डेस्क। सनातन हिन्दू धर्म में तुलसी केवल वनस्पति नहीं, बल्कि साक्षात देवी-तत्त्व है। जिस प्रकार गंगा जल में, शालिग्राम शिला में और गौ माता में ईश्वर का वास माना गया है, उसी प्रकार तुलसी में भगवती शक्ति का आविर्भाव स्वीकार किया गया है।
शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है “या दृष्टा निखिलाघसंघशमनी स्पृष्टा वपुः पावनी रोगाणामभिवन्दिता निरसनी सिक्तान्तकत्रासिनी।” (स्कन्द पुराण) अर्थात— तुलसी के दर्शन से पाप नष्ट होते हैं, स्पर्श से शरीर पवित्र होता है, पूजन से रोग नष्ट होते हैं और जल अर्पण से मृत्यु का भय भी मिटता है।
- तुलसी का तात्त्विक स्वरूप (तुलसी कौन हैं?)
- तुलसी = वृंदा = योगमाया पद्म पुराण, स्कन्द पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार—
तुलसी माता पूर्वजन्म में वृंदा देवी थीं
वे भगवान विष्णु की योगमाया शक्ति हैं
उनका अवतरण भक्ति की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए हुआ
इसी कारण तुलसी को—
-पतिव्रता धर्म की मूर्ति
-भक्ति की अधिष्ठात्री देवी
कहा गया है। तुलसी और भगवान विष्णु!
विष्णु पूजा में तुलसी क्यों अनिवार्य?
गरुड़ पुराण में कहा गया है कि
“अतुला तुलसी पत्रं विष्णोः प्रीतिकरं सदा।”
अर्थात— तुलसी पत्र भगवान विष्णु को सर्वाधिक प्रिय है।
बिना तुलसी, विष्णु पूजा, शालिग्राम पूजन एवम एकादशी व्रत पूर्ण फलदायी नहीं होते।
तुलसी दल = भक्ति का प्रतीक
तुलसी दल यह दर्शाता है कि पूजा केवल द्रव्य से नहीं
भाव, श्रद्धा और समर्पण से स्वीकार होती है। इसी कारण भगवान विष्णु सोने-चाँदी से अधिक तुलसी दल से प्रसन्न होते हैं।
तुलसी और कर्म–पाप सिद्धांत (धर्मशास्त्रीय दृष्टि)
पाप-नाश का शास्त्रीय आधार
स्कन्द पुराण में उल्लेख है—
तुलसी रोपण करने से ब्रह्महत्या जैसे पापों का क्षय होता है।तुलसी सींचन करने से पूर्वजन्म के पाप नष्ट होते है। तुलसी सेवा करने से कुल का उद्धार होता है
इसलिए तुलसी को “पापहारिणी” कहा गया है।
तुलसी और पितृ–तत्त्व
हिन्दू धर्म में— पितृ दोष , कुल ऋण और पूर्वजों का आशीर्वाद अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।
शास्त्रों के अनुसार—
तुलसी के समीप दीपदान करने से पितृ तृप्त होते हैं, वंश में बाधाएँ दूर होती हैं और अकाल मृत्यु का भय घटता है।
तुलसी पूजन विधि (आचार शास्त्र अनुसार)
शुद्ध हिन्दू विधि प्रातः स्नान के बाद तुलसी को जल अर्पण कर दीप प्रज्वलन, पुष्प / अक्षत
निम्न मंत्र का जप— “महाप्रसादजननी सर्वसौभाग्यवर्धिनी।
आधिव्याधिहरि नित्यं तुलसी त्वं नमोऽस्तु ते॥”
यह मंत्र तुलसी को माता मानकर नमन करता है।
तुलसी पूजन दिवस (धार्मिक भाव)
सनातन दृष्टि से आज (25 दिसम्बर) के दिन तुलसी पूजन दिवस मनाने का उद्देश्य हिन्दू समाज को अपनी जड़ों से जोड़ना, घर–घर तुलसी स्थापना, बच्चों में धर्मबोध और सांस्कृतिक आत्मसम्मान जागृत करना है।
तुलसी = पंचमहाभूतों का संतुलन
हिन्दू दर्शन में सृष्टि पंचमहाभूतों से बनी है—
🔅पृथ्वी
🔅जल
🔅अग्नि
🔅वायु
🔅आकाश
तुलसी—
🔅पृथ्वी (रोपण)
🔅जल (सींचन)
🔅अग्नि (दीप)
🔅वायु (शुद्ध वातावरण)
🔅आकाश (मंत्र–ध्वनि)
पाँचों को संतुलित करती है।
इसीलिए तुलसी पूजन को पूर्ण वैदिक कर्म माना गया है।
तुलसी पूजन के शास्त्रीय फल/आध्यात्मिक फल
-भक्ति में वृद्धि
-मन की शुद्धि
-मोक्ष–मार्ग की सरलता
धार्मिक फल
-पाप क्षय
-कुल कल्याण
-लक्ष्मी स्थिरता
सांस्कृतिक फल
-हिन्दू पहचान
-संस्कारों की रक्षा
-परंपरा का संरक्षण
तुलसी घर को तीर्थ बनाती हैं, मन को मंदिर और जीवन को साधना।
