेस्क। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने शुक्रवार को हुए संसदीय चुनाव में जबरदस्त जीत हासिल कर ली है। जिसके बाद पिछले 18 महीनों से अस्थिर रहने वाले इस दक्षिण एशियाई देश में स्थिरता आने की उम्मीद बन गई है। गुरुवार को हुए संसदीय चुनाव में BNP ने भारी बहुमत से जीत हासिल कर ली है, जिससे पिछले कई सालों से बांग्लादेश से बाहर रहने वाले तारिक रहमान अब अगले प्रधानमंत्री बन सकते हैं।
पिछले तीन दशकों में ऐसा पहली बार हुआ है जब अवामी लीग का चुनाव निशान ‘नाव’ बैलेट पेपर से गायब था। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) का मुकाबला जमात-ए-इस्लामी और युवाओं की बनी नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) के नेतृत्व वाले 11-पार्टी गठबंधन से था। तारिक रहमान पिछले 17 सालों से देश से बाहर निर्वासित जिंदगी जी रहे थे और अब वो प्रधानमंत्री बनने वाले हैं।
उन्होंने देश में कानून का राज बहाल करने और गारमेंट्स सेक्टर में नई जान फूंकने पर फोकस करते हुए एक “नया रास्ता” अपनाने का वादा किया है। वहीं, जमात-ए-इस्लामी ने जीत हासिल करने के लिए पूरी जान झोंक दी थी, लेकिन जैसा की आकलन रिपोर्ट में भी पता चला था, जमात सरकार बनाने की स्थिति में नहीं आने वाली थी।
बता दें कि ढाका ट्रिब्यून के मुताबिक तारिक रहमान की BNP ने अभी तक 151 सीटें जीत ली हैं और 120 से ज्यादा सीटों पर वो आगे चल रही है। वहीं, जमात-ए-इस्लामी को सिर्फ 43 सीटें ही मिल पाई हैं। कुछ और सीटों पर वो आगे चल रही है। वहीं बांग्लादेश चुनाव में 350 संसदीय सीटे हैं, जिनमें 50 सीट महिलाओं के लिए आरक्षित हैं, जिनपर मतदान नहीं होते। 300 सीटों पर वोट डाले जाते हैं और इस बार एक कैंडिटेट के निधन से 299 सीटों के लिए ही मतदान हुए।
जबकि आजादी के बाद से बांग्लादेश में हुआ ये पहला चुनाव था, जिसमें दोनों पूर्व प्रधानमंत्री मौजूद नहीं थी। ना तो शेख हसीना और ना ही खालिदा जिया। खालिदा जिया का पिछले साल आखिर में निधन हो गया था, जबकि शेख हसीना अगस्त 2024 के बाद भारत आ गई थीं। शेख हसीना की अवामी लीग को इस बार चुनाव लड़ने से रोक दिया था, जिसके पास अभी भी 35-40 प्रतिशत वोट हैं।
बांग्लादेश चुनाव में शेख हसीना की पार्टी का असर दिखा है और सिर्फ 48 प्रतिशत वोटिंग होने का मतलब है कि चुनाव के बहिष्कार की अवामी लीग के नेताओं की अपील का भी असर हुआ है। शेख हसीना का बांग्लादेश में जड़ें कितनी मजबूत है, इससे इसका भी पता चलता है। BNP का मुख्य मुकाबला जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाला 11-पार्टी के गठबंधन से था। जमात खुद पहले BNP के साथ चुनाव लड़ती थी।
जमात के साथ छात्रों की बनाई पार्टी NCP ने हाथ मिलाया था, जिसका गठन शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद हुआ। लेकिन वो चुनाव में कोई भी असर छोड़ने में नाकाम रही है। छात्र नेता आपसी गुटबाजी का शिकार रहे।
