बीपी डेस्क। गोबिंद सिंह जी की जयंती प्रत्येक वर्ष मनाई जाती है। वह सिखों के 10वें गुरु थे। वह न केवल एक आध्यात्मिक नेता बल्कि एक निडर योद्धा, कवि और दार्शनिक भी थे। उन्होंने अपने चारों पुत्र धर्म की रक्षा के लिए कुर्बान किए थे लेकिन हजारों लोगों में साहस, ज्ञान और भक्ति की भावना जगाकर नई जान दी। उनके साहस के आगे मुगल की सेना भी थर-थर कांप गई थी। औरंगजेब की सेना का जनरल सैयद खान युद्ध का मैदान छोड़कर भागा था। आइए यहां गुरु गोबिंद सिंह जयंती से पहले धर्म, समानता, निस्वार्थ सेवा और उनकी वीरता के बारे में जानें।
गुरु गोविंद सिंह जी ने इतिहास में अन्याय, अधर्म, अत्याचार और दमन के खिलाफ लड़ाइयां लड़ी थीं। गुरु जी की तीन पीढ़ियों ने देश धर्म की रक्षा के लिए महान बलिदान दिया। सिखों के 10वें गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह जी की जयंती को प्रकाश पर्व के लिए भी जाना जाता है। वे एक महान कवि, निडर योद्धा, महान लेखक और संगीत के पारखी भी थे। उनका जन्म 1666 में पटना में हुआ। वे नौवें सिख गुरु श्री गुरु तेग बहादुर और माता गौरी के इकलौते पुत्र थे और बचपन का नाम गोबिंद राय था।
गोबिंद राय से बने थे गोबिंद सिंह जी
सन 1699 में बैसाखी के दिन गुरु गोबिंद सिंह जी ने कालसा पंथ की स्थापना कर 5 व्यक्तियों को अमृत चखा का ‘पांच प्यारे’ बना दिए। इन पांच प्यारों में सभी वर्गों के लोग थे। उनका अमृत चखाने का उद्देश्य जात-पात मिटाने का था। उन्होंने स्वयं भी अमृत चखा और गोबिंद राय से गोबिंद सिंह बन गए।
गुरु गोबिन्द सिंह जी की वीरता और लोकप्रियता से आसपास के राजा भी हैरान थे। बिलासपुर के राजा भीमचन्द सहित गढ़वाल, कांगड़ा के राजाओं ने मुगल शासक औरंगजेब के पास जाकर गुरु गोबिंद सिंह के खिलाफ लड़ने के लिए सैनिक सहायता मांगी। भीम चंद की माता चम्पादेवी ने गुरु गोबिंद सिंह के खिलाफ युद्ध का विरोध कर कहा कि गुरु गोबिंद सिंह एक महान संत है। उनको घर बुला कर सम्मान देना चाहिए।
कांपी थी औरंगजेब की सेना, जनरल ने छोड़ा मैदान
इसी प्रकार जब औरंगजेब की सेना का जनरल सैयद खान युद्ध के लिए आनंदपुर साहिब जाने लगा तो बहन नसरीना ने सैयद खान को गुरु गोबिंद सिंह के खिलाफ युद्व करने से रोका और कहा कि वे पहले से ही गुरु जी की अनुयायी हैं। लेकिन सैयद खान युद्ध के लिए निकल पड़ा। युद्ध के मैदान में नीले घोड़े पर सवार गुरु गोबिंद सिंह से मुगल सेना थर-थर कांप गई। सैयद खान भी गुरु जी के सामने आकर खड़ा हो गया तो वह अपने घोड़े से उतरे लेकिन सैयद खान को नहीं मारा। सैयद खान युद्ध का मैदान छोड़कर पर्वतों में चला गया।
धर्म की रक्षा के लिए कुर्बान किए 4 पुत्र
गुरु गोबिंद सिंह जी के 4 पुत्र थे। उनका नाम साहिबजादे अजीत सिंह, साहिबजादे जुझार सिंह, साहिबजादे फतेह सिंह, साहिबजादे जोरावर सिंह था। उन्होंने अपने चारों पुत्र धर्म की रक्षा के लिए कुर्बान किए थे। गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने जीवन में आनंदपुर, भंगानी, नंदौन, गुलेर, निर्मोहगढ, बसोली, चमकोर, सरसा और मुक्तसर सहित 14 युद्ध किए थे। इन जंग में पहाड़ी राजाओं और मुगल सूबेदारों ने हर बार मुंह की खाई थी।
खालसा वाणी की स्थापना
गुरु गोबिंद सिंह ने खालसा वाणी ‘वाहे गुरुजी का खालसा, वाहे गुरुजी की फतेह’ स्थापना की। उन्होंने कभी स्वार्थ के लिए लड़ाई नहीं लड़ी बल्कि उत्पीड़न और अन्याय के खिलाफ लड़ाई लड़ी। उनकी जयंती के अवसर पर लोग उनकी शिक्षाओं को याद करने, प्रार्थना करने और समाज में उनके योगदान पर बात करते हैं।
