मोतिहारी, राजन द्विवेदी। बिहार में गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए स्वास्थ्य विभाग ने आज एनीमिया (खून कि कमी) के खिलाफ विशेष अभियान की शुरुआत की। राज्य के माननीय स्वास्थ्य मंत्री ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से “फेरिक कार्बक्सीमाल्टोज इंजेक्शन थेरेपी” अभियान का राज्यस्तरीय शुभारंभ किया।
यह पहल राज्य में एनीमिया की गंभीर समस्या से निपटने के लिए एक ठोस कदम मानी जा रही है। मोतिहारी में जिला स्तरीय कार्यक्रम राज्यस्तरीय शुभारंभ के साथ ही मोतिहारी सदर अस्पताल में जिला स्तरीय कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ सिविल सर्जन डॉ. दिलीप कुमार ने किया।
इस अवसर पर उपाधीक्षक डॉ. सच्चिदानंद सत्यार्थी, डॉ. सुरुचि स्मृति, डी.सी.एम. नंदन झा, पिरामल फाउंडेशन के प्रमंडलीय प्रबंधक नावेद उर रहमान, जिला प्रबंधक मुकेश कुमार समेत स्वास्थ्य विभाग के कई अधिकारी और कर्मी उपस्थित रहे।
सिविल सर्जन ने बताया कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार बिहार में लगभग 63 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा 63.9 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। यह राष्ट्रीय औसत 52 प्रतिशत से काफी अधिक है और राज्य के लिए गंभीर चुनौती प्रस्तुत करता है।
अभियान के लिए विशेष व्यवस्थाएँ:
अभियान को प्रभावी बनाने के लिए स्वास्थ्य विभाग द्वारा कई अहम व्यवस्थाएँ सुनिश्चित की गई हैं। प्रत्येक जिले में एक चयनित स्वास्थ्य संस्थान- जैसे जिला अस्पताल या एफआरयु को चिन्हित किया गया है, जहां कम से कम 20 बेड और आईवी स्टैंड की सुविधा उपलब्ध कराई गई है।
इसके साथ ही चिन्हित एनीमिक गर्भवती महिलाओं को अस्पताल तक लाने और उपचार के बाद सुरक्षित घर पहुंचाने के लिए एम्बुलेंस सेवा की व्यवस्था भी की गई है। अभियान के संचालन के लिए प्रशिक्षित चिकित्सा पदाधिकारियों और स्टाफ नर्सों की तैनाती की गई है तथा राज्य स्तर पर मास्टर ट्रेनर्स की सूची भी जारी की गई है। कार्यक्रम का सीधा प्रसारण सभी जिला अस्पतालों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए किया गया।
उपचार प्रोटोकॉल और दिशा-निर्देश:
स्वास्थ्य विभाग ने एफसीएम थेरेपी के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं। मध्यम एनीमिया की स्थिति में 34 सप्ताह से अधिक गर्भावस्था होने पर एफसीएम थेरेपी को प्राथमिक उपचार के रूप में दिया जाएगा, जबकि 34 सप्ताह से कम होने पर ओरल आयरन असफल होने पर इसका उपयोग किया जाएगा।
बताया गया कि गंभीर एनीमिया से पीड़ित 13 से 34 सप्ताह की गर्भवती महिलाओं के लिए आइवी आयरन को प्राथमिक उपचार के रूप में अपनाया जाएगा। प्रसव के बाद 42 दिनों तक यदि हीमोग्लोबिन 5 से 9.9 g/dl के बीच रहता है, तो चिकित्सक की सलाह पर यह थेरेपी दी जा सकती है।
डोज की गणना गंजोनी फार्मूला के आधार पर की जाएगी, जिससे प्रत्येक महिला को आवश्यकतानुसार सटीक आयरन मात्रा मिल सके। इंजेक्शन देने के दौरान और उसके बाद कम से कम 30 मिनट तक मरीज की निगरानी अनिवार्य की गई है। किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए जीवन रक्षक दवाएं जैसे एविल और हाइड्रोकार्टिसोन उपलब्ध रखने के निर्देश दिए गए हैं।
अभियान के शुभारंभ के अवसर पर प्रसव पूर्व जांच में चिन्हित विभिन्न प्रखंडों की 17 एनीमिक गर्भवती महिलाओं को एंबुलेंस के माध्यम से सदर अस्पताल लाया गया, जहां उन्हें थेरेपी दी गई तथा उपचार उपरांत पुनः एंबुलेंस से उनके घर तक सुरक्षित पहुंचाया गया।
बताया कि यह अभियान मातृ मृत्यु दर में कमी लाने और “एनीमिया मुक्त बिहार” के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग को उम्मीद है कि एफसीएम थेरेपी के प्रभावी क्रियान्वयन से गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य में तेजी से सुधार होगा और सुरक्षित मातृत्व को बढ़ावा मिलेगा।
